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पतंजलि विश्वविद्यालय में बोले राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन: ‘बौद्धिक विकास ही नहीं, चरित्र निर्माण और लोककल्याण भी है भारतीय ज्ञान-परम्परा का मूल’

पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार की पावन भूमि पर आयोजित बावनवें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन के भव्य उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने अपने विचारोत्तेजक और दूरदर्शी संबोधन से पूरे अकादमिक जगत का ध्यान आकर्षित किया। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने इस तीन दिवसीय सम्मेलन का विधिवत उद्घाटन करते हुए स्पष्ट किया कि हमारी प्राचीन मेधा और प्राच्यविद्या ही आधुनिक युग की अनेक जटिल समस्याओं का स्थायी समाधान दे सकती हैं। देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों की उपस्थिति में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने भारतीय ज्ञान-परम्परा के मूल मर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल बौद्धिक विकास का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और मानव कल्याण का आधार है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का यह संदेश इस बात को गहराई से रेखांकित करता है कि आज के तकनीक-प्रधान युग में प्राचीन वैदिक दर्शन, पांडुलिपियों का संरक्षण और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव राष्ट्र निर्माण के लिए कितना अनिवार्य है।

प्राच्यविद्या का वास्तविक अर्थ और राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का विस्तृत दृष्टिकोण

प्राच्यविद्या शब्द अपने आप में एक संपूर्ण ब्रह्मांड समेटे हुए है और इसका दायरा केवल इतिहास के पन्नों को पलटने तक सीमित नहीं है। सम्मेलन के मंच से राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने प्राच्यविद्या की व्याख्या करते हुए बताया कि यह भारतीय सभ्यता के क्रमिक विकास, विभिन्न दार्शनिक विचारों के संवाद और मानवता के बौद्धिक इतिहास को समझने का एक अद्वितीय अवसर प्रदान करती है। जब हम वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और दर्शन ग्रंथों का अध्ययन करते हैं, तो राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के मतानुसार, हमें जीवन, नैतिकता, कर्तव्य और सामाजिक समरसता के व्यावहारिक सूत्र मिलते हैं। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने इस बात पर विशेष बल दिया कि प्राच्यविद्या का अध्ययन हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है और वैश्वीकरण के दौर में हमारी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने में मदद करता है। यह ज्ञान ही हमें सिखाता है कि किस प्रकार ज्ञान का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के उत्थान के लिए किया जाना चाहिए।

चरित्र निर्माण और बौद्धिक विकास पर राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के विचार

आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जहां केवल डिग्रियों और व्यावसायिक सफलता को प्राथमिकता दी जा रही है, वहीं राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने एक बिल्कुल अलग और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा का वास्तविक उद्देश्य केवल व्यक्ति का बौद्धिक विकास करना या उसे सूचनाओं से भरना नहीं है, बल्कि उसके चरित्र को मजबूत बनाना, समाज में आपसी सद्भाव बढ़ाना और हर हृदय में मानव कल्याण की भावना को जागृत करना है। जब एक विद्यार्थी में करुणा, कर्तव्यनिष्ठता और सत्यनिष्ठा का संचार होता है, तभी वह सच्चा शिक्षित नागरिक बनता है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के अनुसार, हमारी प्राचीन गुरुकुल परंपरा ने इसी चरित्र निर्माण पर सबसे अधिक ध्यान दिया था। यदि आज की युवा पीढ़ी प्राचीन ग्रंथों के नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में धारण कर ले, तो समाज से ईर्ष्या, अपराध और कटुता स्वतः ही समाप्त हो जाएगी।

विकास और विरासत का समन्वय: राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का विजन

समय के साथ आधुनिक तकनीक को अपनाना जितना आवश्यक है, उतना ही अपनी प्राचीन विरासत को सहेज कर रखना भी अनिवार्य है। इस दिशा में विचार व्यक्त करते हुए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे सांस्कृतिक पुनरुत्थान और ‘विकास भी, विरासत भी’ के विचार की जमकर सराहना की। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि आधुनिक प्रगति और सांस्कृतिक जड़ों के बीच समन्वय स्थापित करके ही भारत एक मजबूत राष्ट्र के रूप में उभर सकता है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने रेखांकित किया कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। जब हम आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को जोड़ते हैं, तो एक ऐसे प्रगतिशील समाज का निर्माण होता है जो तकनीकी रूप से सक्षम होने के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी समृद्ध होता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के अहम बिंदु

शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की महत्ता को रेखांकित किया। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि इस नीति के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परम्परा, मातृभाषाओं, बहुविषयक शिक्षा और अनुसंधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का मानना है कि जब छात्र अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, तो उनकी सोचने और समझने की क्षमता अधिक मौलिक होती है। बहुविषयक शिक्षा से छात्रों को विज्ञान के साथ-साथ दर्शन और कला को भी समझने का अवसर मिलता है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 हमारी युवा पीढ़ी को केवल रोजगार मांगने वाला नहीं, बल्कि अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से समाज को नई दिशा देने वाला एक जागरूक नागरिक बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

ज्ञान भारतम् मिशन और पांडुलिपियों के संरक्षण पर राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का जोर

भारत की प्राचीन बौद्धिक संपदा को सुरक्षित रखने के संदर्भ में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि इस मिशन के जरिए देश भर में बिखरी हुई प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, वैज्ञानिक संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जा रहा है। इन पांडुलिपियों में भारत की प्राचीन विज्ञान, गणित, आयुर्वेद और दर्शन का अमूल्य खजाना छिपा हुआ है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने चिंता व्यक्त की कि यदि हमने अपनी इन पांडुलिपियों को संरक्षित नहीं किया तो हम अपने ज्ञान के मूल स्रोतों को खो देंगे। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने सभी शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं से यह आह्वान किया कि इस अमूल्य ज्ञान-भंडार को भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित और सुलभ रूप में पहुंचाना हम सभी का राष्ट्रीय और नैतिक उत्तरदायित्व है।

शोधार्थियों को राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का मार्गदर्शन और लोकार्पण

सम्मेलन के दौरान नए अनुसंधानकर्ताओं और छात्रों का मार्गदर्शन करते हुए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने शोध की गुणवत्ता और प्रामाणिकता पर विशेष ध्यान आकर्षित किया। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि युवा शोधार्थियों को केवल सतही अध्ययन से बचकर प्राचीन ग्रंथों के मूल पाठ, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दार्शनिक गहराई में जाना चाहिए। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी उच्च स्तरीय शोध में स्रोतों की प्रामाणिकता, निष्कर्षों की पूर्ण पारदर्शिता और बौद्धिक ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि शोध निष्पक्ष और प्रामाणिक नहीं होगा, तो उसका महत्व समाप्त हो जाता है। इस ऐतिहासिक अवसर पर राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने पतंजलि विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किए गए विभिन्न महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विधिवत लोकार्पण भी किया और विश्वविद्यालय के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

लोककल्याण और वैश्विक संकटों पर राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का संदेश

अपने संबोधन के समापन चरण में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने भारतीय संस्कृति के महान सूक्त ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः‘ का स्मरण कराते हुए ज्ञान को लोककल्याण से जोड़ने पर बल दिया। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि आज जब पूरा विश्व पर्यावरण संतुलन, मानसिक तनाव, युद्ध और नैतिक संकटों जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, तब भारतीय ज्ञान-परम्परा में निहित संतुलन, सह-अस्तित्व और समग्र दृष्टि ही मानवता का मार्गदर्शन कर सकती है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के अनुसार, ज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य संपूर्ण मानवता के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण में योगदान देना होना चाहिए। प्राच्यविद्या के इस महाकुंभ में दिए गए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के ये विचार आज के समय में अत्यधिक प्रासंगिक हैं और वैश्विक शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

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