उत्तराखण्ड के राज्यपाल के रूप में 5 वर्ष का सफर
उत्तराखण्ड के राज्यपाल के रूप में 5 वर्ष का सफर राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह के लिए केवल एक प्रशासनिक सेवा की अवधि नहीं, बल्कि उनके जीवन की सबसे गहरा प्रभाव छोड़ने वाली और आत्मीय यात्रा बन गया है। देवभूमि उत्तराखण्ड के राजभवन में अपने कार्यकाल की इस महत्वपूर्ण अवधि को पूरा करने के उपलक्ष्य में लोक भवन परिसर में एक विशेष, गरिमापूर्ण और भावनाओं से भरपूर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर राज्यपाल ने अपने मन के उद्गार व्यक्त करते हुए प्रदेश की जनता, प्रशासनिक तंत्र और संपूर्ण लोक भवन परिवार के साथ बने अपने अटूट भावनात्मक रिश्तों को बहुत ही सहज और भावुक शब्दों में रेखांकित किया।
राज्यपाल ने अपने सैन्य जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए एक बेहद दिलचस्प और विचारणीय पहलू सामने रखा। उन्होंने याद दिलाया कि भारतीय सेना में लगभग चार दशकों की एक लंबी, अनुशासित और समर्पित सेवा के दौरान उन्हें कभी भी किसी एक सैन्य ठिकाने या स्थान पर लगातार तीन वर्षों से अधिक समय व्यतीत करने का अवसर नहीं मिला। सेना की गतिशील कार्यप्रणाली के कारण उनका जीवन हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान पर हस्तांतरित होता रहा। हालांकि, उत्तराखण्ड की इस पावन, शांत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध धरती पर उनके जीवन के पांच वर्ष किस तरह पलक झपकते ही बीत गए, इसका उन्हें और उनके करीबियों को आभास तक नहीं हुआ। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि देवभूमि का वातावरण, यहां की प्राकृतिक सुंदरता और यहां के लोगों का निस्वार्थ स्नेह कुछ ऐसा है जो समय के बीतने का अहसास ही नहीं होने देता।
इस विशेष अवसर को उन्होंने केवल अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों, प्रशासनिक आंकड़ों या किसी औपचारिक वार्षिक रिपोर्ट के प्रस्तुतीकरण का दिन मानने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। राज्यपाल ने साफ कहा कि यह दिन उपलब्धियों का ढोल पीटने का नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों के प्रति अपना सिर झुकाकर आभार प्रकट करने का एक बेहद पवित्र और संवेदनशील क्षण है, जिन्होंने पिछले पांच सालों में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। उन्होंने कहा कि एक संस्था के रूप में राजभवन और एक संपूर्ण राज्य के रूप में उत्तराखण्ड को आगे ले जाने की यह यात्रा किसी एक व्यक्ति की सफलता नहीं है। यह उन तमाम कर्मचारियों, अधिकारियों, विचारकों और आम नागरिकों का सामूहिक प्रयास है जिन्होंने एक परिवार के सदस्यों की तरह एक साथ मिलकर, एक ही दिशा में कदम बढ़ाए और इस पूरी यात्रा को वास्तविक अर्थों में सार्थक तथा यादगार बनाया।
इस भव्य और आत्मीय समारोह के दौरान राज्यपाल ने लोक भवन परिसर से जुड़े प्रत्येक कर्मचारी, राज्य के अलग-अलग हिस्सों में स्थित विश्वविद्यालयों के विद्वान कुलपतियों, शिक्षाशास्त्रियों, शोधकर्ताओं, ऊर्जावान युवा वर्ग, राज्य की मातृशक्ति यानी महिलाओं और उत्तराखण्ड के कोने-कोने में बसने वाले प्रत्येक नागरिक के प्रति अपनी ओर से गहरी कृतज्ञता और आदर भाव व्यक्त किया। उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि उत्तराखण्ड के निवासियों द्वारा दिए गए असीम प्यार, सम्मान, निरंतर सहयोग और हर कल्याणकारी पहल में उनकी उत्साही भागीदारी के बिना यह पांच वर्षों का लंबा सफर कभी भी इतना सुचारू, सफल और उपलब्धिपूर्ण नहीं बन सकता था। लोक भवन में आयोजित इस कार्यक्रम का पूरा वातावरण आत्मीयता, कृतज्ञता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना से ओत-प्रोत नजर आ रहा था।
लोक भवन के कर्मचारियों का सम्मान और सेवा भावना का अभिनंदन
अपने पांच वर्ष के इस सफल और निर्विघ्न कार्यकाल के पूर्ण होने के खास मौके पर आयोजित समारोह में राज्यपाल ने लोक भवन परिसर की व्यवस्थाओं को संभालने वाले और दिन-रात निष्ठापूर्वक अपनी सेवाएं देने वाले अधिकारियों से लेकर श्रेणी-चार तक के कर्मचारियों को विशेष रूप से याद किया और उन्हें मंच पर सम्मानित किया। उन्होंने वर्ष भर बेहतरीन, अनुशासित और अनुकरणीय कार्य करने वाले लोक भवन के कर्मियों की खुले दिल से प्रशंसा की और उन्हें स्मृति चिह्न व प्रशस्ति पत्र प्रदान कर उनका मनोबल बढ़ाया।
कर्मचारियों को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने एक बहुत ही व्यावहारिक और गहरी बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुनिया की किसी भी बड़ी से बड़ी संस्था, राजभवन या सरकारी कार्यालय की वास्तविक पहचान, सफलता और गरिमा उसकी भव्य इमारतों या ऊंची दीवारों से तय नहीं होती, बल्कि उसमें काम करने वाले अंतिम व्यक्ति की ईमानदारी, समर्पण और कार्य संस्कृति से तय होती है। यदि संस्था की बुनियाद में काम करने वाले लोग अपने काम को पूजा मानकर करते हैं, तो वह संस्था अपने आप सफलता की नई ऊंचाइयों को छू लेती है।
सम्मानित होने वाले कर्मचारियों का उत्साह और गौरव बढ़ाते हुए राज्यपाल ने जोर देकर कहा कि आज मंच से दिया जा रहा यह सम्मान केवल कुछ गिने-चुने अधिकारियों या कर्मचारियों की व्यक्तिगत उपलब्धि का पुरस्कार नहीं है। बल्कि, यह लोक भवन परिसर के भीतर दिन-रात बिना थके काम करने वाले पूरे तंत्र, उसकी अखंड मेहनत, आपसी तालमेल और काम के प्रति गहरी आत्मीयता का एक सामूहिक और सार्वजनिक सम्मान है।
उन्होंने कहा कि यहां तैनात प्रत्येक व्यक्ति ने अपनी सौंपी गई जिम्मेदारियों को महज एक औपचारिक सरकारी नौकरी या ड्यूटी समझकर नहीं निभाया, बल्कि राजभवन को अपना घर और यहां के कार्यों को अपना पारिवारिक दायित्व मानकर पूरे दिल से पूरा किया है। इसी सकारात्मक सोच और अपनेपन की भावना ने लोक भवन के कार्य माहौल को एक आदर्श और अनुकरणीय रूप प्रदान किया है।
‘आत्मा के स्वर-05’ और महत्वपूर्ण पुस्तकों का भव्य विमोचन
ज्ञान, साहित्य और वैचारिक मंथन के लिहाज से भी लोक भवन में आयोजित यह समारोह अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सिद्ध हुआ। इस विशेष अवसर पर राज्यपाल ने लोक भवन सूचना परिसर द्वारा बेहद लगन के साथ तैयार और प्रकाशित की गई एक विशेष पुस्तक ‘आत्मा के स्वर-05’ का औपचारिक विमोचन किया। यह पुस्तक केवल पन्नों का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि इसमें राज्यपाल द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान राज्य के विभिन्न दूरदराज के इलाकों, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक सम्मेलनों, सैन्य समारोहों और सरकारी मंचों पर दिए गए अत्यंत प्रेरणादायक, दिशा-निर्देशात्मक और नीतिगत भाषणांे का प्रामाणिक व सुंदर संकलन किया गया है। यह पुस्तक शोधकर्ताओं और आने वाले समय के प्रशासकों के लिए राज्य के विकास से जुड़े विभिन्न मुद्दों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम साबित होगी।
साहित्यिक और बौद्धिक जगत को समृद्ध करने की इसी कड़ी में, राज्य में उच्च शिक्षा की अलख जगा रहे उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा तैयार और प्रकाशित की गई तीन अत्यंत प्रासंगिक और दूरगामी सोच वाली पुस्तकों का भी राज्यपाल द्वारा विमोचन संपन्न हुआ। इनमें से पहली पुस्तक 21वीं सदी की चुनौतियों और अवसरों पर बहुत ही गहराई और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रकाश डालती है, जिसमें यह बताया गया है कि तेजी से बदलती इस आधुनिक दुनिया में एक पहाड़ी राज्य किस तरह आने वाली नई चुनौतियों का सामना कर सकता है।
दूसरी पुस्तक भारत को वर्ष 2047 तक पूरी तरह से आत्मनिर्भर, समावेशी, मजबूत और सतत विकास के रास्ते पर चलने वाला एक सशक्त राष्ट्र बनाने के विजन और आवश्यक कदमों पर केंद्रित है।
वहीं, विमोचित की गई तीसरी पुस्तक पूरी तरह से राज्य के विकास पर केंद्रित है, जिसका शीर्षक विकसित उत्तराखण्ड है। यह पुस्तक राज्यपाल के उन पांच सपनों और दूरदर्शी दृष्टिकोण को रेखांकित करती है, जिन्हें उन्होंने राज्य के संतुलित, सर्वांगीण और टिकाऊ विकास के लिए अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य माना है। यह पुस्तकें राज्य के भावी विकास का एक स्पष्ट खाका पेश करती हैं।
गढ़वाली बोली को डिजिटल युग से जोड़ने वाला एआई आधारित ‘गढ़ संवाद’ ऐप
क्षेत्रीय भाषाओं, बोली-भाषाओं के संरक्षण और स्थानीय लोक संस्कृति को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की दिशा में इस ऐतिहासिक समारोह के दौरान एक बेहद अनूठी और क्रांतिकारी पहल देखने को मिली। श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ दल द्वारा विशेष प्रयासों से विकसित किए गए एक अत्याधुनिक और अनूठे ऐप ‘गढ़ संवाद’ का राज्यपाल द्वारा विधिवत शुभारंभ और लोकार्पण किया गया। यह ऐप पूरी तरह से आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक पर आधारित एक डिजिटल भाषा संवाद मंच है, जो उत्तराखण्ड की लोक बोली गढ़वाली को डिजिटल दुनिया की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करता है।
इस तकनीक आधारित पहल के दूरगामी महत्व को समझाते हुए यह स्पष्ट किया गया कि ‘गढ़ संवाद’ ऐप का मूल उद्देश्य केवल एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा में बदलना या महज अनुवाद करना भर नहीं है। इसका असली और व्यापक मकसद उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों की अति समृद्ध लोक संस्कृति, सदियों पुरानी मौखिक परंपराओं, लोक कथाओं, गीतों और आंचलिक पहचान को आधुनिक डिजिटल माध्यमों के सहारे सुरक्षित रखना है।
अक्सर यह देखा गया है कि पलायन और आधुनिकता की दौड़ में नई पीढ़ी अपनी मूल भाषा और बोली से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित यह भाषा मंच देश-विदेश में रहने वाले उत्तराखण्ड के युवाओं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से बहुत ही आसान और मनोरंजक तरीके से जोड़े रखने में एक मील का पत्थर साबित होगा। इसके जरिए गढ़वाली बोली को वैश्विक स्तर पर एक नई और स्थायी डिजिटल पहचान हासिल होगी।
पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला से सजा लोक भवन का नया भव्य प्रवेश द्वार
लोक भवन परिसर में आयोजित मुख्य समारोह की शुरुआत होने से ठीक पहले, राज्यपाल ने राजभवन परिसर के नवनिर्मित और बेहद सुंदर मुख्य प्रवेश द्वार-3 का औपचारिक उद्घाटन व लोकार्पण किया। यह नव निर्मित भव्य प्रवेश द्वार किसी साधारण निर्माण कार्य जैसा नहीं है, बल्कि इसे पूरी तरह से उत्तराखण्ड की गौरवशाली और पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला और स्थापत्य शैली को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें लकड़ी, पत्थर और पारंपरिक नक्काशी का ऐसा अद्भुत तालमेल देखने को मिलता है, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक निर्माण कला की सुंदर कहानी बयां करता है।
यह प्रवेश द्वार न केवल लोक भवन परिसर की स्थापत्य सुंदरता में अभूतपूर्व वृद्धि करता है, बल्कि राजभवन में प्रवेश करने वाले हर एक अतिथि, पर्यटक और नागरिक को पहली ही नजर में उत्तराखण्ड की जीवंत लोक कला और स्थापत्य परंपरा का साक्षात अहसास भी कराता है।
लोकार्पण के पश्चात राज्यपाल ने इस खूबसूरत और दर्शनीय निर्माण कार्य को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने के लिए लोक निर्माण विभाग के कुशल इंजीनियरों, प्रशासनिक अधिकारियों, सुपरवाइजरों और सबसे बढ़कर दिन-रात पसीना बहाकर निर्माण कार्य में जुटे रहने वाले निर्माण श्रमिकों की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि बहुत ही सीमित समय सीमा के भीतर इतनी उच्च गुणवत्ता, बारीकी और स्थापत्य नियमों का पालन करते हुए ऐसा आकर्षक प्रवेश द्वार खड़ा कर देना वास्तव में संबंधित विभाग और श्रमिकों की उत्कृष्ट कार्यकुशलता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। राज्यपाल ने इस निर्माण से जुड़े हर एक व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रयासों की सराहना की।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और गणमान्य हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति
राजभवन के इस विशेष आयोजन के दौरान लोक भवन के सचिव ने अपना औपचारिक स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने राजभवन के पूरे परिवार की ओर से राज्यपाल का तहे दिल से स्वागत करते हुए उनके पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान मिले निरंतर, कुशल और संवेदनशील मार्गदर्शन के लिए गहरा आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल के दूरदर्शी नेतृत्व ने लोक भवन के काम करने के तरीके को एक नई दिशा और नई ऊर्जा दी है।
कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी तथा स्मरणीय बनाने के उद्देश्य से राज्यपाल के पांच वर्षों के लंबे प्रशासनिक कार्यकाल, उनकी प्रमुख सामाजिक व शैक्षणिक पहलों, जनकल्याणकारी योजनाओं और राज्य के हित में लिए गए फैसलों पर आधारित एक बेहद प्रभावकारी संक्षिप्त वृत्तचित्र फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। इस वृत्तचित्र के माध्यम से उपस्थित दर्शकों को राज्यपाल की पांच वर्षों की पूरी यात्रा को एक नजर में देखने और समझने का मौका मिला, जिसे वहां मौजूद सभी गणमान्य अतिथियों ने काफी सराहा।
समारोह के अंतिम चरण में स्कूली बालिकाओं और नन्हीं बच्चियों द्वारा उत्तराखण्ड के पारंपरिक लोक नृत्यों और गीतों पर आधारित रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। बच्चियों की मनमोहक प्रस्तुति, उनके पारंपरिक परिधानों और लयबद्ध प्रदर्शन ने समारोह हॉल में मौजूद हर एक व्यक्ति का मन मोह लिया और पूरा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
इस गरिमापूर्ण और ऐतिहासिक अवसर पर राजभवन की प्रथम महिला श्रीमती गुरमीत कौर की विशेष उपस्थिति रही। इसके अलावा राज्यपाल के सचिव, राजभवन के वरिष्ठ विधि परामर्शी, अपर सचिव, वित्त नियंत्रक, सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक सहित राज्य के अलग-अलग राजकीय और निजी विश्वविद्यालयों से आए माननीय कुलपतिगण, शिक्षाविद, समाजशास्त्री और लोक भवन परिसर के तमाम वरिष्ठ व कनिष्ठ अधिकारी तथा कर्मचारी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। इस पूरे आयोजन ने न केवल राज्यपाल के 5 वर्षों के सफल कार्यकाल पर विराम लगाया, बल्कि राजभवन के इतिहास में आत्मीयता, सम्मान और सांस्कृतिक गौरव का एक नया अध्याय भी जोड़ दिया।


