Homeउत्तराखंडरिजर्व लैंड बैंक का होगा त्वरित डिजिटल सर्वेक्षण: डीएम डॉ. आशीष चौहान...

रिजर्व लैंड बैंक का होगा त्वरित डिजिटल सर्वेक्षण: डीएम डॉ. आशीष चौहान का वन भूमि हस्तांतरण के मामलों पर कड़ा रुख

रिजर्व लैंड बैंक को जल्द अपडेट करें-डीएम, यह कड़ा और स्पष्ट संदेश देहरादून जिला प्रशासन द्वारा वन भूमि हस्तांतरण के मामलों में तेजी लाने के उद्देश्य से जारी किया गया है। उत्तराखंड राज्य में जनहित और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं अक्सर वन भूमि के हस्तांतरण और उसके बदले होने वाले क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण की प्रक्रिया में लगने वाले समय के कारण बाधित होती हैं। इस गंभीर विषय को समझते हुए देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक तंत्र को अधिक गतिशील बनाना, वन तथा राजस्व विभाग के बीच समन्वय को बेहतर करना और राज्य में अटकी हुई विकास परियोजनाओं के निर्माण कार्य को समय पर पूरा करने का मार्ग प्रशस्त करना है।

विकास और पर्यावरण में संतुलन की प्रशासनिक पहल
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय और प्राकृतिक दृष्टि से समृद्ध राज्य में विकास कार्यों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। जब भी किसी नए राष्ट्रीय राजमार्ग, ग्रामीण सड़क, पुल, पेयजल योजना या किसी अन्य सरकारी इमारत का निर्माण होता है, तो अक्सर उसमें वन भूमि का कुछ हिस्सा शामिल होता है। नियम के अनुसार सरकारी नियमों के तहत जितनी वन भूमि किसी विकास कार्य के लिए ली जाती है, उसके बदले उतनी ही या उससे अधिक गैर-वन भूमि पर पौधे लगाना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। इसे क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण कहा जाता है।

समस्या तब पैदा होती है जब विकास योजना की स्वीकृति तो मिल जाती है, लेकिन क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिए उपयुक्त जमीन तलाशने में महीनों या सालों का समय बीत जाता है। जिलाधिकारी ने समीक्षा बैठक के दौरान इसी बिंदु पर सबसे अधिक चिंता व्यक्त की। उन्होंने अधिकारियों को हिदायत दी कि अनुपयोगी वन भूमि और गैर-वन भूमि की पहचान का काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए। इस पूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए एक केंद्रीय डेटाबेस यानी आरक्षित भूमि बैंक की व्यवस्था बनाई गई है, जिसे तुरंत नए आंकड़ों के साथ अपडेट करने का आदेश दिया गया है।

डिजिटल तकनीक और आधुनिक मैपिंग से बढ़ेगी गति
सरकारी कामकाज में अक्सर कागजी प्रक्रियाओं और पुराने डेटा के कारण फाइलों का आवागमन धीमा हो जाता है। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने पारंपरिक तरीकों को छोड़कर आधुनिक डिजिटल तकनीक अपनाने पर विशेष जोर दिया है। उन्होंने निर्देश दिए कि जिस भी जमीन को क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिए चिह्नित किया जाए, उसकी भौगोलिक जानकारी और सीमाओं का सटीक ब्योरा तैयार किया जाए।

इसके लिए संबंधित भूमि का पूरा डेटा एकत्र करके उसकी डिजिटल फाइल बनाई जाएगी। यह डिजिटल फाइल आधुनिक भौगोलिक सूचना प्रणाली पर आधारित होगी, जिससे जमीन का क्षेत्रफल, उसकी भौगोलिक स्थिति और उसकी सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण हो सकेगा। इस डिजिटल फाइल को सरकार द्वारा निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल पर तुरंत अपलोड करना होगा। पोर्टल पर जानकारी उपलब्ध होने से राज्य स्तर पर और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के स्तर पर फाइलों की जांच और स्वीकृति की प्रक्रिया में बेहद तेजी आएगी।

विभागीय समन्वय और तकनीकी टीमों का सहयोग
कई बार राजस्व विभाग और वन विभाग के पास तकनीकी विशेषज्ञों या आधुनिक सर्वेक्षण उपकरणों की कमी होती है, जिसके कारण डिजिटल मैपिंग का काम समय पर पूरा नहीं हो पाता। इस व्यावहारिक कठिनाई को ध्यान में रखते हुए जिलाधिकारी ने एक बेहतरीन अंतर-विभागीय समन्वय प्रणाली का खाका तैयार किया है। उन्होंने निर्देश दिया कि डिजिटल फाइल बनाने और भूमि के सर्वेक्षण कार्य में लोक निर्माण विभाग और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से जुड़े तकनीकी अधिकारियों की मदद ली जाए।

इन विभागों के कनिष्ठ अभियंताओं और सहायक अभियंताओं के पास भूमि सर्वेक्षण, डिजिटल मैपिंग और भौगोलिक सूचना प्रणालियों का व्यापक अनुभव होता है। जब ये इंजीनियर वन और राजस्व विभाग की टीमों के साथ मिलकर धरातल पर काम करेंगे, तो तकनीकी गलतियों की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। इससे न केवल सर्वेक्षण का काम त्रुटिहीन होगा, बल्कि फाइलों को तैयार करने में लगने वाला समय भी काफी घट जाएगा।

उप जिलाधिकारियों और राजस्व निरीक्षकों की जवाबदेही
ज़मीनी स्तर पर इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राजस्व विभाग के निचले प्रशासनिक ढांचे पर होती है। जिलाधिकारी ने जिले की सभी तहसीलों के उप जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में व्यक्तिगत रूप से इस काम की निगरानी करें। सभी उप जिलाधिकारियों को अपने अधीन काम करने वाले राजस्व उप निरीक्षकों यानी पटवारियों को तुरंत क्षेत्र में भेजने के आदेश दिए गए हैं।

राजस्व उप निरीक्षकों को अपने-अपने क्षेत्रों में मौजूद ऐसी गैर-वन भूमि का ब्योरा एकत्र करने की जिम्मेदारी दी गई है जो भविष्य में क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिए उपयुक्त साबित हो सकती हैं। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि सर्वेक्षण का यह काम प्राथमिकता के आधार पर और एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर पूरा होना चाहिए। अगर किसी क्षेत्र में लापरवाही या अनावश्यक देरी पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय की जाएगी।

पर्यावरण संरक्षण और भावी हरियाली का रोडमैप
यह पूरी कसरत केवल विकास परियोजनाओं की फाइलों को पास कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा पर्यावरणीय दृष्टिकोण भी शामिल है। जब भी किसी सड़क या बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए हरे-भरे पेड़ काटे जाते हैं, तो पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई तुरंत होना आवश्यक होता है। यदि प्रशासन के पास पहले से आरक्षित जमीन का बैंक तैयार नहीं होगा, तो नए पौधे लगाने का काम सालों तक टलता रहेगा।

व्यवस्थित और अद्यतन भूमि बैंक होने से वन विभाग को नए पौधे रोपने के लिए तत्काल भूमि उपलब्ध हो जाएगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जितने पेड़ किसी विकास योजना के कारण काटे जा रहे हैं, उनसे अधिक संख्या में नए पौधे किसी दूसरी सुरक्षित जगह पर समय पर रोपे जा सकें। इससे जिले के वनाच्छादित क्षेत्र को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और क्षेत्र का प्राकृतिक और पारिस्थितिक संतुलन बना रहेगा।

उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में अधिकारियों की सहभागिता
प्रशासनिक स्तर पर इस योजना को गति देने के लिए बुलाई गई इस बैठक में जिले के तमाम प्रमुख विभागों के विभागाध्यक्षों और वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। डिजिटल माध्यम से आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में अधिकारियों ने अपने-अपने क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति और भूमि उपलब्धता की प्रगति रिपोर्ट जिलाधिकारी के समक्ष रखी।

बैठक में प्रभागीय वनाधिकारी अमित कंवर, संयुक्त मजिस्ट्रेट राहुल आनंद, सदर उप जिलाधिकारी अपूर्वा सिंह, ऋषिकेश की उप जिलाधिकारी कुमकुम जोशी, और डोईवाला की उप जिलाधिकारी अपर्णा ढौडियाल समेत वन विभाग और राजस्व विभाग के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। जिलाधिकारी ने सभी अधिकारियों को आपसी तालमेल के साथ एक टीम की तरह काम करने की सख्त हिदायत दी है ताकि जिले में चल रहे और प्रस्तावित सभी विकास कार्यों को बिना किसी प्रशासनिक रुकावट के समय पर पूरा किया जा सके।

देहरादून जिला प्रशासन का यह कदम राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास को नई रफ्तार देने के साथ-साथ पर्यावरण की सुरक्षा के दृष्टिकोण से एक बेहद दूरदर्शी और सकारात्मक पहल साबित होगा। यदि सभी विभाग दी गई समय-सीमा के भीतर अपने लक्ष्यों को पूरा करते हैं, तो आने वाले समय में विकास कार्यों के लिए वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया में लगने वाला समय काफी हद तक घट जाएगा।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments