
अजय सिंह
नई दिल्ली: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में पहले बड़े मंत्रिपरिषद विस्तार और फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। हालांकि, सरकार या भारतीय जनता पार्टी की ओर से अभी तक इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
प्रदर्शन और प्रशासनिक दक्षता पर ध्यान
माना जा रहा है कि सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के शुरुआती दो वर्षों के कामकाज की समीक्षा के बाद यह कदम उठाने जा रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विभिन्न विभागों के सचिवों के साथ की गई मैराथन समीक्षा बैठकों को इसी कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है। जिन मंत्रालयों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, वहां नए चेहरों को मौका देकर प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और ‘विकसित भारत’ के संकल्प को गति देने की तैयारी है।
सरकार और संगठन में बढ़ेगा तालमेल
इस संभावित फेरबदल का एक मुख्य उद्देश्य सरकार और भाजपा संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना भी है। सूत्रों के अनुसार:
कुछ वरिष्ठ नेताओं को सरकारी भूमिका से मुक्त कर संगठन की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
संगठन में सक्रिय कुछ प्रमुख चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है।
क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों का संतुलन
आगामी बदलावों में राजनीतिक, क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
राज्यों का प्रतिनिधित्व: उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों को कैबिनेट में अधिक तरजीह मिल सकती है।
विविधता पर जोर: महिलाओं, पिछड़े वर्गों और एनडीए के सहयोगी दलों की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष फोकस रहने की उम्मीद है।
कार्यभार का पुनर्वितरण और केंद्रित नेतृत्व
प्रशासनिक कामकाज में तेजी लाने के लिए सरकार ‘एक मंत्री, एक भारी विभाग’ की नीति पर काम कर सकती है। वर्तमान में जो मंत्री एक से अधिक बड़े मंत्रालयों का जिम्मा संभाल रहे हैं, उनके विभागों का पुनर्वितरण किया जा सकता है ताकि हर मंत्रालय को अधिक केंद्रित नेतृत्व मिल सके।
यह संभावित फेरबदल केवल चेहरों का बदलाव नहीं, बल्कि आगामी चुनावों और प्रशासनिक सुधारों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही सरकार की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा नजर आता है।