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कुमाऊं मंडल में प्रशासनिक पारदर्शिता की मिसाल बने कमिश्नर दीपक रावत; हल्द्वानी जनसुनवाई में फरियादियों को मिला त्वरित न्याय

कुमाऊं मंडल में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जनता के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में हल्द्वानी स्थित कैंप कार्यालय में आयोजित होने वाली जनसुनवाई आम जनता के लिए एक बड़ी राहत का केंद्र बनती जा रही है। हाल ही में आयुक्त और सचिव मुख्यमंत्री दीपक रावत द्वारा शनिवार को हल्द्वानी कैंप कार्यालय में एक व्यापक जनसुनवाई का आयोजन किया गया। इस जनसुनवाई में दूर-दराज के क्षेत्रों से आए नागरिकों ने अपनी विभिन्न समस्याओं को प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष रखा। भूमि विवाद, आपसी लेन-देन, पारिवारिक कलह, श्रम विभाग से जुड़ी सहायता और रोजगार से जुड़े मामलों पर जिस प्रकार तत्परता से और आपसी सहमति के आधार पर निर्णय लिए गए, उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान भी बहुत कम समय में संभव है। यह पूरी प्रक्रिया केवल कुछ शिकायतों के निस्तारण तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र और आम नागरिक के बीच विश्वास की एक नई मिसाल पेश करती है।

जनसुनवाई की परम्परा और जमीनी हकीकत

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ जनता की समस्याओं का समय पर समाधान होना है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि आम आदमी छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों, जमीनी विवादों और दस्तावेजों के फेर में महीनों और वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर काटता रहता है। ऐसे में हल्द्वानी में आयोजित होने वाली यह जनसुनवाई व्यवस्था की सुस्ती को तोड़ने का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है। शनिवार को आयोजित इस कार्यक्रम में सुबह से ही लोगों की भारी भीड़ देखने को मिली। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा और समस्या के समाधान की उम्मीद लेकर अधिकारी के सामने उपस्थित हुआ था।

दीपक रावत की कार्यशैली हमेशा से आम जनता के बीच उनकी समस्याओं का मौके पर ही निपटारा करने के लिए जानी जाती है। इस जनसुनवाई में भी उन्होंने न केवल कागजी दलीलों को सुना, बल्कि दोनों पक्षों आमने-सामने बैठाकर उनकी बात को पूरी गंभीरता से समझा। भूमि क्रय-विक्रय से जुड़े विवादों से लेकर पारिवारिक और श्रम विवादों तक, हर मामले पर गहराई से विचार किया गया। यह इस बात का प्रमाण है कि संवाद के जरिए कई ऐसे मामलों को सुलझाया जा सकता है, जो अदालतों में जाने पर सालों तक उलझे रहते हैं।

भूमि विवाद और दाखिल-खारिज की जटिलताएं: एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती

आज के दौर में भूमि और संपत्ति से जुड़े विवाद अदालतों और थानों में सबसे अधिक संख्या में दर्ज होते हैं। हल्द्वानी की इस जनसुनवाई में भी भूमि से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए, जिन्होंने आम आदमी की परेशानियों को उजागर किया। उदाहरण के लिए, भगवती देवी नामक एक शिकायतकर्ता ने बताया कि उन्होंने कमोला क्षेत्र में एक प्लॉट खरीदा था जिसकी रजिस्ट्री तो पूरी हो चुकी थी, लेकिन उसका दाखिल-खारिज नहीं हो पा रहा था। इसके पीछे की वजह यह थी कि मूल भू-स्वामी ने बैंक से लोन ले रखा था और उसकी किस्तें समय पर जमा नहीं की गई थीं।

इस मामले में प्रशासनिक संवेदनशीलता और सख्ती दोनों का अनूठा उदाहरण देखने को मिला। आयुक्त ने तुरंत कार्रवाई करते हुए क्रेता और विक्रेता दोनों को तलब किया। पूरी स्थिति का आकलन करने के बाद विक्रेता को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वह पंद्रह दिनों के भीतर बैंक में शेष बची दो लाख साठ हजार रुपये की धनराशि जमा कराए। साथ ही यह भी चेतावनी दी गई कि यदि तय सीमा के भीतर यह राशि जमा नहीं की जाती है, तो कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि किसी तीसरे पक्ष की लापरवाही के कारण आम नागरिक को परेशान नहीं होने दिया जाएगा।

इसी प्रकार, एक अन्य मामले में वैद्यनाथ महतो ने पंतनगर में एक प्लॉट के सौदे से जुड़ी समस्या रखी। पंद्रह लाख सत्तर हजार रुपये में खरीदे गए इस प्लॉट की समय-सीमा जून तक तय थी, लेकिन शेष सात लाख पचास हजार रुपये समय पर न चुकाए जाने के कारण रजिस्ट्री नहीं हो पाई थी। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद आयुक्त ने आपसी सहमति से विक्रेता कैलाश कर्नाटक को निर्देश दिए कि वे खरीदार को उसकी धनराशि वापस लौटाएं। ऐसे स्पष्ट और तार्किक निर्णय वित्तीय लेन-देन के मामलों में पारदर्शिता लाते हैं और लोगों का उत्पीड़न रोकते हैं।

अवैध साहूकारी और ब्याज के जाल पर प्रशासनिक चाबुक

जनसुनवाई के दौरान एक बेहद गंभीर मुद्दा सामने आया जो सीधे तौर पर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के शोषण से जुड़ा हुआ था। ब्याज पर पैसे देने और अवैध साहूकारी के मामलों की जब शिकायतें आईं, तो प्रशासन ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाया। इस संबंध में स्पष्ट किया गया कि कानून के दायरे से बाहर जाकर ब्याज पर कर्ज देने का व्यवसाय करना पूरी तरह गैरकानूनी है।

साहूकारी कानून के नियमों के अनुसार, यदि कोई भी व्यक्ति या संस्था ब्याज पर कर्ज देने का कारोबार करना चाहती है, तो उसके लिए जिला कलेक्टर या संबंधित राजस्व विभाग से वैध साहूकारी लाइसेंस लेना अनिवार्य होता है। कई बार ऐसा देखा जाता है कि भोले-भाले ग्रामीण और मजदूर वर्ग के लोग संकट के समय निजी साहूकारों से भारी-भरकम ब्याज पर कर्ज ले लेते हैं और फिर ब्याज के इस अंतहीन चक्र में फंसकर अपनी जमीनों और संपत्ति से हाथ धो बैठते हैं। बिना लाइसेंस के इस प्रकार का अवैध कारोबार चलाने वालों के खिलाफ प्रशासन की यह चेतावनी समाज में आर्थिक सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है।

पारिवारिक सामंजस्य और मानवीय दृष्टिकोण के फैसले

प्रशासन का काम केवल कागजी दस्तावेजों और राजस्व मामलों को सुलझाना ही नहीं है, बल्कि समाज के मानवीय पक्षों और पारिवारिक ताने-बाने को बचाना भी एक जिम्मेदार अधिकारी का कर्तव्य होता है। इस जनसुनवाई में कुछ ऐसे मामले भी आए जो व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन से जुड़े हुए थे।

उदाहरण के तौर पर, विनोद कुमार और संध्या के प्रकरण में पारिवारिक विवाद के चलते एक पक्ष द्वारा सामान रोके जाने की शिकायत की गई थी। आयुक्त ने दोनों पक्षों की बात को बेहद धैर्य और संवेदनशीलता के साथ सुना। इसके बाद विनोद कुमार को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे अपनी पत्नी का सामान तुरंत वापस करें। साथ ही यह भी चेतावनी दी गई कि यदि इस आदेश का पालन नहीं किया गया, तो नियमानुसार सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा, गौरी देवी द्वारा भरण-पोषण का अनुरोध किए जाने जैसे मामलों में भी प्रशासन ने पूरी सहानुभूति दिखाते हुए उचित दिशा-निर्देश दिए। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक अधिकारी केवल फाइलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज की मानवीय संवेदनाओं को भी पूरी तरह समझते हैं।

श्रमिकों के अधिकार और रोजगार की सुरक्षा

किसी भी विकासशील समाज में श्रम करने वाले वर्ग का सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा करना सरकार और प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। जनसुनवाई में सविता नामक शिकायतकर्ता ने वर्षों से कार्यरत श्रमिकों की बहाली और उनका पुराना बकाया वेतन दिलाए जाने की गुहार लगाई।

इस मामले में संज्ञान लेते हुए आयुक्त ने संबंधित संस्थान को स्पष्ट निर्देश दिए कि भविष्य में जब कभी भी उस संस्थान में किसी पद पर रिक्ति यानी खाली जगह निकलती है, तो शिकायतकर्ता को प्राथमिकता दी जाए। इसके साथ ही, श्रम विभाग के माध्यम से मिलने वाली आर्थिक सहायता के मामलों पर भी ध्यान दिया गया, जैसे कि कमला चौहान द्वारा अपनी बेटी के विवाह के लिए आर्थिक मदद का अनुरोध। इन सभी मामलों में यह सुनिश्चित किया गया कि जरूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचे और उनके अधिकारों का हनन न हो।

निर्माण कार्यों से जुड़े विवादों में भी इसी प्रकार की पारदर्शिता अपनाई गई। भिकियासैंण की रहने वाली जानकी शर्मा ने अपने निर्माण कार्य का उचित वैल्यूएशन कराए जाने की शिकायत दर्ज कराई थी। प्रशासन ने तुरंत संबंधित अधिकारियों को आदेश दिए कि वे निर्माण कार्य का सही आकलन करें और जो भी शेष धनराशि बनती है, उसे शिकायतकर्ता को वापस लौटाना सुनिश्चित करें।

पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन की आवश्यकता

हल्द्वानी में आयोजित यह जनसुनवाई इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब प्रशासनिक तंत्र जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनता है, तो जनता का शासन और प्रशासन दोनों पर विश्वास मजबूत होता है। एक तरफ जहां भूमि विवादों और वित्तीय लेन-देन में त्वरित न्याय दिया गया, वहीं दूसरी तरफ अवैध साहूकारी जैसी सामाजिक बुराइयों पर लगाम कसने का संदेश भी स्पष्ट रूप से दिया गया। इस प्रकार के आयोजन न केवल लोगों के समय और धन की बचत करते हैं, बल्कि अदालतों पर पड़ने वाले मुकदमों के बोझ को भी कम करते हैं। आने वाले समय में यदि देश के हर कोने में ऐसी ही संवेदनशील और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था लागू हो जाए, तो आम नागरिक का जीवन और अधिक सुगम और न्यायपूर्ण बन सकता है।

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