हाल ही में प्रकाशित आत्मकथात्मक कृति ‘अनथक युयुत्सा (जीवन कथा)’ (लेखक: डॉ. अधीर कुमार, प्रकाशक: इंदु बुक सर्विसेज) के माध्यम से इस महान योद्धा के जीवन की अनकही गाथा, संघर्ष के थपेड़ों, सैन्य जीवन के कठिन थल-अभियानों, नीतिगत निर्णयों तथा उनकी उदात्त मानवीय दृष्टि का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण संभव हो सका है। यह लेख लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह के संपूर्ण जीवन, उनकी बाल्य-स्मृतियों, कठिन सैन्य प्रशिक्षण, युद्धक्षेत्र की चुनौतियों, सामरिक व प्रशासनिक उपलब्धियों तथा लेखक डॉ. अधीर कुमार द्वारा इस ऐतिहासिक ग्रंथ को संजोने के अनूठे प्रयास का गहराई से विश्लेषण करता है।
पृष्ठभूमि और बाल्यकाल: गाँव की मिट्टी से दिल्ली के क्षितिज तक
जलालउस्मां गाँव की ऐतिहासिक और नैतिक विरासत
लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह की जीवन-यात्रा का प्रारंभ पंजाब की पावन धरती, अमृतसर जिले के एक छोटे से गाँव जलालउस्मां से हुआ। यह गाँव केवल एक साधारण देहात नहीं था, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक संघर्षों के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ था। इसी गाँव के वीर सपूत जत्थेदार सोहन सिंह ‘जलालउस्मां’ ने 1919 के जलियाँवाला बाग नरसंहार के उपरांत ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध मुखर आवाज उठाई थी और अनेक बार यातनाएँ सहकर देश की सेवा की थी। ऐसे निर्भीक और स्वदेश-अनुरागी माहौल में जन्मे बालक गुरमीत को जन्म से ही वीरता, आत्मसम्मान और स्वाभिमान के संस्कार प्राप्त हुए।
पारिवारिक परिवेश: अनुशासन का संतुलन
गुरमीत सिंह के पिता मोहन सिंह भारतीय सेना की इलेक्ट्रॉनिक्स एवं मेकैनिकल इंजीनियरिंग (EME) कोर में सेवारत थे। पिता का सैन्य जीवन में होना और विशेष तकनीकी प्रशिक्षण के लिए जीनीवा (स्विट्जरलैंड) तथा जर्मनी जाना परिवार में एक अलग तरह की अनुशासनप्रियता और दृष्टि लेकर आया। हालाँकि पिता के कड़े अनुशासन और अंग्रेजी प्रभाव के कारण घर के बच्चे उनसे थोड़ी दूरी बनाकर रखते थे, लेकिन माँ कंस कौर की सहज ममता, धार्मिक आस्था और अटूट संबल ने बच्चों के व्यक्तित्व को एक मजबूत आधार प्रदान किया।
माँ कंस कौर ने अनेक पारिवारिक और सामाजिक संघर्षों का सामना अकेले ही हँसते-हँसते किया। पिता के अक्सर बाहर रहने के कारण घर, खेती-बाड़ी और दस्तकारी के कामों को संभालना आसान नहीं था, किंतु उन्होंने अपने बच्चों को कभी अभाव या नकारात्मकता का अहसास नहीं होने दिया। गुरमीत सिंह की बड़ी बहनों ने भी उनकी परवरिश में माँ की भाँति योगदान दिया। बचपन से ही माता-पिता द्वारा श्री गुरु ग्रंथ साहिब, गुरुबानी और महान सिख योद्धाओं, विशेषकर गुरु गोविंद सिंह जी के इतिहास से कराया गया परिचय उनके मन-मस्तिष्क में गहराई से बैठ गया।
दिल्ली का अनुभव और प्रारंभिक स्मृतियाँ
साठ के दशक में जब पिता की पोस्टिंग दिल्ली कैंट में हुई, तो पूरा परिवार दिल्ली आ गया। सरोजनी नगर के सरकारी आवासों में बीता बचपन, दिल्ली कैंट के सैन्य वातावरण का प्रत्यक्ष दर्शन और वायुसेना की इकाइयों के जेट जहाजों को आसमान में उड़ते देखना बालक गुरमीत के भीतर फौजी बनने की तीव्र इच्छा को और प्रबल कर गया। बचपन में रामलीला के दृश्य, 15 अगस्त को लाल किले की भीड़ में बिछुड़कर स्वयं हिम्मत से घर वापस लौटने का संस्मरण, अथवा पड़ोसियों द्वारा चोरी का झूठा आरोप लगने से मिला कड़वा सबक – इन सभी छोटी-बड़ी घटनाओं ने उन्हें जीवन के व्यावहारिक सत्य, धैर्य और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया।
सैनिक स्कूल कपूरथला: सैन्य जीवन की नींव और व्यक्तित्व का निखार
बाल-हठ और सैनिक स्कूल में प्रवेश
गुरमीत सिंह के मन में फौजी अफसर बनने का सपना इस कदर घर कर चुका था कि जब उनके एक परिचित राजीव सचदेवा (जो सैनिक स्कूल में पढ़ते थे) की प्रभावशाली जीवन शैली और वर्दी को उन्होंने देखा, तो उन्होंने भी सैनिक स्कूल में ही पढ़ने की जिद पकड़ ली। उस समय पिता जी प्रशिक्षण के सिलसिले में बाहर थे और परिवार वाले छोटे बच्चे को बाहर भेजने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन गुरमीत सिंह ने अपनी मांग के लिए अनशन/भूख हड़ताल कर दी। अंततः माँ को झुकना पड़ा और फॉर्म भरा गया। उन्होंने अपनी मेधा और योग्यता से सैनिक स्कूल कपूरथला की प्रवेश परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की और 1967 में कक्षा छह में प्रवेश लिया।
कपूरथला के जगजीत सिंह पैलेस की छत्रछाया में
सैनिक स्कूल कपूरथला कोई सामान्य विद्यालय नहीं था। यह फ्रांस के बर्साय महल की बरोक (Baroque) स्थापत्य शैली में बने राजा जगजीत सिंह के भव्य पैलेस में संचालित होता था। ग्रामीण परिवेश से आए छोटे बच्चों के लिए यह भव्य भवन स्वप्नलोक समान था। यहाँ का वातावरण पूरी तरह से व्यवस्थित, समयबद्ध और अनुशासित था—सुबह समय पर उठना, पीटी, पीटी यूनिफॉर्म, ड्रिल, पढ़ाई, स्पोर्ट्स और फिर शाम का व्यवस्थित शेड्यूल।
कमियों को खूबियों में बदलने का अनथक प्रयास
प्रारंभ में बालक गुरमीत अपनी कक्षा के अन्य लड़कों की तुलना में शारीरिक रूप से दुबले-पतले और कम लंबाई वाले थे। एसेंबली में हमेशा पहली कतार में खड़े होने के कारण उनके भीतर एक अनजाना-सा संकोच रहता था। किंतु उन्होंने अपनी इस शारीरिक सीमा को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता और अन्य कौशलों को इतना तराशा कि शारीरिक दुबलापन पीछे छूट गया:
-
अंग्रेजी भाषा पर अधिकार: उनके हाउस मास्टर और अंग्रेजी शिक्षक मिस्टर आर.के. पुरी की स्नेहमयी शिक्षण पद्धति से उन्होंने अंग्रेजी भाषा पर इतनी पकड़ बनाई कि साल के अंत में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए।
-
पब्लिक स्पीकिंग और थियेटर: स्कूल में नाटकों (‘मंकीज़ पॉ’ ड्रामा) में अभिनय और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेकर उन्होंने मंच का डर हमेशा के लिए दूर कर दिया।
-
घुड़सवारी और खेल: राइडिंग क्लब में शामिल होकर उन्होंने सख्त ट्रेनर की प्रताड़नाओं के बावजूद घुड़सवारी की तकनीकों पर पूर्ण महारत हासिल की। साथ ही जिमनास्टिक्स और क्रिकेट में हैट्रिक लेने जैसी उपलब्धियों से सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
-
इतिहास व गुरुबानी का ज्ञान: गुरु गोविंद सिंह जी, शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, बंदा सिंह बहादुर और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शूरवीरों के इतिहास को पढ़कर उन्होंने अपने भीतर निर्भीकता और आत्मबल को संजोया।
सैनिक स्कूल कपूरथला ने गुरमीत सिंह को न केवल एक उत्कृष्ट कैडेट बनाया, बल्कि उनके भीतर छिपे ‘युयुत्सु’ (युद्ध करने की इच्छा व संघर्ष करने की भावना) को जागृत कर दिया।
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और भारतीय सैन्य अकादमी (IMA): कठोर तपस्या
नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) खड़कवासला में चयन
सैनिक स्कूल से निकलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी एन.डी.ए. की लिखित परीक्षा, एसएसबी (Services Selection Board) इंटरव्यू और कड़ा मेडिकल टेस्ट। कम वजन (न्यूनतम सीमा से दो किलो कम) होने के बावजूद उन्होंने बुद्धिमत्ता और रणनीतिक तैयारी से मेडिकल पास किया। इलाहाबाद एसएसबी बोर्ड में 500 में से 445 अंक हासिल करना एक ऐसा अभूतपूर्व रिकॉर्ड था, जो उनके असाधारण व्यक्तित्व, स्पष्टता और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता था। जून 1973 में उन्होंने एन.डी.ए. के 50वें गोल्डन जुबली कोर्स (‘चार्ली’ स्क्वाड्रन) में प्रवेश लिया।
रैगिंग का दंश और मानसिक-शारीरिक फौलाद
उस दौर में एन.डी.ए. में वरिष्ठ कैडेटों (विशेषकर 2nd और 4th टर्म) द्वारा कनिष्ठों (1st टर्म कैडेट्स) को दी जाने वाली अत्यधिक कठोर और शारीरिक सीमाएँ तोड़ देने वाली रैगिंग प्रचलित थी। कपूरथला सैनिक स्कूल का होने के कारण उन्हें अतिरिक्त पनिशमेंट (जैसे बजरी ऑर्डर, रोलिंग, साइक्लिंग, तीन मंजिला सीढ़ियों से लगातार रोलिंग) का सामना करना पड़ा।
एक बार अत्यधिक क्रूर रोलिंग के कारण उनकी रीढ़ की हड्डी के पास की त्वचा पूरी तरह छिल गई और खून से बनियान व बेडशीट चिपक गए, जिससे उन्हें 15 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और न ही किसी का नाम शिकायत में लिया। उन्होंने इसे युद्ध बंदी बनने पर दुश्मन द्वारा दिए जाने वाले अत्याचारों को सहने के एक व्यावहारिक अभ्यास के रूप में स्वीकार किया। उनका मानना था कि गुरुओं और शहीदों का वंशज होने के नाते वे किसी भी क्रूरता के सामने नहीं झुकेंगे।
उपलब्धियाँ और पोलो टीम का नेतृत्व
एन.डी.ए. में तीन वर्षों की अवधि के दौरान न केवल उनकी लंबाई में 7-8 इंच का इजाफा हुआ, बल्कि उनके व्यक्तित्व में बहुमुखी निखार आया:
-
अकादमिक व भाषाई श्रेष्ठता: उन्होंने कठिन मानी जाने वाली चीनी भाषा को चुना और पहले व दूसरे सत्र में ‘डिस्टिंक्शन’ प्राप्त की।
-
ड्रिल स्क्वायर सफलता: अपने पूरे स्क्वाड्रन में पहले ही प्रयास में कठिन ड्रिल टेस्ट पास करके ‘लेनयार्ड’ धारण करने वाले वे एकमात्र कैडेट बने।
-
राष्ट्रीय पोलो और शो-जंपिंग खिलाड़ी: वे एन.डी.ए. की प्रतिष्ठित पोलो टीम के स्टार मिडफील्डर/फॉरवर्ड बने। नई दिल्ली और बैंगलोर में राष्ट्रीय स्तर की पोलो प्रतियोगिताओं में खेलते हुए उन्होंने हैट्रिक बनाई और कई समाचार पत्रों की सुर्खियों में छा गए। उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें एन.डी.ए. का अति-प्रतिष्ठित ‘ब्लू’ पुरस्कार दिया गया।
भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) देहरादून और आसाम रेजिमेंट का आवंटन
जून 1976 में एन.डी.ए. से पास आउट होकर वे बतौर जैंटलमैन कैडेट भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) देहरादून पहुँचे। यहाँ का प्रशिक्षण पूरी तरह से थल सेना के सामरिक अभियानों, फील्ड-क्राफ्ट, युद्ध रणनीति और हथियारों के उपयोग पर केंद्रित था। आई.एम.ए. में भी उन्होंने घुड़सवारी और पोलो में अकादमिक व खेल स्तर पर शीर्ष स्थान बनाए रखा।
हालाँकि वे पैरा (स्पेशल फोर्सेस) या कैवेलरी में जाना चाहते थे, लेकिन एक लिपिकीय त्रुटि अथवा ईश्वर की नियति के चलते उन्हें आसाम रेजिमेंट आवंटित हुई। उन्होंने इसे सहर्ष भगवान का आशीर्वाद (‘जो तेरा भाणा मीठा लागे’) मानकर स्वीकार किया। 11 जून 1977 को ऐतिहासिक पासिंग आउट परेड के बाद जब वे सेकेंड लेफ़्टिनेंट बनकर निकले, तो उनके पिता (जो स्वयं सेवानिवृत्त जे.सी.ओ. थे) और माता की आँखों में जो गर्व और अश्रु थे, वे उनकी पूरी तपस्या का फल थे।
सैन्य जीवन: अभियानों, रणनीतियों और चुनौतियों का दौर
‘फोर आसाम’ के साथ पहला अनुभव
कमीशन मिलने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग 4 आसाम बटालियन (फैजाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुई। यह बटालियन अपने वीर सैनिकों, 1962 के वालॉन्ग युद्ध के पराक्रम और 1971 के भारत-पाक युद्ध के शौर्य के लिए प्रसिद्ध थी। एक युवा सेकेंड लेफ़्टिनेंट के रूप में उन्होंने जवानों के जीवन को करीब से समझने के लिए एक हफ्ते तक जवानों के साथ बैरक में रहकर, उनके लंगर में खाना खाया।
फैज़ाबाद में सेवारत रहने के दौरान ही उन्होंने कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया, जैसे शराब के नशे में उग्र हुए जवानों पर अपनी कठोर कमांड से नियंत्रण पाना, बीपीईटी (बैटल फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट) में बटालियन को नेतृत्व देना और अपनी उत्कृष्ट युद्ध-रणनीतियों से वरिष्ठ अधिकारियों का विश्वास जीतना। ब्रिगेड कमांडर (महावीर चक्र विजेता) ब्रिगेडियर राज मोहन वोरा द्वारा उनकी प्रतिभा, प्रत्युत्पन्नमतित्व और निर्णय क्षमता की व्यापक सराहना की गई।
आतंकवाद रोधी अभियान: उखरुल (मणिपुर) और श्रीलंका (IPKF)
गुरमीत सिंह का सैन्य जीवन केवल छावनियों तक सीमित नहीं रहा; उन्हें देश के अत्यंत संवेदनशील उग्रवाद-प्रभावित क्षेत्रों में अग्रिम मोर्चे पर सेवा देने का अवसर मिला:
-
मणिपुर (उखरुल): पूर्वोत्तर भारत के घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और उग्रवाद-प्रभावित क्षेत्रों में उन्होंने एनएससीएन जैसे उग्रवादी संगठनों के खिलाफ कई सफल गुप्त अभियानों का नेतृत्व किया। जंगलों में अस्तित्व की लड़ाई और स्थानीय जनजातीय आबादी का दिल जीतने की कूटनीति उन्होंने यहीं सीखी।
-
श्रीलंका (भारतीय शांति सेना – IPKF): ऑपरेशन पवन के दौरान श्रीलंका के जाफना और उत्तरी/पूर्वी क्षेत्रों में एलटीटीई के उग्रवादियों से लोहा लेते हुए उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया। अदृश्य दुश्मन, बारूदी सुरंगों के खतरों और शहरी गुरिल्ला युद्ध के बीच अपने जवानों का मनोबल बनाए रखना तथा नागरिक आबादी को न्यूनतम नुकसान पहुँचाना उनकी उत्कृष्ट नेतृत्व शैली का प्रमाण था।
अंतर्राष्ट्रीय और सामरिक अनुभव: ईरान और चीन सीमा (LAC)
-
ईरान-इराक संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह: लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह को संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत ईरान में सेवा देने के लिए चुना गया। वहाँ उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति, युद्ध विराम की निगरानी और बहुराष्ट्रीय सैन्य वातावरण में भारत का प्रतिनिधित्व अत्यंत गौरव के साथ किया।
-
चीन सीमा (अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम): एलएसी के अत्यंत कठिन और उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों में उन्होंने बटालियन और ब्रिगेड का सफल कमान संभाला। चीन के साथ सीमा तंत्र, फ्लैग मीटिंग्स और कूटनीतिक वार्ताओं में उनकी चीनी भाषा की जानकारी और सामरिक सूझबूझ ने भारत के पक्ष को हमेशा मजबूत बनाए रखा।
चिनार कोर (15 Corps) के कमांडर और कश्मीर में शांति बहाली
सैन्य जीवन के चरम उत्कर्ष के रूप में उन्हें कश्मीर घाटी में तैनात प्रतिष्ठित चिनार कोर (15 Corps) के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC / कोर कमांडर) का पदभार सौंपा गया। कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) की सुरक्षा, सीमा पार से होने वाली घुसपैठ को रोकना और घाटी के भीतर आतंकवाद का सफाया करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता थी।
-
मानवीय रुख और ‘आवाम’ से जुड़ाव: उन्होंने केवल सैन्य बल के प्रयोग पर बल नहीं दिया, बल्कि “आवाम (नागरिकों) को उग्रवादियों से अलग करने” की नीति अपनाई। उन्होंने कश्मीरी युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए खेल, शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और ‘सद्भावना’ कार्यक्रमों को अभूतपूर्व गति दी।
-
सुरक्षा चक्र और घुसपैठ पर शून्य सहनशीलता: उनके कार्यकाल के दौरान नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ-रोधी ग्रिड (Anti-Infiltration Grid) को अत्यधिक मजबूत बनाया गया, जिससे आतंकवादियों के हौसले पस्त हुए और घाटी में शांति व विकास का वातावरण निर्मित हुआ।
सर्वोच्च सैन्य पद और नीतियाँ (DGMO, AG, DCOAS)
चिनार कोर के बाद उन्होंने थल सेना मुख्यालय, नई दिल्ली में कई अति-महत्वपूर्ण नीतिगत पदों पर अपनी सेवाएँ दीं:
-
डी.जी.एम.ओ. डेस्क: सैन्य अभियानों की योजना बनाने, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर सीमा पार रणनीतियों को अंतिम रूप देने में उनकी मुख्य भूमिका रही।
-
एडजुटेंट जनरल: भारतीय सेना के लाखों सेवारत सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण, मानवाधिकार नीतियों, अनुशासन और कानूनी मामलों का सर्वोच्च प्रबंधन उन्होंने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ किया।
-
डेप्यूटी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ: सेना के आधुनिकीकरण, नए हथियारों की खरीद, सूचना प्रणालियों और भविष्य की युद्ध तकनीकों के एकीकरण में उनका योगदान अद्वितीय रहा।
उनकी उत्कृष्ट और निष्कलंक सेवाओं के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल (PVSM), उत्तम युद्ध सेवा मेडल (UYSM), अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM) और विशिष्ट सेवा मेडल (VSM) जैसे सर्वोच्च सैन्य अलंकरणों से विभूषित किया गया।
लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह के जीवन से महत्वपूर्ण विचार और दर्शन
पुस्तक के माध्यम से लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का जो जीवन-दर्शन सामने आता है, वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत अनुकरणीय है:
अनथक युयुत्सा का अर्थ:
“मेरे लिए युयुत्सा (युद्ध करने की इच्छा) केवल शस्त्र उठाने का नाम नहीं है। युयुत्सा जीवन की तमाम चुनौतियों, विपरीत परिस्थितियों, असफलता के डरों और व्यक्तिगत सीमाओं के बीच निरंतर बिना थके आगे बढ़ते रहने की अदम्य इच्छाशक्ति है।”
लोकसेवा का नया अध्याय: उत्तराखण्ड के राज्यपाल के रूप में
2016 में भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद, लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह की राष्ट्रसेवा का सफर थमा नहीं। सितंबर 2021 में भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें उत्तराखण्ड का राज्यपाल नियुक्त किया। सैनिक से लोकसेवक और संवैधानिक प्रमुख के रूप में उनकी यह नई भूमिका देवभूमि उत्तराखण्ड के लिए अत्यंत कल्याणकारी सिद्ध हुई है।
देवभूमि और ‘सैन्य धाम’ का सम्मान
उत्तराखण्ड को ‘देवभूमि’ के साथ-साथ ‘वीरभूमि’ या ‘सैन्य धाम’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ के लगभग हर परिवार से कोई न कोई सदस्य सेना में सेवारत है या पूर्व सैनिक है। एक फौजी पृष्ठभूमि के राज्यपाल होने के नाते, उन्होंने राज्य के पूर्व सैनिकों, वीरांगनाओं (शहीदों की पत्नियों) और सेवारत जवानों के कल्याण के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएँ शुरू कीं। राजभवन के द्वार सामान्य नागरिकों और पूर्व सैनिकों के लिए सदैव खुले रहते हैं।
बालिका शिक्षा, प्रौद्योगिकी और नवाचार पर बल
राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (Chancellor) के रूप में उन्होंने उच्च शिक्षा में क्रांतिकारी सुधार किए हैं:
-
तकनीक और AI का समावेश: उन्होंने विश्वविद्यालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा और आधुनिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए ठोस दिशानिर्देश जारी किए।
-
महिला सशक्तिकरण व स्वयं सहायता समूह: उन्होंने उत्तराखण्ड की दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों की महिलाओं (मातृशक्ति) के आर्थिक स्वावलंबन के लिए लोकल प्रोडक्ट्स, हस्तशिल्प और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए निरंतर मार्गदर्शन दिया।
-
रिवर्स माइग्रेशन और वाइब्रेंट विलेज: सीमावर्ती गाँवों के पलायन को रोकने के लिए केंद्र सरकार की ‘वाइब्रेंट विलेज’ योजना को राज्य में प्रभावी ढंग से लागू कराने और सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्यटन विकास में वे व्यक्तिगत रुचि लेते हैं।
लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि) का जीवन-वृत्त भारत की उस महान सैन्य और सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जो अनुशासन, त्याग, देशप्रेम और अटूट निष्ठा पर आधारित है। अमृतसर के एक छोटे से गाँव जलालउस्मां से शुरू हुई यह यात्रा सैनिक स्कूल कपूरथला, एन.डी.ए., आई.एम.ए., चिनार कोर, थल सेना मुख्यालय और अंततः उत्तराखण्ड के राजभवन तक पहुँची।
उनकी यह जीवन-यात्रा सिद्ध करती है कि जीवन में ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए किसी समृद्ध पृष्ठभूमि या विशेषाधिकारों की आवश्यकता नहीं होती; आवश्यकता होती है तो केवल एक अविकारी लक्ष्य, अटूट गुरु-कृपा, चरित्र की पवित्रता और ‘अनथक युयुत्सा’ की।
इस महान जीवन-कथा को इतने सुंदर, प्रामाणिक और मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत करने के लिए लेखक डॉ. अधीर कुमार और प्रकाशक इंदु बुक सर्विसेज बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं। यह पुस्तक आने वाले कई दशकों तक भारत के युवाओं, छात्रों, सैन्य-अधिकारियों और प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए एक मशाल का कार्य करती रहेगी, जो अपने जीवन में विषम परिस्थितियों से जूझते हुए राष्ट्र के लिए कुछ असाधारण करने का स्वप्न देखता है।
विशेष आभार: लेखक अधीर कुमार का वंदनीय प्रयास
किसी महान व्यक्तित्व के संपूर्ण जीवन, उनके आंतरिक संघर्षों, सैन्य रहस्यों की मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में पिरोना अत्यंत दुष्कर और संवेदनशील कार्य होता है। इसके लिए केवल साहित्यिक योग्यता ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि विषय के प्रति अगाध निष्ठा, शोध-दृष्टि और गहरी अंतर्दृष्टि की आवश्यकता होती है।
यहाँ विशेष धन्यवाद और साधुवाद के पात्र हैं – प्रोफेसर (डॉ.) अधीर कुमार (आचार्य, हिन्दी विभाग, पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर, ऋषिकेश, श्री देव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय)।
जय हिन्द, जय भारत


