राजभवन में, हाल ही में एक ऐसा भावुक और गरिमामय पल देखने को मिला, जब लोक भवन के बेहद लोकप्रिय, विनम्र और ऊर्जावान एडीसी मेजर सुमित कुमार शादीजा को उनके ढाई वर्षों के सफल और ऐतिहासिक कार्यकाल के बाद एक भव्य विदाई दी गई।
लोक भवन में बिताया गया उनका कार्यकाल प्रशासनिक दक्षता, बेहतरीन प्रोटोकॉल प्रबंधन और मानवीय संवेदनाओं के अद्भुत संतुलन के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। राजभवन में आने वाले हर विशिष्ट अतिथि से लेकर आम नागरिक तक, सभी के साथ उनका व्यवहार अत्यंत सौम्य और सम्मानजनक रहा।
मासूम चेहरे के पीछे छुपा एक निडर कमांडो योद्धा
मेजर सुमित कुमार शादीजा के व्यक्तित्व की सबसे खास बात यह है कि उनके बेहद शांत, मासूम और मुस्कुराते हुए चेहरे को देखकर कोई भी पहली नज़र में यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि वे भारतीय सेना के कितने सख्त और जाबांज़ योद्धा हैं। लोक भवन में एडीसी के रूप में अपनी सेवा देने से पहले वे भारतीय सशस्त्र बलों में एक बेहद सख्त कमांडो इंस्ट्रक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
कमांडो इंस्ट्रक्टर के रूप में उन्होंने न केवल खुद देश के सबसे कठिन और घातक सैन्य प्रशिक्षण को पूरा किया, बल्कि सेना के कई युवा जवानों और अधिकारियों को विषम परिस्थितियों में लड़ने और देश की रक्षा करने के लिए तैयार भी किया। वे अनुशासन, अदम्य साहस और प्रशासनिक कुशलता का एक दुर्लभ और मिसाली मेल हैं।
असम राइफल्स में वापसी और आगे का सफर
राजभवन में अपनी सेवाओं की अवधि को पूरी निष्ठा के साथ पूरा करने के बाद अब मेजर सुमित अपनी मूल रेजिमेंट असम राइफल्स में वापस लौट रहे हैं। असम राइफल्स, जिसे ‘पूर्वोत्तर का प्रहरी’ भी कहा जाता है, भारत की सबसे पुरानी और पराक्रमी पैरामिलिट्री/सैन्य बलों में से एक है।
पूर्वोत्तर भारत की दुर्गम पहाड़ियों, घने जंगलों और संवेदनशील सीमाओं पर देश की रक्षा करने का दायित्व इसी बहादुर बल पर होता है। राजभवन के शांत और प्रशासनिक माहौल से निकलकर अब मेजर सुमित दोबारा अपनी रेजिमेंट के साथ अग्रिम मोर्चे पर देश की सेवा के लिए तत्पर हैं।
एडीसी का पद केवल चमक-दमक, सुनहरी डोरियों या प्रोटोकॉल तक सीमित नहीं है। यह पद 400 साल पुराने उस गौरवशाली इतिहास की निरंतरता है, जहाँ एक अधिकारी अपनी जान की परवाह किए बिना कर्तव्य पथ पर डटा रहता था। युद्ध के मैदान में बारूद के धुएं के बीच संदेश पहुंचाने से शुरू हुआ यह सफर आज देश के सबसे सर्वोच्च संवैधानिक संस्थानों की गरिमा, सुरक्षा और संचालन की रीढ़ बन चुका है।
एडीसी की भूमिका और इतिहास सैन्य अनुशासन, अदम्य साहस, प्रशासनिक दक्षता और कूटनीतिक शिष्टाचार की एक ऐसी अद्भुत गाथा है, जो सदियों के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। जब हम सेना या उच्च संवैधानिक पदों के आसपास तैनात चमकदार वर्दीधारी अधिकारियों को देखते हैं, तो हमारी नज़र सबसे पहले उनकी छाती पर सजे पदकों और कंधों से लटकती सुनहरी डोरियों पर जाती है। इन अधिकारियों को एडीसी यानी ‘एड-डे-कैंप’ कहा जाता है। यह महज एक सैन्य पद या प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह निष्ठा, सतर्कता और त्वरित निर्णयों का एक जीवित उदाहरण है। सदियों पहले युद्ध के मैदान में बारूद के धुएं के बीच से शुरू हुई यह यात्रा आज देश के सबसे प्रतिष्ठित संवैधानिक भवनों तक पहुंच चुकी है।
16वीं और 17वीं सदी का युद्धक्षेत्र: जहां से जन्मी यह ऐतिहासिक भूमिका
आज के आधुनिक दौर में हमारे पास त्वरित संचार के साधन मौजूद हैं। जीपीएस, उपग्रह तकनीक, एनक्रिप्टेड वायरलेस सेट और वॉकी-टॉकी जैसी सुविधाओं ने युद्ध नियंत्रण कक्ष की परिभाषा ही बदल दी है। लेकिन 16वीं और 17वीं शताब्दी के दौर की कल्पना कीजिए, जब इनमें से किसी भी तकनीक का अस्तित्व नहीं था।
उस ज़माने में युद्ध का मैदान केवल हथियारों की लड़ाई नहीं, बल्कि सूचनाओं की गति का मुकाबला था। सैकड़ों एकड़ में फैले विशाल मैदानों में तोपों की गूंज, घोड़ों की टापों का शोर, उड़ती हुई धूल और बारूद के घने धुएं के बीच यह देख पाना भी मुश्किल होता था कि कौन सा मोर्चा किस स्थिति में है। ऐसी अफरा-तफरी के बीच सेनापति द्वारा लिया गया एक गलत फैसला पूरी की पूरी जीती हुई जंग को हार में बदल सकता था।
ऐसे में सेनापति को एक ऐसे बेहद भरोसेमंद, जाबांज़ और घुड़सवारी में माहिर अफसर की सख्त जरूरत होती थी, जो अपनी जान की बाजी लगाकर गोलियों और तोपों की बौछार के बीच से घोड़ा दौड़ा सके।
इस अफसर का मुख्य काम सेनापति के गुप्त और महत्वपूर्ण संदेशों को आखिरी मोर्चे पर लड़ रही सैन्य टुकड़ी तक बिल्कुल सटीक और सही-सलामत पहुंचाना होता था। संदेश पहुंचाने में हुई कुछ मिनटों की देरी का मतलब सैकड़ों सैनिकों की जान जाना और पूरा साम्राज्य गँवा देना होता था। इन्हीं निष्ठावान ‘मैदान-ए-जंग के हरकारों’ को समय के साथ Aide-de-Camp यानी ‘एडीसी’ का नाम मिला।
‘एड-डे-कैंप’ शब्द की उत्पत्ति और नेपोलियन बोनापार्ट का स्वर्णिम काल
‘एड-डे-कैंप’ मूल रूप से फ्रेंच भाषा का एक समृद्ध शब्द समूह है। इसका सीधा और सरल अर्थ होता है— “कैंप में सेनापति का व्यक्तिगत सहायक”। शुरुआती दौर में यह पद केवल संदेश पहुँचाने तक सीमित था, लेकिन 19वीं सदी की शुरुआत में महान सैन्य रणनीतिकार नेपोलियन बोनापार्ट ने इस व्यवस्था को एक बिल्कुल नया मुकाम और वैश्विक पहचान दी।
नेपोलियन ने अपनी सेना में एडीसी के चयन के मापदंड पूरी तरह बदल दिए। उनके एडीसी केवल निडर संदेशवाहक नहीं होते थे, बल्कि वे असाधारण बुद्धिमत्ता, युद्ध कौशल और त्वरित रणनीतिक समझ से लबरेज युवा सैन्य अधिकारी होते थे। नेपोलियन के एडीसी को युद्ध के मैदान की स्थिति को तुरंत भांपने का अधिकार होता था। जरूरत पड़ने पर वे सेनापति के आदेश का इंतजार किए बिना खुद मोर्चे पर उतरकर रणनीतिक निर्णय लेते थे और अपनी बुद्धिमत्ता से हारी हुई बाजी पलट देते थे।
उस दौर में यूरोपीय सेनाओं में किसी युवा अधिकारी के लिए एडीसी चुना जाना वीरता, बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित सनद माना जाता था। जिसने भी एडीसी के रूप में अपनी सेवाएं दीं, उसके लिए सैन्य करियर के सर्वोच्च शिखरों पर पहुंचने के रास्ते खुद-ब-खुद खुल जाते थे।
तोपों के धुएं से कूटनीतिक गलियारों तक: जिम्मेदारियों का बदलता स्वरूप
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जैसे-जैसे सैन्य प्रौद्योगिकी और युद्ध की तकनीकों का विकास हुआ, वैसे-वैसे सीधे आमने-सामने के युद्ध के नियम भी बदलने लगे। सीधी रणभूमि की जगह अब आधुनिक रणनीति, वैश्विक कूटनीति और जटिल प्रशासनिक प्रबंधन ने ले ली।
यूरोप के शाही राजघरानों से लेकर ब्रिटिश भारत के गवर्नर-जनरल और वाइसरॉय के दौर में एडीसी का दायित्व क्षेत्र एक नए रूप में सामने आया। अब भले ही सीधे युद्ध के मैदान में घोड़ा दौड़ाने की चुनौतियाँ पीछे छूट रही थीं, लेकिन प्रशासनिक, कूटनीतिक और प्रोटोकॉल प्रबंधन ही एडीसी के लिए एक नया ‘युद्ध क्षेत्र’ बन चुका था।
सर्वोच्च प्रशासनिक और संवैधानिक कार्यालयों का सुचारू संचालन सुनिश्चित करना, संवेदनशील पत्राचार को संभालना, अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मुलाकातों की बारीकियों को देखना और समय-बद्ध फैसलों को धरातल पर उतारना—ये ऐसे काम थे जहाँ जरा सी भी मानवीय चूक बहुत भारी पड़ सकती थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक छोटी सी भूल भी दो देशों के बीच के रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर सकती थी। इसलिए, शांति काल में भी एडीसी की भूमिका की गंभीरता और उसका रणनीतिक महत्व कम नहीं हुआ, बल्कि और अधिक बहुआयामी हो गया।
आधुनिक भारत में एडीसी की भूमिका: संवैधानिक गरिमा और पब्लिक फेस
स्वतंत्रता के बाद भारत ने इस ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित परंपरा को अपनी प्रशासनिक और सैन्य संरचना में पूरी गरिमा के साथ अपनाया। वर्तमान समय में भारत के राष्ट्रपति भवन, राज्यों के राजभवनों (लोक भवन) और तीनों सेनाओं (थल सेना, नौसेना, वायु सेना) के सेनाध्यक्षों के साथ-साथ भारतीय पुलिस सेवा (IPS) से चुने गए बेहतरीन अधिकारियों को एडीसी के रूप में तैनात किया जाता है।
आज के समय में एडीसी केवल एक प्रशासनिक सहायक की भूमिका तक सीमित नहीं हैं। वे उस उच्च संवैधानिक कार्यालय के मुख्य ‘पब्लिक फेस’ और गरिमा के रक्षक होते हैं। जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष, राजनीतिक प्रतिनिधि, विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य नागरिक या आम जनता राष्ट्रपति या राज्यपाल से मिलने पहुँचती है, तो उनका पहला प्रत्यक्ष सामना इन्हीं अनुशासित और सौम्य एडीसी अधिकारियों से होता है।
एडीसी के मुख्य दायित्वों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन: किसी भी औपचारिक या अनौपचारिक कार्यक्रम के दौरान देश और राज्य के सर्वोच्च प्रोटोकॉल के नियमों का 100% पालन सुनिश्चित करना।
उच्च स्तरीय सुरक्षा और समन्वय: संवैधानिक प्रमुखों की सुरक्षा एजेंसियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखना और उनकी यात्राओं व बैठकों का निर्बाध संचालन करना।
सैरेमोनियल आयोजनों का संचालन: स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, शपथ ग्रहण समारोह और पद्म पुरस्कारों जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर कार्यक्रमों के समय और क्रम का सटीक प्रबंधन करना।
उत्कृष्ट छवि का प्रतिनिधित्व: संवैधानिक कार्यालय की सौम्यता, अनुशासन, निडरता और गरिमा को अपने व्यक्तित्व और व्यवहार से जनता के सामने प्रदर्शित करना।
कंधे की सुनहरी रस्सी (Aiguillette) की दिलचस्प और ऐतिहासिक कहानी
एडीसी की विशेष यूनिफॉर्म में सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करने वाली चीज होती है उनके कंधे से लटकती हुई बेहद खूबसूरत सुनहरी रस्सी, जिसे सैन्य भाषा में एगिलेट (Aiguillette) कहा जाता है।
इस सुनहरी डोरी को पहनने के पीछे इतिहास में कई बेहद दिलचस्प कहानियां और लोकश्रुतियां प्रचलित हैं:
पीतल की पेंसिल और डोरी का सिद्धांत
सबसे लोकप्रिय सैन्य कहानियों में से एक यह है कि 17वीं-18वीं सदी में युद्ध के मैदान में घोड़े की पीठ पर सरपट दौड़ते समय सेनापति का आदेश लिखना बेहद मुश्किल होता था। एडीसी अपने कंधे पर पीतल की पेंसिल और उसे बांधने के लिए एक मजबूत डोरी रखते थे, ताकि भागदौड़ और अफरा-तफरी के बीच लिखने का सामान कहीं खो न जाए। समय के साथ यही व्यावहारिक जरूरत आधुनिक वर्दी में एक चमकदार और प्रतिष्ठित सजावटी डोरी ‘एगिलेट’ के रूप में बदल गई।
मेजर सुमित कुमार शादीजा जैसे अधिकारी इस बात का सबसे बड़ा सबूत हैं कि एक सच्चा सैन्य अधिकारी अपनी बहुमुखी प्रतिभा से किसी भी भूमिका को पूर्णता तक पहुंचा सकता है, चाहे वह सीमा पर कमांडो की भूमिका में दुश्मन का मुकाबला करना हो या फिर राजभवन में देश के सर्वोच्च प्रोटोकॉल को पूरी विनम्रता से संभालना हो। माँ भारती ऐसे जाबांज़, निष्ठावान और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को हमेशा अपना आशीर्वाद, असीम साहस और सामर्थ्य प्रदान करे तथा उन्हें हर मोर्चे पर सुरक्षित और विजयी रखे।


