Homeउत्तराखंडदेहरादून में जिला प्रशासन और UPES का संयुक्त प्रयास, डीएम डॉ. आशीष...

देहरादून में जिला प्रशासन और UPES का संयुक्त प्रयास, डीएम डॉ. आशीष चौहान की मौजूदगी में नुक्कड़ नाटक के जरिए दिया नशा मुक्ति का संदेश

देहरादून के बिधोली स्थित यूपीईएस (UPES) कैंपस में आयोजित एक विशेष कार्यशाला ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर समाज को नशा मुक्त बनाना है, तो इसकी शुरुआत हमारी युवा पीढ़ी और शैक्षणिक संस्थानों से ही करनी होगी। ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ के अंतर्गत जिला प्रशासन, समाज कल्याण विभाग देहरादून और यूपीईएस के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम ने युवाओं को नशे के भयानक दुष्प्रभावों से परिचित कराने के साथ-साथ एक स्वस्थ, सकारात्मक और रचनात्मक जीवनशैली चुनने का स्पष्ट संदेश दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ और समापन राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान की अनुगूंज के साथ हुआ, जिसने उपस्थित सैकड़ों छात्र-छात्राओं में देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराया। आज का युवा जहां तकनीकी और वैश्वीकरण के दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं नशे का जाल उसके भविष्य पर एक बड़ा खतरा बनकर मंडरा रहा है। ऐसे दौर में जिला प्रशासन द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में सीधा संवाद स्थापित करना एक बेहद सराहनीय और दूरगामी कदम माना जा सकता है।

जिलाधिकारी की युवाओं से सीधी बात: नशे के ‘डोपामिन ट्रैप’ को समझना जरूरी
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने छात्र-छात्राओं से बेहद आत्मीय और व्यावहारिक शैली में संवाद स्थापित किया। उन्होंने किसी औपचारिक भाषण की जगह जीवन के यथार्थ और प्राथमिकताओं पर जोर दिया। जिलाधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा कि हर इंसान के पास जीवन में समय और अवसरों की एक सीमित सीमा होती है। इस यात्रा में यह पूरी तरह से व्यक्ति के स्वयं के निर्णय पर निर्भर करता है कि वह किन रास्तों का चयन करता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने भविष्य को संवारने के लिए नशे जैसे आत्मघाती रास्तों को छोड़कर सकारात्मक, रचनात्मक और स्वास्थ्यवर्धक विकल्पों को चुनें।
जिलाधिकारी ने नशे के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पहलू को समझाते हुए इसे एक बेहद खतरनाक ‘डोपामिन ट्रैप’ करार दिया। उन्होंने कहा कि ड्रग्स या किसी भी प्रकार का नशा मस्तिष्क के उस हिस्से पर प्रहार करता है जो क्षणिक आनंद का अहसास कराता है। इस जाल में फंसने के बाद इंसान धीरे-धीरे अपनी सोचने-समझने और आत्म-नियंत्रण की क्षमता खो बैठता है। इससे बाहर निकलने के लिए स्वयं का विश्लेषण, आत्म-अनुशासन और मानसिक मजबूती सबसे ज्यादा जरूरी है। जब कोई युवा नशे की गिरफ्त में आता है, तो केवल उसका व्यक्तिगत जीवन ही तबाह नहीं होता, बल्कि उसका परिवार मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाता है और अंततः पूरे समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

नशे के कारोबार का मुख्य निशाना: युवाओं को जागरूक करने की प्रशासनिक रणनीति
जिला प्रशासन का मानना है कि नशे के सौदागर और अवैध कारोबार करने वाले गिरोह सबसे ज्यादा शिक्षण संस्थानों और युवाओं को अपना शिकार बनाते हैं। युवाओं की जिज्ञासा, सहपाठियों का दबाव और जीवन के तनाव का फायदा उठाकर उन्हें इस लत की ओर धकेला जाता है। इसी रणनीति को ध्यान में रखते हुए जिलाधिकारी ने निर्देश दिए हैं कि नशा विरोधी अभियानों को केवल जिला मुख्यालय तक सीमित न रखकर जनपद के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और बड़े शैक्षणिक संस्थानों तक ले जाया जाएगा।
प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र-छात्राओं को नशे से होने वाले शारीरिक बीमारियों, मानसिक अवसाद, सामाजिक प्रतिष्ठा के नुकसान और आर्थिक बर्बादी की पूरी जानकारी समय रहते मिल सके। जब युवाओं को इसके भयावह परिणामों का ज्ञान होगा, तो वे खुद भी इससे बचेंगे और अपने साथियों को भी इस दलदल में जाने से रोक सकेंगे।

सामूहिक प्रयास और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता
नशे जैसी सामाजिक बुराई को केवल कड़े कानूनों या पुलिसिया कार्रवाई के दम पर पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक बहुआयामी और समन्वित रणनीति की आवश्यकता है। कार्यशाला में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि सरकार, शासन, जिला प्रशासन, पुलिस महकमा, शैक्षणिक संस्थान, गैर-सरकारी व सामाजिक संगठन, अभिभावक और आम नागरिक जब तक एक मंच पर आकर जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, तब तक पूरी तरह सफलता मिलना कठिन है।
एक तरफ जहां पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को नशीले पदार्थों की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ना होगा, वहीं दूसरी ओर समाज और शिक्षण संस्थानों को इसकी मांग को शून्य करने के लिए जागरूकता फैलानी होगी। अभिभावकों को भी अपने बच्चों के बदलते व्यवहार और संगति पर नजर रखनी होगी, ताकि शुरुआती चरण में ही समस्या को पकड़ा जा सके।

कला और कहानी के माध्यम से गहरा प्रभाव: नुक्कड़ नाटक और प्रेरक प्रसंग
कार्यक्रम में पुलिस अधीक्षक नगर शेखर चंद्र सुयाल ने युवाओं को संबोधित करते हुए एक बेहद भावुक और विचारोत्तेजक कहानी के माध्यम से नशे के गंभीर परिणामों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किस तरह एक छोटी सी गलती या केवल दोस्तों के दिखावे में शुरू हुआ नशा किसी होनहार छात्र के करियर और सपनों को मिनटों में ध्वस्त कर देता है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे न केवल स्वयं नशे से दूर रहें, बल्कि अगर उनका कोई मित्र इस राह पर भटक रहा है, तो उसे सही समय पर मदद दिलाएं।
केवल व्याख्यान ही नहीं, बल्कि युवाओं तक बात पहुंचाने के लिए सांस्कृतिक माध्यमों का भी सहारा लिया गया। छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत नुक्कड़ नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर कर दिया। नाटकों के माध्यम से दर्शाया गया कि कैसे नशा हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ देता है और कैसे दृढ़ संकल्प व अपनों के सहयोग से इस दलदल से बाहर निकला जा सकता है। इन प्रस्तुतियों का उपस्थित युवाओं पर गहरा असर देखा गया।

नशा मुक्त समाज के निर्माण की सामूहिक शपथ
कार्यशाला के अंतिम चरण में परिसर में मौजूद सभी छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों को जीवन भर नशे से दूर रहने और एक नशा मुक्त समाज के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की शपथ दिलाई गई। अधिकारियों ने युवाओं से अपील की कि वे इस अभियान के केवल दर्शक न बनें, बल्कि इसके सक्रिय ब्रांड एंबेसडर बनें। यदि वे अपने आसपास किसी भी प्रकार के अवैध नशे के कारोबार या किसी साथी को संकट में देखें, तो तुरंत उचित माध्यमों से प्रशासन को सूचित करें और पीड़ित की मदद करें।
इस अवसर पर अपर जिलाधिकारी प्रशासन स्मृता परमार, यूपीईएस के कुलपति मनीष मदान, विशेष अतिथि ललित जोशी, जिला शिक्षा अधिकारी प्रेमलाल भारती, अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. रोहित गोंडवाल, डॉ. प्रदीप राणा, जिला समाज कल्याण अधिकारी दीपांकर घिल्डियाल सहित यूपीईएस की डॉ. दीपा मेहरा रावत, डॉ. रोहित रस्तोगी, अनेक शिक्षकगण और भारी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर सहमति व्यक्त की कि यह अभियान एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाला सामाजिक आंदोलन है।

नशा मुक्ति अभियान का सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक विश्लेषण
उत्तराखंड जैसे सीमावर्ती और पर्वतीय राज्य में नशे का बढ़ता प्रसार एक अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है। यदि इसके विभिन्न पहलुओं पर विश्लेषणात्मक दृष्टि डालें, तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं:
1. सामाजिक प्रभाव
नशा समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देता है। जिस घर में कोई सदस्य नशे का आदी हो जाता है, वहां घरेलू हिंसा, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है। युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ती है, क्योंकि नशे की पूर्ति के लिए वे चोरी, छिनैती और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों में संलिप्त होने लगते हैं।
2. आर्थिक प्रभाव
नशे का सीधा प्रहार किसी भी परिवार और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जो पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, पौष्टिक भोजन और बेहतर जीवन स्तर पर खर्च होना चाहिए, वह नशे की पूर्ति में बर्बाद हो जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो उत्पादक कार्यबल की कार्यक्षमता घटती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
3. प्रशासनिक और सुरक्षात्मक चुनौतियां
नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी को रोकना प्रशासन और पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है। नशीले पदार्थों के नेटवर्क अक्सर काफी फैले हुए होते हैं। ऐसे में पुलिस को खुफिया तंत्र मजबूत करने के साथ-साथ तकनीकी निगरानी भी बढ़ानी पड़ रही है। शैक्षणिक संस्थानों के आसपास नशीले पदार्थों की बिक्री पर सख्त पाबंदी लगाना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।
4. मनोवैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण
ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ मानव तंत्रिका तंत्र को पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर देते हैं। इससे अवसाद, एंग्जायटी, अनिद्रा और यहां तक कि आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां पैदा होती हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, नशा पीड़ित व्यक्ति को अपराधी के बजाय एक मरीज के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसे सही इलाज, काउंसलिंग और पुनर्वास की जरूरत होती है।

भविष्य की राह: कैसे बने समृद्ध और नशा मुक्त भारत?
यूपीईएस में आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का रोडमैप पेश करता है कि भविष्य में नशा विरोधी अभियानों का स्वरूप कैसा होना चाहिए। केवल कागजी कार्रवाई या औपचारिक बैठकों से इतर धरातल पर उतरकर युवाओं के बीच जाना ही एकमात्र विकल्प है।
काउंसलिंग सेंटरों की स्थापना: हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में पेशेवर काउंसलर्स की नियुक्ति होनी चाहिए जो छात्रों के मानसिक तनाव को समझ सकें और उन्हें सही मार्गदर्शन दे सकें।
खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा: जब युवाओं की ऊर्जा को खेल, कला, संगीत और नवाचार में लगाया जाएगा, तो उनका ध्यान नशे जैसी बुराइयों की तरफ नहीं जाएगा।
कड़े कानूनी कदम: नशीले पदार्थों के आपूर्तिकर्ताओं और सौदागरों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि कानून का डर बना रहे।
अभिभावकों की सक्रियता: परिवारों में संवाद का माहौल होना चाहिए ताकि बच्चा अपनी किसी भी समस्या को खुलकर अपने माता-पिता से साझा कर सके।
यूपीईएस में जिला प्रशासन की इस पहल ने निश्चित रूप से देहरादून के युवाओं के मन में एक नई अलख जगाई है। यदि इसी तरह निरंतर प्रयास किए जाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब हम एक स्वस्थ, समृद्ध और पूर्णतः नशा मुक्त भारत का सपना साकार कर पाएंगे।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments