प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज सुबह नई दिल्ली के ऐतिहासिक विज्ञान भवन में एक विशेष और गरिमामय कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे हैं। प्रातः 9:30 बजे आयोजित होने वाले इस समारोह में वे देश के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी की आत्मकथा ‘ट्रायम्फ ऑफ द इंडियन रिपब्लिक: माय लाइफ, माय स्ट्रगल्स’ (भारतीय गणराज्य की विजय: मेरा जीवन, मेरा संघर्ष) का आधिकारिक रूप से विमोचन करेंगे।
यह अवसर केवल एक नई पुस्तक के बाजार में आने का नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की उस गहराई और मजबूती को उत्सव के रूप में मनाने का दिन है जो देश के सबसे साधारण नागरिक को सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अवसर पर एक विशेष संबोधन भी देंगे, जिसमें वे रामनाथ कोविंद जी के सार्वजनिक जीवन, उनके साथ काम करने के अपने अनुभवों और देश के निर्माण में उनके द्वारा दिए गए ऐतिहासिक योगदान पर अपने विचार रखेंगे।
इस भव्य आयोजन में केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पूर्व व वर्तमान न्यायाधीशों, सांसदों, विभिन्न देशों के कूटनीतिज्ञों और देश-विदेश के प्रबुद्ध नागरिकों की उपस्थिति रहने की संभावना है।
एक साधारण गांव की झोपड़ी से रायसीना हिल का अकल्पनीय सफर
रामनाथ कोविंद जी का जीवन इस बात का सबसे जीवंत प्रमाण है कि अगर इरादे मजबूत हों और निष्ठा सच्ची हो, तो परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, वे आपकी प्रगति को नहीं रोक सकतीं। उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले के एक बेहद छोटे और पिछड़े गांव परौंख में जन्मे रामनाथ कोविंद जी का बचपन अत्यंत अभावों में बीता। एक मिट्टी-फूस के घर में रहने वाले परिवार से निकलकर देश के प्रथम नागरिक बनने तक का यह सफर कोई आसान रास्ता नहीं था।
उनकी आत्मकथा का मुख्य आकर्षण यही है कि यह किसी राजनीतिक परिवार में जन्मे व्यक्ति का संस्मरण नहीं है, बल्कि यह उस आम भारतीय का जीवन-वृत्तांत है जिसने कदम-कदम पर सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था से संघर्ष किया। जब कोई पाठक इस पुस्तक के पन्ने पलटेगा, तो उसे पता चलेगा कि कैसे प्राथमिक शिक्षा के लिए कई किलोमीटर पैदल चलने वाला बालक आगे चलकर देश की न्यायपालिका और फिर विधायिका में अपनी सशक्त पहचान बनाता है।
कानून की चौखट से संसद के गलियारे तक: न्याय और सामाजिक अधिकारिता
अपनी स्नातक और कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद श्री रामनाथ कोविंद जी ने दिल्ली में वकालत शुरू की। उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय और फिर भारत के उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में लंबे समय तक केंद्र सरकार के अधिवक्ता के रूप में कार्य किया। इस दौरान उनका मुख्य ध्यान केवल अपनी पेशेवर सफलता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने समाज के वंचित, पिछड़े और गरीब तबके के लोगों को नि:शुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वकालत के इसी अनुभव ने उन्हें भारतीय संविधान के मूल ढांचे और आम जनता की समस्याओं को करीब से समझने का अवसर दिया। इसके बाद जब वे भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से सक्रिय राजनीति में आए और उत्तर प्रदेश से दो बार राज्य सभा के सदस्य चुने गए, तो उन्होंने संसद के अंदर शिक्षा, जनजातीय विकास और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। संसद की विभिन्न समितियों के अध्यक्ष और सदस्य के रूप में उनके सुझावों ने देश की नीतियों को एक समावेशी दिशा देने का काम किया।
बिहार का राजभवन और संवैधानिक निष्ठा का परीक्षण
वर्ष 2015 में श्री रामनाथ कोविंद जी को बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन का एक ऐसा मोड़ था जहां उनकी निष्पक्षता और संवैधानिक समझ का वास्तविक परीक्षण होना था। बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक और संवेदनशील राज्य में उन्होंने राज्यपाल के पद की गरिमा को एक नए स्तर पर पहुंचाया।
राजभवन में रहते हुए उन्होंने राज्य के विश्वविद्यालय प्रशासन में व्यापक सुधार किए, कुलाधिपति के रूप में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए कड़े कदम उठाए और राज्य सरकार के साथ एक आदर्श संवैधानिक समन्वय बनाकर रखा। उनकी इसी निष्पक्षता, सादगी और शांत कार्यशैली ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, जिसके परिणामस्वरूप 2017 में उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से भारत के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया।
भारत के 14वें राष्ट्रपति: संवैधानिक मर्यादा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति
जुलाई 2017 में जब उन्होंने भारत के 14वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, तो यह पूरे देश के लिए एक गौरवशाली क्षण था। वर्ष 2017 से 2022 तक का उनका पांच साल का कार्यकाल भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और उथल-पुथल भरे दौरों में से एक रहा। इस दौरान केंद्र सरकार ने देश की दिशा बदलने वाले कई बड़े और कड़े विधायी निर्णय लिए।
राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद जी ने हमेशा संविधान की सीमाओं और मर्यादाओं का पूर्ण पालन किया। उन्होंने संसद से पारित ऐतिहासिक विधेयकों को अपनी स्वीकृति दी, राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम नागरिकों और गुमनाम नायकों (पद्म पुरस्कार विजेताओं) के लिए खोले और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए दर्जनों देशों की यात्राएं कीं। उनकी विदेश यात्राओं ने अफ्रीका, यूरोप और एशिया के कई देशों के साथ भारत के कूटनीतिक और रणनीतिक संबंधों को एक नई मजबूती प्रदान की।
पुस्तक ‘ट्रायम्फ ऑफ द इंडियन रिपब्लिक’ के अंदर क्या है?
इस आत्मकथा का नाम स्वयं में एक बहुत बड़ा संदेश है—’भारतीय गणराज्य की विजय’। यह शीर्षक इस विचार को स्थापित करता है कि भारत की वास्तविक ताकत उसके लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान में निहित है।
पुस्तक के पन्नों में पूर्व राष्ट्रपति ने अपने जीवन के कई अनछुए और संवेदनशील पहलुओं को ईमानदारी से साझा किया है:
संवैधानिक निर्णय और पृष्ठभूमि: राष्ट्रपति भवन के अंदर महत्वपूर्ण विधेयकों और अध्यादेशों पर हस्ताक्षर करते समय की मनःस्थिति और निर्णय लेने की प्रक्रिया।
शीर्ष नेताओं के साथ संवाद: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ उनके कार्यशैलीगत संबंध और विचार-विमर्श।
सामाजिक उत्थान का खाका: देश के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की पहुंच कैसे सुनिश्चित की जाए, इस पर उनका निजी दृष्टिकोण।
वैश्विक मंचों के अनुभव: विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ बैठकें और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के बढ़ते प्रभाव का आंखों देखा हाल।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण और इस विमोचन का दूरगामी प्रभाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा ऐसे व्यक्तित्वों का सम्मान करने पर जोर दिया है जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के राष्ट्र निर्माण में अपना जीवन समर्पित कर दिया। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी के साथ प्रधानमंत्री जी का एक विशेष वैचारिक और व्यावहारिक तालमेल रहा है। दोनों ही नेताओं की पृष्ठभूमि किसी बड़े राजनीतिक घराने से नहीं रही है, बल्कि दोनों ने ही देश की ज़मीनी वास्तविकताओं को जीकर अपनी पहचान बनाई है।
यही कारण है कि 12 अगस्त को होने वाला यह विमोचन समारोह केवल एक औपचारिक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं है। यह आने वाली युवा पीढ़ी को यह बताने का प्रयास है कि लोकतंत्र में लगन, निष्ठा और राष्ट्र-प्रथम की सोच से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। यह किताब देश के युवाओं, सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों और राजनीति व कानून के विद्यार्थियों के लिए एक अनमोल दस्तावेज साबित होगी।
भारतीय लोकतंत्र की विजय गाथा
संक्षेप में कहें तो पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की आत्मकथा ‘ट्रायम्फ ऑफ द इंडियन रिपब्लिक’ का लोकार्पण भारतीय गणराज्य के गौरवशाली इतिहास का एक नया अध्याय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस आत्मकथा का विमोचन किया जाना इस बात का स्पष्ट संदेश देता है कि भारत अपने उन शीर्ष नायकों के संघर्षों और योगदान को हमेशा संजोकर रखता है जिन्होंने संविधान की रक्षा की और समाज को सही दिशा दिखाई।
यह पुस्तक केवल रामनाथ कोविंद जी की अपनी आत्मकथा नहीं है, बल्कि यह हर उस भारतीय की कहानी है जो अभावों से लड़कर सपनों को सच करने का साहस रखता है। यह संस्मरण हमें याद दिलाता है कि भारत का संविधान केवल एक कानून की किताब नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक को सशक्त बनाने वाली एक जीवंत शक्ति है।


