शर्मिला ढाकड़ की जीवन यात्रा केवल एक खेल प्रतियोगिता जीतने की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसान के कभी न हार मानने वाले जज्बे की एक मिसाल है। जीवन के हर मोड़ पर जब भी दुखों ने उन्हें घेरा, शर्मिला ने अपनी हिम्मत और लगन से हर मुसीबत को पीछे छोड़ दिया। हरियाणा के एक बेहद साधारण और गरीब परिवार में जन्मी शर्मिला ने बचपन में ही पोलियो का दर्द झेला। इसके बाद शादी के बाद के सालों में उन्होंने जो भयानक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेली, उसे सुनकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए। लेकिन हर अंधेरी रात के बाद एक नया सवेरा आता है। शर्मिला ने 34 साल की उम्र में खेल की दुनिया में अपना पहला कदम रखा और आज वह राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए पैरा-एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास रच चुकी हैं।
शर्मिला ढाकड़ का शुरुआती जीवन और पोलियो की चुनौती
हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में स्थित छोटे से गांव चित्रौली में शर्मिला का जन्म एक बेहद गरीब किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता खेतीबाड़ी करते थे और उनकी माता जी देख नहीं सकती थीं। घर की आर्थिक हालत इतनी कमजोर थी कि परिवार के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी एक बड़ा संघर्ष था। जब शर्मिला महज दो साल की थीं, तब पोलियो की गंभीर बीमारी ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया।
पोलियो के इस हमले की वजह से शर्मिला का बायां पैर हमेशा के लिए कमजोर हो गया। उस दौर में गांव देहात में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी थी, जिसके कारण उनका सही समय पर सही इलाज नहीं हो सका और वह जीवन भर के लिए शारीरिक रूप से दिव्यांग हो गईं। बचपन से ही एक पैर से चलने में लाचार होने के बावजूद शर्मिला ने कभी खुद को कमजोर नहीं माना। उन्होंने गांव के स्कूल में पढ़ाई शुरू की और घर के कामों में भी अपनी मां का हाथ बटाना शुरू कर दिया।
19 साल की उम्र में विवाह और घरेलू हिंसा का भयानक दौर
साल 2005 में जब शर्मिला की उम्र मात्र 19 साल की थी, तब उनके घर वालों ने सामाजिक दबाव और अपनी गरीबी के कारण उनकी शादी कर दी। परिवार को उम्मीद थी कि शादी के बाद शर्मिला की जिंदगी संवर जाएगी, लेकिन उनका यह फैसला शर्मिला के लिए एक भयानक दुःस्वप्न साबित हुआ।
शादी के बाद शर्मिला जिस घर में पहुंचीं, वहां उनका स्वागत खुशियों से नहीं बल्कि दुखों से हुआ। उनका पहला पति गंभीर रूप से नशे का आदी था। शादी के कुछ ही दिनों बाद से शर्मिला के साथ मारपीट और गाली-गलौज का सिलसिला शुरू हो गया। उनके पति और ससुराल वाले अक्सर कम दहेज लाने के नाम पर उन्हें प्रताड़ित करते थे।
इसके साथ ही उनकी शारीरिक अक्षमता यानी उनके पैर की लाचारी को लेकर भी उन्हें आए दिन ताने मारे जाते थे और नीचा दिखाया जाता था। शर्मिला ने सोचा था कि समय के साथ शायद सब ठीक हो जाएगा। कुछ सालों बाद उन्होंने दो बेटियों को जन्म दिया। लेकिन बेटियों का जन्म होते ही ससुराल वालों का रवैया और ज्यादा क्रूर हो गया। बेटा न होने का ताना देकर शर्मिला के साथ मारपीट की तीव्रता और बढ़ा दी गई।
साल 2012 का वह भयावह मोड़ और घर से बेदखल होना
घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न का यह सिलसिला करीब सात सालों तक लगातार चलता रहा। शर्मिला अपनी दोनों मासूम बेटियों के मुंह की तरफ देखकर हर दर्द चुपचाप सहती रहीं। लेकिन साल 2012 में एक ऐसी दर्दनाक घटना घटी जिसने जुल्म की सारी हदें पार कर दीं।
एक रात उनके पति ने शराब के नशे में धुत होकर रात 11 बजे से लेकर सुबह 3 बजे तक चार घंटे तक शर्मिला को बुरी तरह पीटा। मारपीट करने के बाद उनके पति ने शर्मिला और उनकी दोनों छोटी बेटियों को घर के सारे कपड़े छीनकर कड़ाके की ठंड में आधी रात को सड़क पर फेंक दिया। शर्मिला अपनी बेटियों को अपने सीने से लिपटाकर रोती रहीं और पूरी रात सड़क पर गुजारने के लिए मजबूर हो गईं। इस घटना ने शर्मिला के आत्मसम्मान को पूरी तरह झकझोर दिया और उन्होंने तय कर लिया कि अब वह उस नरक जैसे घर में कभी वापस कदम नहीं रखेंगी।
मायके वापसी और आठ सालों का गुमनामी भरा संघर्ष
सड़क पर फेंक दिए जाने के बाद शर्मिला अपनी दोनों बेटियों को गोद में उठाकर जैसे-तैसे अपने मां-बाप के घर लौट आईं। लेकिन मायके की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। अंधे पिता और नेत्रहीन मां के पास इतने साधन नहीं थे कि वे शर्मिला और उनकी दो बेटियों का खर्च आसानी से उठा सकें।
अगले सात से आठ सालों तक शर्मिला अपने मायके में ही रहीं। समाज के तानों, रिश्तेदारों की हमदर्दी भरे व्यंग्य और बेटियों के भविष्य की चिंता ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था। बेटियों के पालन-पोषण और उनके स्कूल की फीस भरने के लिए शर्मिला ने कई छोटे-मोटे काम किए। उन्होंने कुछ समय तक स्थानीय बसों में बस कंडक्टर के रूप में भी काम किया, ताकि वह अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर सकें। इस पूरे दौर में शर्मिला को समझ नहीं आ रहा था कि उनकी जिंदगी किस दिशा में जा रही है।
अजित सिंह का साथ और जिंदगी की नई शुरुआत
साल 2018 के आसपास शर्मिला के जीवन में एक बहुत बड़ा और सुखद बदलाव आया, जब उनकी मुलाकात रेवाड़ी के रहने वाले अजित सिंह से हुई। अजित सिंह एक बेहद संवेदनशील और नेक दिल इंसान थे। जब उन्होंने शर्मिला के पुराने दुखों और उनकी लाचारी के बारे में सुना, तो उन्होंने शर्मिला का हाथ थामने का फैसला किया।
साल 2020 में शर्मिला और अजित सिंह का विवाह हो गया। अजित सिंह ने न केवल शर्मिला को पूरे सम्मान के साथ अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, बल्कि उनकी दोनों बेटियों को भी अपनी सगी बेटियों की तरह प्यार और अपना नाम दिया। शादी के बाद शर्मिला को पहली बार एक सुरक्षित और प्यार भरा पारिवारिक माहौल मिला, जिसकी उन्हें सालों से तलाश थी।
34 साल की उम्र में खेल के मैदान पर पहला कदम
शादी के कुछ ही समय बाद अजित सिंह ने शर्मिला के अंदर छिपी शारीरिक ताकत और उनके कभी न हार मानने वाले जज्बे को पहचाना। अजित सिंह ने उनसे कहा कि उन्हें पैरा-एथलेटिक्स में हिस्सा लेना चाहिए और खेलों में अपना करियर बनाना चाहिए।
जब अजित सिंह ने पहली बार यह प्रस्ताव रखा, तो शर्मिला हैरान रह गईं। शर्मिला ने हंसते हुए कहा कि उनकी उम्र अब 34 साल हो चुकी है, दो बच्चों की मां हैं और पैर से लाचार हैं, ऐसे में इस उम्र में खेलकूद की शुरुआत करना कैसे संभव हो सकता है? आमतौर पर खिलाड़ी बचपन या किशोरावस्था में ट्रेनिंग शुरू करते हैं। लेकिन अजित सिंह के दिल में पूरा विश्वास था। उन्होंने शर्मिला को समझाया कि उम्र सिर्फ एक संख्या है और अगर इरादे मजबूत हों तो किसी भी उम्र में इतिहास रचा जा सकता है।
कोचिंग, कड़ी ट्रेनिंग और परिवार का बड़ा त्याग
अजित सिंह शर्मिला को रेवाड़ी के प्रसिद्ध खेल कोच टेक चंद के पास ले गए। कोच टेक चंद ने जब शर्मिला की शारीरिक बनावट और उनकी लगन को देखा, तो उन्होंने उन्हें गोला फेंक यानी शॉट पुट और चक्र फेंक यानी डिस्कस थ्रो स्पर्धाओं के लिए चुना।
शर्मिला की ट्रेनिंग की शुरुआत बेहद कठिन थी। सालों से खेलकूद से दूर रहने के कारण शुरुआत में उनका शरीर साथ नहीं देता था, लेकिन कोच के मार्गदर्शन और पति के प्रोत्साहन से उन्होंने दिन-रात पसीना बहाना शुरू किया।
शर्मिला की ट्रेनिंग को बेहतर बनाने के लिए अजित सिंह ने अपने जीवन की बड़ी कुर्बानी दी। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी ताकि वह शर्मिला को रोज स्टेडियम ले जा सकें, उनके खाने-पीने का ध्यान रख सकें और उनकी ट्रेनिंग पर पूरा ध्यान दे सकें। पैसों की तंगी को दूर करने और खेल के उपकरण खरीदने के लिए अजित सिंह ने बैंक से लोन लिया और यहां तक कि अपना घर तक गिरवी रख दिया। पूरे परिवार का एक ही सपना था कि शर्मिला को देश के लिए मेडल जीतना है।
राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक का सफर
शर्मिला की मेहनत और उनके परिवार के त्याग का असर बहुत जल्द मैदान पर दिखाई देने लगा:
राष्ट्रीय चैंपियनशिप (2021): अपनी ट्रेनिंग शुरू करने के केवल एक साल के भीतर शर्मिला ने 2021 की नेशनल पैरा-एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और गोल्ड मेडल जीतकर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर दिया।
फाजा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता (दुबई): इसके बाद उन्होंने दुबई में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए शॉट पुट में गोल्ड मेडल और डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता।
राष्ट्रमंडल खेल 2022 (बर्मिंघम): बर्मिंघम में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में शर्मिला ने अपने वर्ग में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए चौथा स्थान हासिल किया। हालांकि वह मेडल से थोड़ा चूक गईं, लेकिन इस हार ने उनके जीतने के जुनून को और बढ़ा दिया।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक
साल 2026 में स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल शर्मिला के जीवन का सबसे ऐतिहासिक पड़ाव साबित हुए। महिलाओं के शॉट पुट F57 वर्ग के फाइनल मुकाबले में शर्मिला ने अपनी पूरी ताकत और सालों के दर्द को एक ही थ्रो में उड़ेल दिया।
उन्होंने अपने सबसे बेहतरीन प्रदर्शन के साथ 9.81 मीटर दूर गोला फेंककर पहला स्थान हासिल किया और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ ही शर्मिला राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में पैरा-एथलेटिक्स में भारत को गोल्ड मेडल दिलाने वाली पहली महिला एथलीट बन गईं। उन्होंने भारत का 20 सालों से चला आ रहा मेडल का सूखा भी खत्म कर दिया।
जब ग्लासगो के स्टेडियम में भारत का राष्ट्रगान बजा और तिरंगा लहराया गया, तो शर्मिला की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। यह आंसू सिर्फ एक मेडल की खुशी के नहीं थे, बल्कि उन सालों के दर्द, अपमान और संघर्ष की जीत के आंसू थे।
शर्मिला ढाकड़ का देश के नाम संदेश
शर्मिला ढाकड़ की यह प्रेरक कहानी भारत की हर उस महिला के लिए एक मिसाल है जो घरेलू हिंसा, समाज के तानों या शारीरिक लाचारी के कारण निराश होकर बैठ जाती हैं। शर्मिला ने साबित कर दिया कि हालात चाहे जितने भी खराब हों, अगर इंसान के अंदर खुद पर विश्वास हो और सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो हर बंद दरवाजा खुल सकता है।


