
अजय सिंह
उत्तराखंड में 2027 के चुनावी रण की सुगबुगाहट अभी से सतह पर आ गई है। अमूमन चुनाव नजदीक आने पर दिखने वाली राजनीतिक सक्रियता इस बार सोशल मीडिया पर समय से पहले ही चरम पर पहुंच चुकी थी। भाजपा के भीतर टिकट के चाहवानों ने खुद को “भावी विधायक” घोषित कर समानांतर जनसंपर्क अभियान शुरू कर दिए थे। लेकिन संगठन के भीतर बढ़ती इस होड़ पर अब भाजपा आलाकमान ने पूरी तरह से लगाम कस दी है।
फेसबुक की टाइमलाइन नहीं, संगठन का मंच तय करेगा टिकट
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के हालिया रुख ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी में डिजिटल लोकप्रियता को उम्मीदवार चयन का पैमाना नहीं माना जाएगा।
कड़ा संदेश: टिकट की दावेदारी केवल और केवल पार्टी के तय सांगठनिक मंचों पर ही स्वीकार की जाएगी।
अनुशासन का चाबुक: सार्वजनिक मंचों, मीडिया या सोशल मीडिया पर खुद की ब्रांडिंग करने वाले नेताओं को पार्टी ने स्पष्ट रूप से अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दे दी है।
अंदरूनी कलह और गुटबाजी पर समय रहते प्रहार
भाजपा के इस कड़े फैसले के पीछे चुनावी रणनीति और आंतरिक अनुशासन दोनों शामिल हैं। दरअसल, एक ही सीट पर कई दावेदारों द्वारा खुद को ‘प्रत्याशी’ प्रोजेक्ट करने से कई व्यावहारिक दिक्कतें खड़ी हो रही थीं:
कार्यकर्ताओं में भ्रम: वर्तमान विधायकों के समानांतर चल रहे अभियानों से स्थानीय स्तर पर असमंजस की स्थिति बन रही थी।
गुटबाजी का खतरा: सोशल मीडिया की यह रेस धीरे-धीरे आपसी खींचतान और गुटबाजी में बदल रही थी, जिससे चुनाव से पहले संगठन को नुकसान पहुंच सकता था।
सिफारिश’ नहीं, ‘मल्टी-लेयर स्क्रूटनी’ से गुजरेगा नाम
पार्टी ने इस बार टिकट वितरण की प्रक्रिया को बेहद पारदर्शी और बहुस्तरीय बना दिया है। अब सीधे शीर्ष नेतृत्व के पास जाकर पैरवी करना काम नहीं आएगा।
मूल्यांकन के मुख्य बिंदु: दावेदार की जमीनी सक्रियता, संगठन के प्रति वफादारी, जनता में स्वीकार्यता और सबसे महत्वपूर्ण—‘विनेबिलिटी’ (जीतने की क्षमता)।
लक्ष्य 2027: हैट्रिक की तैयारी
भाजपा का यह कदम महज एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी (हैट्रिक) का रोडमैप है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि बड़ी जीत के लिए संगठन का एकजुट होना पहली शर्त है। इसलिए चुनाव से काफी पहले ही अनुशासन का लक्ष्मण रेखा खींच दी गई है।
विपक्षी दलों पर भी बढ़ेगा मनोवैज्ञानिक दबाव
डिजिटल माध्यमों पर खुद को चमकाने की यह प्रवृत्ति सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं है, कांग्रेस और अन्य दलों के नेता भी सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय हैं। हालांकि, भाजपा ने इस पर सबसे पहले औपचारिक पाबंदी लगाकर बढ़त बना ली है, जिससे अब अन्य राजनीतिक दलों पर भी अपनी आंतरिक व्यवस्था को दुरुस्त करने का दबाव बढ़ेगा।
पोस्टर से नहीं, परफॉर्मेंस से चमकेगी किस्मत
उत्तराखंड की राजनीति में यह एक बड़ा बदलाव है जहां टिकट मांगने की शैली पर पार्टी ने इतनी सख्त टिप्पणी की है। अब यह साफ हो चुका है कि आगामी चुनावों में ‘लाइक और शेयर’ नहीं, बल्कि ‘निष्ठा और अनुशासन’ टिकट की सबसे बड़ी कसौटी होंगे। भाजपा ने संदेश दे दिया है कि चुनावी टिकट सोशल मीडिया की रील्स से नहीं, बल्कि संगठन के कड़े मूल्यांकन से ही हासिल होगा।




