जल जीवन मिशन और मनरेगा का अभिसरण उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने और स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इसी विषय की गंभीरता को समझते हुए उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने नई दिल्ली स्थित कृषि भवन में केंद्रीय कृषि, किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान से शिष्टाचार भेंट की। इस मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच ग्रामीण भारत में पानी की योजनाओं के रख-रखाव, स्थानीय स्तर पर कौशल विकास और ग्रामीणों की दैनिक आजीविका की सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु जल जीवन मिशन के तहत तैयार की गई पेयजल परिसंपत्तियों का दीर्घकालिक संचालन और देखभाल रहा। सतपाल महाराज ने केंद्रीय मंत्री के समक्ष एक बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा। उन्होंने आग्रह किया कि नल जल मित्र कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित होने वाले और काम करने वाले स्थानीय लोगों को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा के जरिए मजदूरी और कार्य दिवस उपलब्ध कराए जाएं। इस व्यवस्था से न केवल पेयजल योजनाओं की नियमित देखभाल सुनिश्चित होगी, बल्कि गांवों में काम करने वाले युवाओं को आर्थिक सुरक्षा भी मिलेगी।
ग्रामीण विकास और पेयजल योजनाओं की मौजूदा चुनौतियाँ
भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया जल जीवन मिशन देश के हर ग्रामीण घर तक नल से जल पहुंचाने की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत देशभर के गांवों में बड़े पैमाने पर पानी की टंकियां, पाइपलाइन, पंपिंग स्टेशन और जल शोधन संयंत्र बनाए गए हैं। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में यह बुनियादी ढांचा तैयार करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती था, जिसे सरकार ने काफी हद तक पूरा किया है। लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती इन निर्मित संपत्तियों को सुचारू रूप से चलाने और उनकी निरंतर देखभाल करने की है।
पेयजल लाइनों में आने वाली खराबी, पंपों की मरम्मत, वाल्व की देखभाल और पानी की शुद्धता की जांच जैसे कामों के लिए गांव के स्तर पर ही कुशल लोगों की जरूरत होती है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने नल जल मित्र कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य गांव के ही स्थानीय युवाओं और नागरिकों को तकनीकी प्रशिक्षण देकर उन्हें इस योग्य बनाना है कि वे अपने गांव की पानी की व्यवस्था की देखभाल खुद कर सकें।
हालांकि, इस जन-कल्याणकारी पहल के धरातल पर क्रियान्वयन के दौरान कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही हैं। उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के समक्ष इसी जमीनी सच्चाई को बेहद प्रमुखता से रेखांकित किया।
नल जल मित्र प्रशिक्षण में आजीविका का संकट
उत्तराखंड के सिंचाई, लोक निर्माण और ग्रामीण निर्माण मंत्री सतपाल महाराज ने केंद्रीय मंत्री को बताया कि वर्तमान में नल जल मित्र कार्यक्रम के तहत स्थानीय निवासियों और युवाओं को प्रशिक्षित करने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले ज्यादातर युवा और नागरिक अपनी रोजमर्रा की आजीविका के लिए दैनिक मजदूरी, खेती-बाड़ी या छोटे-मोटे स्थानीय कामों पर निर्भर रहते हैं।
जब इन ग्रामीणों को कई दिनों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में बुलाया जाता है, तो उस दौरान उनका दैनिक काम छूट जाता है। काम छूटने का सीधा मतलब है कि उस दिन उनके घर में होने वाली आय बंद हो जाती है। अपनी दैनिक आजीविका का नुकसान होने के डर से बहुत से इच्छुक और योग्य ग्रामीण इस प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने से कतराते हैं या इसमें पूरी रुचि नहीं दिखा पाते हैं।
सतपाल महाराज ने स्पष्ट किया कि जब तक ग्रामीणों के इस आर्थिक नुकसान की भरपाई का कोई ठोस रास्ता नहीं निकाला जाता, तब तक नल जल मित्र योजना का दायरा बढ़ाना और शत-प्रतिशत स्थानीय भागीदारी हासिल करना काफी कठिन होगा। अगर गांव के लोग प्रशिक्षित ही नहीं होंगे, तो अरबों रुपये की लागत से बनी पेयजल योजनाएं बिना देखभाल के समय से पहले ही खराब हो सकती हैं।
मनरेगा के साथ जोड़कर निकाला जा सकता है स्थाई समाधान
इस समस्या का एक बहुत ही व्यावहारिक और दूरदर्शी समाधान प्रस्तुत करते हुए सतपाल महाराज ने सुझाव दिया कि नल जल मित्र कार्यक्रम को मनरेगा योजना के साथ औपचारिक रूप से जोड़ा जाना चाहिए। नियम के अनुसार यदि मनरेगा के माध्यम से प्रशिक्षण की अवधि के दौरान प्रतिभागियों को नियमानुसार मजदूरी और कार्य-दिवस की सुविधा दी जाए, तो ग्रामीणों का आजीविका से जुड़ा डर पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
जब ग्रामीणों को यह भरोसा होगा कि प्रशिक्षण लेने के दिनों में भी उन्हें उनके परिवार के भरण-पोषण के लिए उचित दैनिक मजदूरी मिलती रहेगी, तो वे खुद आगे आकर इस तकनीकी प्रशिक्षण का हिस्सा बनेंगे। इससे राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में एक बहुत बड़ा कुशल कार्यबल तैयार हो जाएगा।
यह कुशल कार्यबल अपने-अपने गांवों में जल जीवन मिशन के तहत बनी पानी की टंकियों, पाइपलाइनों और अन्य संपत्तियों की नियमित देखरेख, छोटी-मोटी मरम्मत और रखरखाव का काम बेहद जिम्मेदारी से कर सकेगा। इस व्यवस्था से न केवल सरकारी बुनियादी ढांचे की उम्र बढ़ेगी और उसका दीर्घकालीन स्थायित्व मजबूत होगा, बल्कि गांवों में स्थायी स्वरोजगार और आजीविका के नए रास्ते भी खुलेंगे।
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का सकारात्मक रुख और निर्देश
उत्तराखंड के मंत्री सतपाल महाराज द्वारा रखे गए इस विचारशील और व्यावहारिक प्रस्ताव का केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बहुत ही गर्मजोशी और गंभीरता के साथ स्वागत किया। उन्होंने माना कि ग्रामीण भारत में बुनियादी सुविधाओं के रखरखाव के लिए स्थानीय स्तर पर आजीविका की सुरक्षा देना एक बेहद जरूरी और दूरगामी सोच है।
शिवराज सिंह चौहान ने सतपाल महाराज के सुझावों से पूरी तरह सहमति जताते हुए इस पर तुरंत कार्रवाई करने का आश्वासन दिया। उन्होंने बैठक के दौरान ही अपने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे मनरेगा और जल जीवन मिशन के इस प्रस्तावित अभिसरण के कानूनी, प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं का अध्ययन करें और जल्द से जल्द आवश्यक दिशानिर्देश तैयार करें।
केंद्रीय मंत्री के इस त्वरित और सकारात्मक रुख से यह उम्मीद जागी है कि जल्द ही केंद्र सरकार की ओर से इस संबंध में कोई नीतिगत निर्णय लिया जा सकता है, जिसका फायदा उत्तराखंड सहित पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों को मिलेगा।
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए क्यों बेहद खास है यह पहल
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में ग्रामीण पेयजल योजनाओं का संचालन मैदानी इलाकों की तुलना में काफी अलग और कठिन होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलन, अत्यधिक बारिश और ठंड के कारण पानी की पाइपलाइन टूटने या स्रोत में खराबी आने की आशंका हमेशा बनी रहती है।
ऐसे में यदि किसी दूरदराज के गांव में पानी की आपूर्ति बाधित होती है, तो जिला मुख्यालय या ब्लॉक स्तर से तकनीशियन को वहां पहुंचने में कई घंटे या कभी-कभी दिन भी लग जाते हैं।
यदि नल जल मित्र योजना के तहत गांव का ही कोई व्यक्ति प्लंबिंग, फिटिंग और इलेक्ट्रिकल काम में निपुण होगा, तो वह किसी भी गड़बड़ी को तुरंत ठीक कर सकेगा। इससे ग्रामीणों को पीने के पानी के संकट से नहीं जूझना पड़ेगा।
इसके साथ ही, पहाड़ों से होने वाले पलायन को रोकने में भी यह कदम मददगार साबित हो सकता है। जब गांव के युवाओं को अपने ही घर के पास पानी की योजनाओं की देखभाल करने के बदले मनरेगा के जरिए नियमित मजदूरी और सम्मानजनक काम मिलेगा, तो वे आजीविका की तलाश में बड़े शहरों की तरफ जाने के लिए मजबूर नहीं होंगे।
सुदृढ़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता कदम
जल जीवन मिशन और मनरेगा का यह संभावित मेल वास्तव में दो बड़ी सरकारी योजनाओं के संसाधनों का सही और कुशल उपयोग करने का बेहतरीन उदाहरण है। एक तरफ जहां मनरेगा का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को अकुशल और कुशल काम के जरिए रोजगार की गारंटी देना है, वहीं दूसरी तरफ जल जीवन मिशन का मकसद हर घर तक साफ पानी पहुंचाना है।
जब इन दोनों योजनाओं को आपस में जोड़ा जाएगा, तो सरकारी धन का दुरुपयोग रुकेगा और हर पैसे का सीधा लाभ सीधे ग्रामीण जनता को मिलेगा। इससे गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और सरकारी संपत्तियों का रखरखाव बिना किसी अतिरिक्त भारी भरकम बजट के आसानी से संभव हो सकेगा।
उत्तराखंड सरकार द्वारा उठाई गई यह आवाज पूरे देश के ग्रामीण विकास मॉडल के लिए एक नजीर बन सकती है। सतपाल महाराज और शिवराज सिंह चौहान के बीच हुई यह शिष्टाचार भेंट केवल दो नेताओं की औपचारिकता मात्र नहीं थी, बल्कि यह भारत के गांवों को जल-सुरक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुत ही सार्थक वार्ता साबित हुई है।


