दिव्यांग जनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और जीवन के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक शासन तथा प्रशासन की सुविधाओं को पहुंचाने का जो संकल्प जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने लिया है, वह एक सशक्त लोकतंत्र की सबसे बड़ी मिसाल है। जब बात उन विशेष नागरिकों की आती है जो शारीरिक या मानसिक रूप से किसी चुनौती का सामना कर रहे हैं, तो जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के मार्गदर्शन में प्रशासन की जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। हमारे देश में उनके जीवन को सुगम बनाने, उन्हें आत्मनिर्भर करने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े प्रशासनिक बदलाव देखने को मिले हैं, और इसी कड़ी में जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की विशेष पहल पर उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक सराहनीय कदम को अमलीजामा पहनाया गया है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के निर्देशन में प्रशासन ने अभूतपूर्व सक्रियता दिखाते हुए विशेष दिव्यांग शिविरों का आयोजन किया, जिनका मुख्य उद्देश्य उन तमाम जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना था जो कागजी औपचारिकताओं और भागदौड़ के डर से सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की इस दूरदर्शी और संवेदनशील पहल ने न केवल प्रशासनिक प्रतिबद्धता को दर्शाया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो आम आदमी और विशेष नागरिकों का जीवन कितना सुलभ हो सकता है।
प्रशासनिक इच्छाशक्ति और विशेष शिविरों की रूपरेखा
किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह योजना कार्यालयों से निकलकर सीधे जनता के द्वार तक कितनी प्रभावी रूप से पहुंचती है। देहरादून जिले में आयोजित इन विशेष दिव्यांग शिविरों की सफलता के पीछे एक मजबूत प्रशासनिक सोच और सुदृढ़ कार्ययोजना काम कर रही थी। जिला प्रशासन की ओर से यह पहल यह सुनिश्चित करने के लिए की गई थी कि दिव्यांग जनों को अपने प्रमाण पत्र बनवाने या अन्य सुविधाओं के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। जिला समाज कल्याण विभाग, स्वास्थ्य विभाग और जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्र ने आपसी तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया। जब स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता एक ही छत के नीचे या एक ही प्रांगण में उपलब्ध होते हैं, तो लाभार्थी के लिए प्रक्रिया बेहद सरल हो जाती है। इन शिविरों की रूपरेखा इस प्रकार तैयार की गई थी कि पंजीकरण से लेकर चिकित्सीय परीक्षण और प्रमाण पत्र जारी करने तक का सारा काम बिना किसी रुकावट के एक ही दिन में पूरा हो सके।
विकासखंडवार शिविरों का सफर और जनसहभागिता
अक्टूबर के महीने में देहरादून जिले के अलग-अलग विकासखंडों और क्षेत्रों में सिलसिलेवार तरीके से चार विशेष शिविरों का आयोजन किया गया था। इन शिविरों की श्रृंखला ने यह साबित कर दिया कि जब प्रशासन खुद चलकर जनता के पास जाता है, तो सहभागिता स्वतः बढ़ जाती है। रायपुर विकासखंड के अंतर्गत गांधी शताब्दी अस्पताल में आयोजित शिविर से लेकर डोईवाला परिसर, मेहूंवाला राजकीय इंटर कॉलेज और शिमला बाईपास क्षेत्र के रिसॉर्ट में आयोजित शिविरों तक, हर जगह भारी संख्या में लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इन चार अलग-अलग स्थानों पर कुल डेढ़ सौ से अधिक दिव्यांग जनों को मौके पर ही दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी किए गए। यह आंकड़े केवल कुछ कागजों का हिसाब नहीं हैं, बल्कि यह उन डेढ़ सौ परिवारों के चेहरों पर आई मुस्कान का प्रतीक हैं, जिन्हें अब अपनी पहचान और अधिकारों के लिए किसी लंबी कानूनी या प्रशासनिक लड़ाई का सामना नहीं करना पड़ा। रायपुर में 31, डोईवाला में 39, मेहूंवाला में 26 और शेरपुर क्षेत्र में 54 प्रमाण पत्रों का वितरण यह बताता है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में ऐसी पहलों की कितनी गहरी और वास्तविक भूख थी।
चिकित्सा परीक्षण और आधुनिक तकनीकि का समन्वय
दिव्यांगता प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया पहले काफी जटिल मानी जाती थी, जिसमें लोगों को कई दिन बर्बाद करने पड़ते थे। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में आधुनिक तकनीक और चिकित्सा विज्ञान के तालमेल ने इसे बेहद पारदर्शी और सरल बना दिया है। इन शिविरों में आने वाले आवेदकों का सबसे पहले स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा बारीकी से परीक्षण किया गया। इसके बाद एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी की गई। इस पोर्टल पर दर्ज जानकारी के आधार पर योग्य चिकित्सकों ने अपनी रिपोर्ट तैयार की, जिसके पश्चात मुख्य चिकित्सा अधिकारी के स्तर से प्रमाण पत्र जारी किए गए। इस पूरी प्रक्रिया में डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह खत्म हो गई और पूरी व्यवस्था में पूरी तरह से पारदर्शिता बनी रही। किसी भी पात्र व्यक्ति को अपनी पात्रता साबित करने के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा, जो कि सुशासन की एक बहुत बड़ी खूबी है।
सहायक उपकरणों का चिह्नीकरण और भविष्य की उम्मीदें
केवल प्रमाण पत्र बनवाना ही किसी दिव्यांगजन के जीवन को पूरी तरह सुगम नहीं बना सकता, बल्कि उसकी शारीरिक जरूरतों के हिसाब से उसे आधुनिक सहायक उपकरण मिलना भी उतना ही जरूरी है। इन शिविरों का एक और बेहद महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इनमें केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहकर, प्रधानमंत्री दिव्यांग सहायता केंद्र के माध्यम से पात्र व्यक्तियों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सहायक उपकरणों के लिए चिह्नित भी किया गया। इसमें कृत्रिम अंग, ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर, कान की मशीन और अन्य जरूरी उपकरण शामिल हैं। जब एक व्यक्ति को उसकी शारीरिक क्षमता के अनुरूप उपकरण मिल जाते हैं, तो वह अपनी दैनिक गतिविधियों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय आत्मकेंद्रित और आत्मनिर्भर हो जाता है। यह कदम केवल भौतिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके भीतर आत्मविश्वास की एक नई अलख जगाने का काम करता है।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: आत्मनिर्भरता की ओर एक नया सफर
इस प्रकार के विशेष शिविरों का समाज पर बहुत दूरगामी और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब किसी परिवार में कोई दिव्यांग व्यक्ति होता है, तो पूरा परिवार मानसिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर संघर्ष कर रहा होता है। दिव्यांगता प्रमाण पत्र और यूडीआईडी कार्ड मिल जाने के बाद उस व्यक्ति के लिए सरकारी पेंशन योजनाओं, रेल-बस यात्रा में छूट, नौकरियों में आरक्षण और स्वरोजगार के लिए मिलने वाले ऋण के दरवाजे खुल जाते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह एक बहुत बड़ा संबल साबित होता है। जब सरकार और समाज मिलकर इन लोगों का हाथ थामते हैं, तो उनका मनोबल बढ़ता है और वे समाज में एक सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकारी बनते हैं। यह पहल दिखाती है कि कैसे जमीनी स्तर पर प्रशासनिक संवेदनशीलता समाज के सबसे पिछले हिस्से को मजबूत कर सकती है।
देहरादून जिले में आयोजित यह विशेष दिव्यांग शिविर इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि जब नीतियां जनता की भावनाओं को समझकर और उनकी जमीनी जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, तो उनके परिणाम कितने शानदार होते हैं। डेढ़ सौ से अधिक लोगों को प्रमाण पत्र जारी करना और दर्जनों लोगों को सहायक उपकरणों के लिए चिह्नित करना महज एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह मानवता और कर्तव्यनिष्ठा का एक बेहतरीन दस्तावेज है। यदि इसी प्रकार की संवेदनशीलता और सक्रियता देश के हर कोने में लगातार दिखाई जाती रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब कोई भी विशेष नागरिक खुद को अकेला या असहाय महसूस नहीं करेगा। ऐसे प्रयास हमारे प्रशासनिक ढांचे को और अधिक मानवीय बनाते हैं और एक समावेशी समाज के निर्माण में मील का पत्थर साबित होते हैं।


