पिथौरागढ़ की शांत वादियों से निकलकर देश के दिल दिल्ली और फिर मायानगरी मुंबई तक का सफर तय करने वाले प्रसिद्ध अभिनेता और हास्य कलाकार हेमंत पांडे आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। धारावाहिक ऑफिस ऑफिस में ‘पांडे जी’ के अपने किरदार से घर-घर में पहचान बनाने वाले हेमंत पांडे ने 11वें देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के मौके पर स्वर भारत न्यूज के संपादक अजय सिंह से एक खास बातचीत की।
इस संजीदा साक्षात्कार में उन्होंने अपनी 36 वर्षों से अधिक लंबी अभिनय यात्रा, शुरुआती संघर्षों, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दिनों और जीवन को देखने के अपने अनूठे दृष्टिकोण को साझा किया। उन्होंने उत्तराखंड के प्रतिभावान युवाओं के लिए सफलता का एक ऐसा मार्गदर्शक दर्शन प्रस्तुत किया, जो किसी भी कला-साधक के लिए एक अमूल्य सीख है।
संघर्ष को कष्ट नहीं, जीवन की यात्रा मानना ही कला है
साक्षात्कार की शुरुआत में जब संपादक ने पिथौरागढ़ से मुंबई तक की कठिन यात्रा और उसके पीछे के ‘कष्टों’ के बारे में पूछा, तो हेमंत पांडे ने मुस्कुराते हुए इस सोच को ही एक नया मोड़ दिया। उन्होंने कहा:
“जिस चीज़ को आप करना चाहते हैं, जो आप बनना चाहते हैं, उसमें होने वाले कष्ट को कष्ट में गिनना ही नहीं चाहिए। वह एक यात्रा है, एक जीवन है।”
उन्होंने याद किया कि वे महज 18-19 साल की छोटी उम्र में अपने गृह नगर पिथौरागढ़ से सपनों की तलाश में निकले थे। आज उन्हें इस क्षेत्र में काम करते हुए लगभग 36-37 वर्ष बीत चुके हैं। ईश्वर की कृपा से उन्होंने अभिनय के दम पर अपना परिवार सुचारू रूप से चलाया है।
हेमंत पांडे का मानना है कि एक कलाकार का काम किसी दुकानदार जैसा ही होता है, जिस तरह दुकानदार के पास हर तरह के ग्राहक आते हैं, उसी तरह एक अभिनेता के पास अच्छी, बुरी, छोटी या बड़ी फिल्में आती रहती हैं। वे हर काम को ईश्वर का ‘प्रसाद’ मानकर स्वीकार करते हैं और पूरी निष्ठा से निभाते हैं।
पहले कैमरे का अनुभव: दिल्ली का वह अंधियारा और चमकता दौर
जब उनसे जीवन के सबसे यादगार लम्हों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने करीब साढ़े तीन दशक पहले दिल्ली में बिताए अपने शुरुआती दिनों को याद किया।
हेमंत पांडे ने बताया कि जब वे दिल्ली में थे, तब उन्हें दूरदर्शन के एक प्रोजेक्ट में संत सूरदास का किरदार निभाने का मौका मिला था। तब तक उन्होंने केवल रंगमंच (थिएटर) किया था और कभी कैमरे का सामना नहीं किया था।
“35-36 साल पहले की बात है। उस जमाने में शूटिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले रिफ्लेक्टर बहुत हार्ड हुआ करते थे। मैं सूरदास का रोल कर रहा था और पहली बार कैमरे के सामने खड़ा था। रिफ्लेक्टर की तेज रोशनी सीधे मेरी आंखों पर पड़ रही थी और मेरी आंखें खुल ही नहीं पा रही थीं! इधर निर्देशक साहब ताली बजाकर तारीफ कर रहे थे कि ‘क्या गजब का रोल किया है’!”
रंगमंच से सिनेमा के इस सफर में उन्होंने ‘ऑफ़िस ऑफ़िस’ का भी विशेष रूप से उल्लेख किया, जहां उन्होंने 8-10 वर्षों तक ‘पांडे जी’ के किरदार को जिया और वह चरित्र हमेशा-हमेशा के लिए लोगों के दिलों में अमर हो गया।

NSD रेपेर्टरी का दौर और ₹450 की पहली रेंग्लर जींस
बातचीत में जब एनएसडी (National School of Drama) के दिनों का जिक्र आया, तो उन्होंने एक बहुत ही रोचक और कम जानी-पहचानी बात बताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने एनएसडी में कोई औपचारिक 3-साल का कोर्स नहीं किया था, बल्कि उनका चयन NSD रेपेर्टरी कंपनी में हुआ था।
रेपेर्टरी कंपनी एक व्यावसायिक थिएटर ग्रुप होता है, जहां कोर्स पूरा कर चुके या अनुभवी कलाकारों को वेतन पर अभिनय के लिए रखा जाता है। हेमंत जी के पास थिएटर का बेहतरीन अनुभव था, जिसके आधार पर उन्हें सीधे इस पेशेवर समूह का हिस्सा बनने का अवसर मिला।
पुरानी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया:
वेतन का दौर: उनके समय में एनएसडी रेपेर्टरी में लगभग ₹2,500 का मासिक वेतन मिलता था, जो उस दौर में उनके लिए बहुत बड़ी बात थी। (जबकि आज के समय में यह स्टाइपेंड/वेतन बढ़कर काफी अधिक हो चुका है)।
पहली ब्रांडेड जींस: इसी पहली नौकरी और वेतन की बदौलत उन्होंने जीवन में पहली बार ₹400 – ₹450 की ‘रेंग्लर’ की ब्रांडेड जींस खरीदी थी, जिसे याद करके वे आज भी रोमांचित हो उठते हैं।
आगामी प्रोजेक्ट्स: बड़ी फिल्मों से लेकर OTT तक का दबदबा
36 वर्षों के लंबे अनुभव के बाद भी हेमंत पांडे आज उतने ही ऊर्जावान और सक्रिय हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी आने वाली कुछ बड़ी और चर्चित फिल्मों का जिक्र किया:
वेलकम टू द जंगल: अक्षय कुमार और सितारों से सजी इस मेगा-बजट कॉमेडी फिल्म में हेमंत पांडे अहम भूमिका निभा रहे हैं।
हॉन्टेड 2: हॉरर शैली की इस बहुप्रतीक्षित फिल्म में भी वे नज़र आएंगे।
ढिंढोरा सीजन 2: भुवन बाम के बहुचर्चित शो के दूसरे सीजन में भी वे दर्शकों का मनोरंजन करते दिखेंगे।
उत्तराखंड की माटी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और समाज के प्रति दायित्व
पिथौरागढ़ और उत्तराखंड की कला-संस्कृति पर चर्चा करते हुए हेमंत पांडे ने कहा कि वे व्यक्तिगत तौर पर राज्य की बेहतरी के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और राज्य सरकार द्वारा फिल्म नीति एवं क्षेत्रीय कला को बढ़ावा देने के प्रयासों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि केवल सरकार के भरोसे रहने के बजाय समाज के हर योग्य व्यक्ति को आगे आना होगा।
उनका मानना है कि जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में दक्ष है, चाहे वह अभिनय हो, संगीत हो या सिनेमा निर्माण – उसे अपने ज्ञान और अनुभव से अपने क्षेत्र व समाज के विकास में थोड़ा-बहुत योगदान अवश्य देना चाहिए। जब हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझेगा, तभी समाज का वास्तविक उत्थान संभव है।
युवाओं के लिए गुरुमंत्र: “सफलता नहीं, जीवन जियो”
आज के युवाओं में तुरंत सफलता पाने की जो होड़ मची है, उस पर हेमंत पांडे ने बेहद गहरा और दार्शनिक संदेश दिया। उन्होंने पिथौरागढ़ और पूरे देश के उभरते कलाकारों को संबोधित करते हुए कहा:
“जैसे एक डॉक्टर बनने में 5 साल लगते हैं, इंजीनियर बनने में 5 साल लगते हैं और साधु-संत बनने में वर्षों की तपस्या लगती है; ठीक उसी प्रकार अभिनय को भी एक तपस्या मानकर चलो।”
उन्होंने युवाओं को सफलता और असफलता के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की सलाह दी:
परिणाम की चिंता न करें: यदि आप केवल सफलता या असफलता का हिसाब लगाकर काम करेंगे, तो आप हमेशा परेशान और तनावग्रस्त रहेंगे।
कलाकार का जीवन जिएं: काम कम मिले या ज्यादा, बड़े पर्दे पर काम मिले या छोटे पर्दे पर, यदि आप एक कलाकार के रूप में जीवन जीना सीख गए, तो परिस्थिति कैसी भी हो, आपके जीवन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
एक बेहतर इंसान बनें: जब आप अपनी कला को साधना मान लेते हैं, तो आप न केवल एक महान कलाकार बनते हैं बल्कि समाज के लिए एक बेहतरीन इंसान भी साबित होते हैं।
एक मुकम्मल यात्रा
स्वर भारत न्यूज के साथ हेमंत पांडे का यह साक्षात्कार केवल एक बॉलीवुड अभिनेता की कहानी नहीं है, बल्कि यह पिथौरागढ़ के उस माटी के लाल की कहानी है जिसने सादगी, ईमानदारी को अपना हथियार बनाया।
उनकी यह यात्रा सिखाती है कि जब आप अपने काम को ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार करते हैं, तो कोई भी राह कठिन नहीं रह जाती। पहाड़ की सादगी और मुंबई की चकाचौंध के बीच संतुलन बनाकर जीने वाले हेमंत पांडे आज भी उतने ही जमीन से जुड़े हैं जितने 36 साल पहले थे, और यही सादगी उन्हें दर्शकों का प्रिय ‘पांडे जी’ बनाए रखती है!


