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मेक इन इंडिया बना वैश्विक ब्रांड: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की ओर खिंचे दुनिया भर के निवेशक

मेक इन इंडिया अभियान की नींव जब वर्ष 2014 में रखी गई थी, तब कई विश्लेषकों ने इसे एक बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण लक्ष्य माना था। एक ऐसा देश जो दशकों से अपनी अधिकांश जरूरतों, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनों और रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी आयात पर निर्भर रहा हो, उसके लिए अचानक वैश्विक विनिर्माण का केंद्र बनने का सपना देखना कोई छोटी बात नहीं थी। लेकिन आज जब यह पहल अपनी 12वीं वर्षगांठ मना रही है, तो आंकड़े और जमीनी हकीकत इस बात की गवाही देते हैं कि भारत ने न केवल अपनी सोच बदली है, बल्कि अपनी औद्योगिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया है। 12 वर्षों का यह सफर सिर्फ एक सरकारी योजना की कहानी नहीं है, बल्कि यह 130 करोड़ से अधिक भारतीयों के संकल्प, आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए ठोस कदमों और देश के आर्थिक परिदृश्य में आए एक ऐतिहासिक बदलाव की गाथा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस खास मौके पर देशवासियों को संबोधित करते हुए इसे भारत के औद्योगिक इतिहास का एक निर्णायक मोड़ करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मेक इन इंडिया ने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत किया है, बल्कि देश के युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के करोड़ों नए द्वार भी खोले हैं। आज जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं अस्थिरता के दौर से गुजर रही हैं, तब भारत एक मजबूत, भरोसेमंद और आत्मनिर्भर निर्माण केंद्र के रूप में उभरकर सामने आया है। स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से लेकर वैश्विक स्तर पर भारतीय ब्रांड्स की धाक जमाने तक, इस यात्रा ने देश के हर वर्ग को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है।

नीतिगत सुधार और इज ऑफ डूइंग बिजनेस: एक नई शुरुआत
मेक इन इंडिया की सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ उन प्रशासनिक और नीतिगत सुधारों का है, जिन्होंने देश में व्यापार करने के पुराने और जटिल तरीकों को जड़ से बदल दिया। आजादी के बाद से ही भारत में उद्योग लगाने के लिए लाइसेंस प्रक्रिया, लालफीताशाही और अनगिनत कागजी कार्रवाइयों को एक बड़ा रोड़ा माना जाता था। विदेशी निवेशक भारत की विशाल खपत को देखते हुए भी यहां पूंजी लगाने से हिचकिचाते थे। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने व्यापार सुगमता यानी इज ऑफ डूइंग बिजनेस पर विशेष ध्यान दिया।

सैकड़ों पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त किया गया, कई प्रकार की स्वीकृतियों को एक ही डिजिटल मंच से जोड़ा गया और श्रम कानूनों में श्रम सुधारों के माध्यम से एक संतुलन बनाने का प्रयास किया गया। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि वैश्विक स्तर पर भारत की साख में अभूतपूर्व सुधार आया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की साख बढ़ी और उन देशों ने भी भारत में निवेश करने में रुचि दिखाई, जो पहले किसी अन्य एशियाई देश को प्राथमिकता देते थे। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों को कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लचीला बनाया गया, जिससे रक्षा, एयरोस्पेस, रेलवे और निर्माण जैसे क्षेत्रों में विदेशी पूंजी का आगमन तेजी से बढ़ा।

इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल निर्माण में आई ऐतिहासिक क्रांति
अगर मेक इन इंडिया की सफलता को किसी एक क्षेत्र के उदाहरण से सबसे अच्छे तरीके से समझा जा सकता है, तो वह है इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन निर्माण का क्षेत्र। एक दशक पहले तक भारत दुनिया भर से अपनी जरूरतों के 10 प्रतिशत से अधिक मोबाइल फोन आयात करता था। देश के भीतर बनने वाले फोन नाममात्र के थे और जो बनते भी थे, उनमें केवल कलपुर्जों को जोड़ने का काम होता था।
आज स्थिति बिल्कुल विपरीत हो चुकी है। भारत अब दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता देश बन चुका है।

देश में मोबाइल निर्माण इकाइयों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है और विश्व की अग्रणी स्मार्टफोन कंपनियां अब भारत में ही अपने सबसे उन्नत मॉडल तैयार कर रही हैं। सिर्फ मोबाइल ही नहीं, बल्कि लैपटॉप, टेलीविजन, सेमीकंडक्टर और अन्य उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में भी देसी निर्माण को बहुत बड़ा बढ़ावा मिला है। भारत अब न केवल अपनी घरेलू मांगों को पूरा कर रहा है, बल्कि अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के देशों को बड़े पैमाने पर बने बनाए इलेक्ट्रॉनिक्स सामान निर्यात कर रहा है। इस बदलाव ने विदेशी मुद्रा की भारी बचत की है और देश को एक तकनीकी शक्ति के रूप में स्थापित किया है।

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना: विनिर्माण को मिली नई ऊर्जा
मेक इन इंडिया को केवल कागजों तक सीमित न रखकर धरातल पर उतारने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजना एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुई। इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना और विदेशी कंपनियों को भारत में अपनी बड़ी विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने के लिए आकर्षित करना था।

सरकार ने ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, सौर पैनल, उन्नत बैटरी और विशेष इस्पात जैसे 14 प्रमुख और रणनीतिक क्षेत्रों के लिए अरबों रुपये के प्रोत्साहन की घोषणा की। इस योजना ने निजी क्षेत्र के निवेशकों के भीतर एक नया आत्मविश्वास भरा। कंपनियां जितना अधिक उत्पादन और बिक्री करती हैं, उन्हें उतना ही अधिक वित्तीय प्रोत्साहन मिलता है। इसके कारण न केवल घरेलू उत्पादन क्षमता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई, बल्कि अत्याधुनिक तकनीकों का भी भारत में हस्तांतरण हुआ। आज पीएलआई योजना की बदौलत भारत में बड़े पैमाने पर आधुनिक कारखाने बन रहे हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में एक नया और अटूट विश्वास पैदा हुआ है।

रक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता का नया दौर
किसी भी देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना सबसे पहली शर्त मानी जाती है। आजादी के बाद से ही भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहा, जिससे न केवल देश का खजाना खाली होता था बल्कि आपातकाल के समय रणनीतिक जोखिम भी बना रहता था। मेक इन इंडिया ने इस सोच को पूरी तरह से बदल दिया।
रक्षा विनिर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मंजूरी दी गई और रक्षा साजो-सामान के आयात पर चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध लगाया गया। इसके सकारात्मक परिणाम आज हमारे सामने हैं।

भारत अब अपने हल्के लड़ाकू विमान, नौसेना के लिए उन्नत पोत, पनडुब्बियां, तोपें और आधुनिक मिसाइल प्रणालियां खुद बना रहा है। स्वदेशी तकनीक से निर्मित विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत इसका सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण है। इतना ही नहीं, भारत अब केवल रक्षा सामग्री खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह दुनिया के दर्जनों मित्र देशों को अपनी रक्षा प्रणालियां और गोला-बारूद निर्यात भी कर रहा है। इस बदलाव ने भारत की सामरिक स्थिति को दुनिया में बेहद मजबूत कर दिया है।

रोजगार सृजन, कौशल विकास और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
किसी भी औद्योगिक नीति का अंतिम लक्ष्य अपने नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार करना और उनके लिए आजीविका के साधन जुटाना होता है। इस दृष्टि से मेक इन इंडिया ने भारतीय समाज के सबसे निचले तबके से लेकर उच्च शिक्षित युवाओं तक सभी को नए अवसर प्रदान किए हैं। कारखानों की स्थापना से न केवल प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा हुईं, बल्कि परिवहन, आपूर्ति, पैकेजिंग और रखरखाव जैसे क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष रोजगार के करोड़ों अवसर उत्पन्न हुए।

औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए कौशल विकास अभियानों को इससे जोड़ा गया। आधुनिक मशीनों, ऑटोमेशन और नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप युवाओं को हुनरमंद बनाया जा रहा है। छोटे, लघु और मध्यम उद्योगों यानी एमएसएमई क्षेत्र को मेक इन इंडिया की असली रीढ़ माना गया है। बड़ी कंपनियों के भारत आने से इन छोटे उद्योगों को कच्चे माल और कलपुर्जों की आपूर्ति के नए ठेके मिले हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को पंख लगे हैं। गांव और छोटे शहरों से होने वाले पलायन को रोकने में भी इन स्थानीय औद्योगिक केंद्रों ने बड़ी भूमिका निभाई है।

चुनौतियां, बुनियादी ढांचा और भविष्य की राह
12 वर्षों की इस सफल यात्रा के बावजूद, भारत के सामने अभी भी कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं, जिन पर आने वाले वर्षों में काम करना बेहद जरूरी है। विनिर्माण क्षेत्र का भारत की कुल जीडीपी में योगदान बढ़ा तो है, लेकिन इसे अभी और ऊंचाई पर ले जाने की जरूरत है। भारत को वैश्विक स्तर पर चीन जैसे दिग्गज निर्माण देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

इसके लिए लॉजिस्टिक्स यानी माल ढुलाई की लागत को कम करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। भारत सरकार पीएम गति शक्ति और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति के माध्यम से इस दिशा में काम कर रही है, ताकि बंदरगाहों, रेलवे और राजमार्गों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार हो सके जिससे सामान एक जगह से दूसरी जगह तक बहुत कम समय और खर्च में पहुंच सके। इसके अलावा, अनुसंधान और विकास पर होने वाले खर्च को बढ़ाना होगा। केवल विदेशी तकनीकों को असेंबल करने के बजाय भारत को खुद की पेटेंट तकनीकें और डिजाइन तैयार करने होंगे। जब भारतीय युवा नई खोजें करेंगे और भारत की बौद्धिक संपदा मजबूत होगी, तभी सही मायनों में भारत विनिर्माण का निर्विवाद विश्व गुरु बन पाएगा।

एक समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का सपना
मेक इन इंडिया केवल एक आर्थिक नीति या सरकारी नारा नहीं है, यह एक राष्ट्रीय आंदोलन है जिसने भारत के आत्मविश्वास को नई उड़ान दी है। १२ साल पहले शुरू हुआ यह सफर अब एक वटवृक्ष का रूप ले चुका है, जिसकी छांव में देश का औद्योगिक भविष्य आकार ले रहा है। इस पहल ने देश को यह विश्वास दिलाया है कि भारतीय कारीगर, इंजीनियर और उद्यमी दुनिया के किसी भी देश से बेहतर उत्पाद बना सकते हैं।

जैसे-जैसे भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने की ओर अग्रसर है, मेक इन इंडिया की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण होती जाएगी। हरित ऊर्जा, पर्यावरण अनुकूल निर्माण और अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रौद्योगिकियों को अपनाकर भारत न केवल अपनी आवश्यकताओं को पूरा करेगा, बल्कि पूरी दुनिया की जरूरतों को पूरा करने वाला एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनकर उभरेगा। 12 साल का यह पड़ाव एक शानदार शुरुआत भर है; असली मंजिल तो भारत को हर क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्वकर्ता बनाना है।

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