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भारतीय गणराज्य की सांस्कृतिक आत्मा को जीवंत करते हुए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने लोक भवन में दोहराया कि हमारी विविधता ही राष्ट्र की असली ताकत और अखंडता का आधार है

भारतीय गणराज्य की नींव केवल राजनीतिक सीमाओं या प्रशासनिक तंत्र पर टिकी हुई नहीं है, बल्कि यह हज़ारों साल पुरानी साझा संस्कृति, आत्मीयता और मूल्यों के अटूट धागे से बंधी हुई है। लोक भवन में आयोजित ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ अभियान के अंतर्गत विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के स्थापना दिवस समारोह में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन की गरिमामयी उपस्थिति ने एक बार फिर देश की इस साझी विरासत को जीवंत कर दिया। इस अवसर पर राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के साथ-साथ आगामी एक नवंबर को अपने स्थापना दिवस का उत्सव मनाने वाले मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, दिल्ली, चंडीगढ़, पुडुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह जैसी तमाम इकाइयों के ऐतिहासिक योगदान को सराहा। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के मार्गदर्शन में यह कार्यक्रम मात्र एक उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उस महान सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रकटीकरण बन गया जो सुदूर उत्तर से लेकर दक्षिण के छोर तक और पश्चिम के रेगिस्तानों से लेकर पूरब व द्वीपीय क्षेत्रों तक पूरे देश को एक सूत्र में पिरोती है। इस गरिमामयी आयोजन के दौरान राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन की उपस्थिति में उपस्थितजनों द्वारा ली गई राष्ट्रीय एकता की शपथ इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि विकास और आधुनिकीकरण की इस तीव्र दौड़ में भी भारत अपनी मूल आत्मा और सांस्कृतिक दर्शन से अत्यंत गहराई से जुड़ा हुआ है।

विविध संस्कृतियों का संगम और राष्ट्रीय एकता का संदेश

भारत की भूगोलीय और सांस्कृतिक सरंचना दुनिया के किसी भी अन्य देश से सर्वथा भिन्न और अनूठी है। यहां पग-पग पर पानी बदलने और हर सौ कोस पर बोली बदलने की प्राचीन लोक-कथा चरितार्थ होती है। इस विविधता को कमजोरी मानने की भूल वे लोग करते हैं जो भारत की आंतरिक ऊर्जा को समझ नहीं पाते। वास्तव में, भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी इसी विविधता में निहित अटूट एकता है। समारोह में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन द्वारा व्यक्त किए गए विचार इस सत्य को रेखांकित करते हैं कि हमारी भाषाएं, खान-पान, वेशभूषा, लोक-कलाएं और परंपराएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन हमारी मातृभूमि और हमारा राष्ट्रीय संकल्प हमेशा एक ही रहता है। यह विविधता हमारी पहचान है, जो हमें दुनिया में विशिष्ट बनाती है, और यही एकता हमारी वह शक्ति है जो हर प्रकार की बाहरी और आंतरिक चुनौतियों का डटकर सामना करती है। जब कोई नागरिक कश्मीर की वादियों से लेकर कन्याकुमारी के समुद्र तट तक या पंजाब के खेतों से लेकर असम की पहाड़ियों तक जाता है, तो उसे भले ही भाषा और परिवेश में अंतर दिखाई दे, किंतु आतिथ्य सत्कार, आत्मीयता और भारत माता के प्रति सम्मान के भाव में कहीं कोई भिन्नता नहीं मिलती। राष्ट्रभक्ति का यह साझा धागा हम सभी को एक ऐसी अदृश्य शृंखला से बांधता है जिसे कोई भी ताकत कमजोर नहीं कर सकती।

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और अखंड भारत का निर्माण

किसी भी राष्ट्र का वर्तमान उसकी ऐतिहासिक नींव और महापुरुषों के बलिदान पर खड़ा होता है। राष्ट्रीय एकता दिवस के इस विशेष अवसर पर आधुनिक भारत के शिल्पकार और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को स्मरण करना और श्रद्धांजलि अर्पित करना हर भारतीय का नैतिक दायित्व है। स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब देश अनेक रियासतों और रजवाड़ों में विभाजित होने के कगार पर था, तब सरदार पटेल ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, कूटनीति, दूरदर्शिता और कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए सैकड़ों रियासतों को भारतीय संघ में विलीन करने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनका जीवन इस बात का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण है कि जब राष्ट्रहित को व्यक्तिगत या क्षेत्रीय स्वार्थों से ऊपर रखा जाता है, तो कितनी भी बड़ी और जटिल चुनौतियों को चुटकियों में हल किया जा सकता है। आज हम जिस अखंड और संगठित भारत में सांस ले रहे हैं, उसकी पृष्ठभूमि में सरदार पटेल का स्वेच्छा और दृढ़ता का वह संकल्प है जिसने रियासतों के बिखराव को एक महान राष्ट्र की महाशक्ति में बदल दिया। उनका यह जीवन-दर्शन आज की युवा पीढ़ी को यह सिखाता है कि जीवन में आने वाली बाधाओं से डरने के बजाय, अपने संकल्पों को चट्टान की तरह मजबूत रखकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना ही सबसे बड़ा धर्म है।

‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ अभियान: सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम

समय के साथ देश के भीतर राज्यों की भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर लोगों को आपस में जोड़ने के लिए शासन स्तर पर अनेक अभिनव प्रयोग किए गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा परिकल्पित और प्रारंभ किया गया ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ अभियान इस दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम साबित हो रहा है। यह अभियान केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के आम नागरिकों, विशेषकर युवाओं को एक-दूसरे की संस्कृति, खान-पान, कला, परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को करीब से जानने-समझने का सुनहरा अवसर दे रहा है। जब एक राज्य के युवा दूसरे राज्य की संस्कृति से रूबरू होते हैं, तो आपसी अज्ञानता के पर्दे स्वतः गिर जाते हैं और उनके स्थान पर आत्मीयता और विश्वास के नए पुल का निर्माण होता है। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान न केवल राज्यों के बीच की दूरियों को कम करता है, बल्कि देश की पारस्परिक सद्भाव की भावना को भी मजबूत करता है। इस तरह के अभियानों से लोगों को यह अहसास होता है कि भले ही उनके पहनावे और बोलचाल के तरीके अलग हों, लेकिन उनकी भावनाएं और आकांक्षाएं एक जैसी हैं। यह पहल राष्ट्रीय एकता को केवल एक वैचारिक नारा न बनाकर इसे जन-जन के आचरण और अनुभव का हिस्सा बना रही है।

क्षेत्रीय प्रगति और राष्ट्रीय उन्नति का संतुलन

एक सशक्त और विकसित राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब देश का हर एक राज्य, हर एक जिला और समाज का अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति प्रगति की इस मुख्यधारा से जुड़े। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि हम सभी को अपने-अपने प्रदेश की चहुंमुखी प्रगति के साथ-साथ संपूर्ण राष्ट्र की उन्नति को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनानी चाहिए। भारत जैसे विशाल देश में राज्यों का विकास ही देश के समग्र विकास की सीढ़ी है। जब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, केरल या किसी भी अन्य राज्य का युवा या किसान तरक्की करता है, तो वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूरे भारत के सकल विकास में योगदान देता है। इसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं, स्थानीय संस्कृतियों और प्राचीन परंपराओं का पूरे आदर के साथ सम्मान करें। आपसी सद्भाव, भाईचारा और आत्मीयता ही वह सीमेंट है जो विकास की इन ईंटों को मजबूती से जोड़कर रखती है। यदि हम क्षेत्रीयता के संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे, तो आने वाले समय में देश का कोई भी कोना विकास की रोशनी से वंचित नहीं रहेगा।

विविधता को ताकत बनाकर आत्मनिर्भर भविष्य की ओर बढ़ता भारत

इतिहास इस बात गवाह है कि जिन राष्ट्रों ने अपनी आंतरिक विविधताओं को दबाने या मिटाने का प्रयास किया, वे समय के थपेड़ों में बिखर गए। इसके विपरीत, भारत ने अपनी विविधताओं को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय हमेशा अपनी सबसे बड़ी ताकत और आभूषण के रूप में स्वीकार किया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस मूल मंत्र को अपने दैनिक जीवन और आचरण में उतारें। हमें मिलकर एक ऐसे आधुनिक और प्रगतिशील भारत की परिकल्पना को साकार करना है, जहां ज्ञान, विज्ञान और तकनीक का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग, हर वंचित और शोषित तक बिना किसी भेदभाव के पहुंचे। जब देश का हर नागरिक यह महसूस करेगा कि इस महान राष्ट्र की प्रगति में उसकी अपनी एक खास हिस्सेदारी है, तो देश की शक्ति कई गुना बढ़ जाएगी। आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा सुरक्षित, समृद्ध और समरस भारत सौंपना हमारा सामूहिक दायित्व है जो अपनी प्राचीन संस्कृति की जड़ों से जुड़ा हो और आधुनिकता के आसमान को छू रहा हो। राज्य स्थापना दिवस के बहाने आयोजित यह समागम हमें बार-बार यह याद दिलाता है कि हम सब अलग-अलग फूलों की तरह भले ही दिखते हों, लेकिन हमारी माला एक ही है, और वह माला है हमारा प्यारा भारत वर्ष।

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