देवभूमि उत्तराखंड के टिहरी जिले में स्थित नरेंद्र नगर अपने प्राकृतिक सौंदर्य और सिद्धपीठ मां कुंजापुरी मंदिर के कारण पूरे देश में एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान रखता है। प्रतिवर्ष नवरात्रि के पावन अवसर पर यहाँ आयोजित होने वाला ऐतिहासिक कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेला केवल एक स्थानीय आयोजन नहीं है, बल्कि यह लोक आस्था, जन-संस्कृति और मां भगवती की उपासना का एक बहुत बड़ा संगम है। इस वर्ष का कुंजापुरी मेला स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं के लिए अत्यधिक उत्साह और भक्तिमय माहौल लेकर आया था। लेकिन मेले की एक सांस्कृतिक संध्या उस समय अचानक गहरे विवादों के घेरे में आ गई, जब देश के जाने-माने पंजाबी गायक दिलेर मेहंदी के मंच पर प्रदर्शन के दौरान एक अभूतपूर्व स्थिति उत्पन्न हो गई।
प्रसिद्ध गायक दिलेर मेहंदी मंच पर अपने लोकप्रिय गीतों से वहां उपस्थित हजारों की भीड़ का मनोरंजन कर रहे थे। दर्शक झूम रहे थे और माहौल पूरी तरह से संगीतमय बना हुआ था। इसी बीच अचानक उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री और स्थानीय नरेंद्र नगर विधायक सुबोध उनियाल सीधे मंच पर पहुँच गए। उन्होंने जो कदम उठाया, उसकी उम्मीद न तो मंच पर मौजूद कलाकारों को थी और न ही सामने बैठी जनता को। मंत्री सुबोध उनियाल ने गायक दिलेर मेहंदी के गायन और उनके शारीरिक हाव-भाव पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने सीधे तौर पर दिलेर मेहंदी पर आरोप लगाया कि वे अत्यधिक शराब के नशे में हैं और इस अवस्था में मंच से कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे हैं। मंत्री ने भरे मंच से गायक को बीच में ही अपना गाना रोकने का स्पष्ट निर्देश दिया और सरेआम उन्हें कड़ी फटकार लगाई।
कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने मंच का माइक हाथ में लेकर बहुत ही कड़े और कड़े शब्दों में कहा कि यह आयोजन केवल मनोरंजन का साधारण मंच नहीं है, बल्कि यह मां दुर्गा की आराधना और पावन नवरात्रि का एक पवित्र धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है। उन्होंने गायक को टोकते हुए कहा कि ऐसे पावन और पवित्र अवसर पर शराब के नशे में धुत होकर मंच पर उतरना और कार्यक्रम प्रस्तुत करना पूरी तरह से अनुचित और मर्यादा के विपरीत है। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि जब कलाकार से ठीक से बोलते भी नहीं बन रहा हो, तो वह क्या गाना गाएगा। इस तीखी प्रतिक्रिया के बाद मेले का पूरा माहौल स्तब्ध रह गया। कुछ ही पलों में यह घटना सोशल मीडिया, क्षेत्रीय समाचार माध्यमों और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गई।
लोक कला, आस्था और सार्वजनिक मंचों का गौरवशाली इतिहास
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में मेलों और सांस्कृतिक उत्सवों की एक लंबी और बेहद समृद्ध परंपरा रही है। देवभूमि के हर मेले का जुड़ाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय देवी-देवताओं, पौराणिक लोककथाओं और अध्यात्म से होता है। कुंजापुरी मेला इसी कड़ी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्तंभ है।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो इस मेले का प्राथमिक उद्देश्य स्थानीय लोक संस्कृति का संरक्षण, कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना और जन-सामान्य को एक सूत्र में पिरोना रहा है। समय के साथ-साथ मेले का स्वरूप बदला और इसे व्यापक पहचान देने के लिए देश के प्रसिद्ध कलाकारों, गायकों और सांस्कृतिक दलों को आमंत्रित किया जाने लगा।
जब किसी बड़े और प्रतिष्ठित मंच पर राष्ट्रीय स्तर का कोई कलाकार आता है, तो आयोजकों और दर्शकों दोनों की अपेक्षाएँ बहुत बढ़ जाती हैं। कलाकार केवल अपनी कला का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि वह उस पावन मंच की मर्यादा और स्थानीय भावनाओं का प्रतिनिधि भी बन जाता है। कुंजापुरी जैसे मेले में, जहाँ दिन के समय मां भगवती के पूजन-अर्चन की गूंज होती है और संध्या समय सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, वहाँ मंच का आचरण और भी अधिक संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
घटना का विश्लेषण:
यह मामला केवल एक मंत्री और एक गायक के बीच की कहासुनी का नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक मंचों पर कलाकारों के जिम्मेदारी पूर्ण आचरण और आयोजकों की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ विषय है।
जब कोई बड़ा कलाकार किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मेले में आमंत्रित किया जाता है, तो उसके पीछे भारी-भरकम बजट, प्रशासनिक तैयारियाँ और आम जनता की असीम आस्था जुड़ी होती है।
जनभावनाओं और धार्मिक गरिमा का सम्मान: उत्तराखंड में नवरात्रि के दौरान आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को केवल मनोरंजन के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। यहाँ के लोगों के लिए मां कुंजापुरी का स्थान अत्यंत पूजनीय है। ऐसे में यदि मंच पर मौजूद मुख्य कलाकार के आचरण या शारीरिक स्थिति को लेकर कोई सवाल उठता है, तो उसका सीधा प्रभाव जनता की धार्मिक भावनाओं पर पड़ता है।
सार्वजनिक जीवन में जनप्रतिनिधि की भूमिका: स्थानीय विधायक और कैबिनेट मंत्री का मंच पर जाकर हस्तक्षेप करना कई लोगों के लिए अप्रत्याशित हो सकता है, लेकिन एक जनप्रतिनिधि होने के नाते मंच की गरिमा और मेले के पवित्र उद्देश्य की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता में शामिल होता है। सुबोध उनियाल का यह कदम यह दर्शाता है कि प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों को सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों की रक्षा के लिए त्वरित निर्णय लेने से हिचकिचाना नहीं चाहिए।
कलाकार का उत्तरदायित्व: किसी भी कलाकार की प्रतिभा चाहे कितनी भी विशाल क्यों न हो, सार्वजनिक जीवन और विशेषकर लोक मंचों पर संयम और सुचिता का पालन करना उसकी नैतिक जिम्मेदारी होती है। शराब या किसी भी प्रकार के नशे की अवस्था में धार्मिक पर्वों के मंच पर आना कला और दर्शकों दोनों का अपमान माना जाता है।
व्यावसायिकता बनाम नैतिक मूल्य: मनोरंजन उद्योग के सामने प्रश्न
आज के आधुनिक दौर में सांस्कृतिक और पर्यटन मेलों का स्वरूप बहुत हद तक व्यावसायिक हो चुका है। बड़े-बड़े इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों को इन कार्यक्रमों के आयोजन का जिम्मा दिया जाता है। लाखों रुपये की फीस देकर नामी कलाकारों को बुलाया जाता है ताकि अधिक से अधिक भीड़ जुटाई जा सके। लेकिन इस पूरी व्यावसायिक प्रक्रिया में अक्सर नैतिक मूल्यों, स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को पीछे छोड़ दिया जाता है।
इस घटना ने देश भर के इवेंट आयोजकों और सांस्कृतिक विभागों के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं:
कलाकारों के चयन का आधार क्या हो? क्या केवल लोकप्रियता और भीड़ खींचने की क्षमता ही किसी कलाकार को आमंत्रित करने का एकमात्र पैमाना होना चाहिए?
अनुबंध की शर्तें और आचरण नियमावली: क्या सांस्कृतिक और धार्मिक मेलों के लिए कलाकारों के साथ किए जाने वाले समझौतों में आचरण और गरिमा से जुड़ी सख्त शर्तें शामिल की जानी चाहिए?
बैकस्टेज निगरानी की व्यवस्था: मंच पर चढ़ने से पहले क्या कलाकारों की स्थिति और उनकी तत्परता की जाँच करने का कोई तंत्र होना चाहिए?
इन प्रश्नों का उत्तर खोजे बिना भविष्य में इस तरह के विवादों को रोकना असंभव होगा। मनोरंजन अपनी जगह है, लेकिन जब मनोरंजन का संगम लोक आस्था से होता है, तो मर्यादा की सीमाएँ अपने आप तय हो जानी चाहिए।
उत्तराखंड के पर्यटन और सांस्कृतिक मेलों पर पड़ने वाला प्रभाव
उत्तराखंड को केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि उसकी अनूठी देव संस्कृति के लिए जाना जाता है। राज्य सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च करके पर्यटन और सांस्कृतिक मेलों को बढ़ावा देती है ताकि देश-विदेश के पर्यटक यहाँ की समृद्ध विरासत से परिचित हो सकें।
नरेंद्र नगर के कुंजापुरी मेले में घटी यह घटना राज्य की छवि और मेले के आयोजन प्रबंधन पर कई सवाल खड़े करती है। एक तरफ जहाँ इस विवाद से मेले को देश भर की मीडिया में नकारात्मक सुर्खियाँ मिलीं, वहीं दूसरी तरफ इसने एक सकारात्मक संदेश भी दिया है कि देवभूमि की पावन धरती पर सांस्कृतिक और धार्मिक मर्यादाओं से समझौता नहीं किया जाएगा।
यदि राज्य सरकार और पर्यटन विभाग इस घटना से सही सबक लेते हैं, तो आने वाले समय में मेलों के संचालन और कलाकारों के आमंत्रण को लेकर अधिक पारदर्शी, अनुशासित और नियमबद्ध नीतियाँ बनाई जा सकती हैं। इससे भविष्य में न केवल आयोजनों की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि स्थानीय लोक कलाकारों को भी अधिक प्राथमिकता और सम्मान मिल सकेगा।
विधिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण: आयोजकों और प्रशासन की जिम्मेदारी
कुंजापुरी मेले जैसी बड़ी घटनाओं में केवल कलाकारों या मंत्रियों की भूमिका ही मुख्य नहीं होती, बल्कि इसके पीछे जिला प्रशासन और मेला समिति की भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। जब कोई इतना बड़ा वीआईपी कार्यक्रम या सांस्कृतिक संध्या आयोजित की जाती है, तो सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ मंच प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों की होती है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है:
ग्रीन रूम और बैकस्टेज का प्रबंधन: वीआईपी कलाकारों के लिए बनाए गए ग्रीन रूम में किस प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है और वहाँ का माहौल कैसा है, इसकी निगरानी मेला अधिकारी को करनी चाहिए।
त्वरित निर्णय क्षमता: यदि मंच पर कोई अप्रिय स्थिति बनती है, तो उसे बिगड़ने से पहले ही संभालना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इस मामले में मंत्री द्वारा स्वयं हस्तक्षेप किया गया, जो यह दर्शाता है कि निचले स्तर पर प्रशासनिक निगरानी में कहीं न कहीं चूक अवश्य हुई थी।
जनता की सुरक्षा और व्यवस्था: मंच पर विवाद बढ़ने की स्थिति में भीड़ के अनियंत्रित होने का भारी खतरा रहता है। सौभाग्य से इस घटना के दौरान दर्शकों ने संयम बनाए रखा, अन्यथा कोई बड़ी अव्यवस्था भी फैल सकती थी।
भविष्य के लिए सबक और समाधान के उपाय
नरेंद्र नगर के मेले में हुआ यह विवाद केवल एक दिन का समाचार बनकर नहीं रह जाना चाहिए, बल्कि इससे कला जगत, प्रशासनिक संस्थाओं और सांस्कृतिक समितियों को ठोस सीख लेनी चाहिए।
भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
1. स्पष्ट आचरण संहिता का निर्माण
राज्य के सभी सरकारी वित्तपोषित या मान्यता प्राप्त धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेलों के लिए एक विस्तृत ‘आचरण संहिता’ लागू की जानी चाहिए। इस संहिता में यह स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए कि धार्मिक मंचों पर किसी भी प्रकार के नशे या अमर्यादित आचरण को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
2. स्थानीय लोक कला और कलाकारों को प्राथमिकता
अक्सर देखा जाता है कि बाहरी बड़े कलाकारों को बुलाने के चक्कर में स्थानीय लोक कलाकारों की अनदेखी की जाती है। यदि धार्मिक और सांस्कृतिक मेलों में उत्तराखंड के पारंपरिक ढोल-दमऊ, रणसिंघा, पांडव नृत्य और स्थानीय लोक गायकों को अधिक मंच दिया जाए, तो न केवल संस्कृति का वास्तविक संरक्षण होगा, बल्कि इस प्रकार के व्यावसायिक विवादों से भी बचा जा सकेगा।
3. इवेंट प्रबंधन प्रणाली में सुधार
इवेंट कंपनियों के साथ किए जाने वाले अनुबंधों में कड़े वित्तीय दंड के प्रावधान होने चाहिए। यदि कोई कलाकार मंच की गरिमा भंग करता है या समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसके भुगतान में कटौती और भविष्य के लिए प्रतिबंधित करने जैसे कड़े कदम उठाए जाने चाहिए।
कला की सार्थकता संस्कार और मर्यादा में ही निहित है
कला ईश्वर का दिया हुआ एक अनमोल वरदान है और एक महान कलाकार वह होता है जो अपनी कला के माध्यम से समाज में सकारात्मक ऊर्जा, संस्कार और आनंद का संचार करे। जब कोई कलाकार किसी मंच पर खड़ा होता है, तो वह केवल अपना व्यक्तिगत हुनर नहीं दिखा रहा होता, बल्कि वह अपने देश, अपनी भाषा और अपनी परंपरा का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है।
कुंजापुरी मेले में दिलेर मेहंदी और मंत्री सुबोध उनियाल के बीच हुई यह घटना संपूर्ण कला जगत और समाज के लिए एक बड़ा विचारणीय प्रश्न छोड़ती है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्रसिद्धि और लोकप्रियता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह कभी भी आस्था, परंपरा और सामाजिक मर्यादा से ऊपर नहीं हो सकती।
देवभूमि उत्तराखंड की पावन माटी सदैव से ही साधना, सुचिता और उच्च नैतिक मूल्यों की संवाहक रही है। मां कुंजापुरी के इस पावन आंचल में घटे इस विवाद से यदि हम सबक लेकर आगे बढ़ते हैं, तो निश्चित ही हमारे सांस्कृतिक मेलों की पवित्रता, गरिमा और भव्यता भविष्य में और अधिक निखर कर सामने आएगी।


