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कण्वाश्रम भरत से भारतवर्ष के जरिए चमकी उत्तराखंड की पहचान, राज्यपाल गुरमीत सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार मनोज इस्तवाल के प्रयासों की तारीफ की

कण्वाश्रम भरत से भारतवर्ष पुस्तक के लेखक और विगत 35 वर्षों से पत्रकारिता जगत में अपनी बहुमूल्य सेवाएं दे रहे वरिष्ठ पत्रकार मनोज इस्तवाल ने राज्य के महामहिम राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह से एक विशेष शिष्टाचार भेंट की। इस गरिमामयी मुलाकात के दौरान उन्होंने अपनी बहुचर्चित और सम्मानित कृति महामहिम राज्यपाल को सादर भेंट की। उत्तराखंड की इस विशेष कृति को राष्ट्रीय स्तर पर मिले प्रथम पुरस्कार से न केवल लेखक की वर्षों की कठिन साधना को पहचान मिली है, बल्कि पूरे प्रदेश का मस्तक भी गर्व से ऊंचा हुआ है।

उत्तराखंड की माटी में ज्ञान, संस्कृति और अध्यात्म का जो अटूट संगम देखने को मिलता है, उसकी झलक इस पुस्तक के पन्नों में साफ तौर पर दिखाई देती है। महामहिम राज्यपाल ने लेखक की इस उपलब्धि पर अत्यधिक प्रसन्नता जताई और उन्हें सह्रदय बधाई दी।

उन्होंने इस बात पर विशेष रूप से खुशी व्यक्त की कि राज्य के गौरवशाली इतिहास और पौराणिक संदर्भों पर आधारित किसी कृति को देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रकाशन मंच पर इतना बड़ा सम्मान प्राप्त हुआ है। यह मुलाकात महज एक औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि यह उत्तराखंड के समृद्ध इतिहास, पौड़ी गढ़वाल की अनूठी पहचान और पौराणिक कण्वाश्रम की महान परंपरा पर हुआ एक सार्थक संवाद था।

कण्वाश्रम भरत से भारतवर्ष पुस्तक की राष्ट्रीय सफलता और पुरस्कार का महत्व
कण्वाश्रम भरत से भारतवर्ष को मिले इस राष्ट्रीय पुरस्कार की महत्ता इसलिए भी बहुत बढ़ जाती है क्योंकि यह सम्मान देश की सबसे प्रामाणिक प्रकाशन संस्थाओं द्वारा प्रदान किया गया है। द फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स तथा मेंबर्स ऑफ इंटरनेशनल पब्लिशर्स एसोसिएशन, जिनेवा द्वारा आयोजित वर्ष 2026 के 46वें वार्षिक पुस्तक समारोह में इस पुस्तक का चयन किया गया था। कला और कॉफी टेबल बुक (हिंदी) श्रेणी में इस पुस्तक ने पूरे देश में प्रथम स्थान हासिल करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले इस प्रतिष्ठित समारोह में देशभर की उत्कृष्ट पुस्तकों को नामांकित किया जाता है। इतने बड़े मंच पर उत्तराखंड की किसी कलात्मक और शोधपरक पुस्तक का पहला पुरस्कार जीतना यह साबित करता है कि राज्य का पौराणिक इतिहास और उसकी सांस्कृतिक धरोहर आज भी कितनी प्रासंगिक और प्रभावशाली है। यह पुरस्कार केवल एक पुस्तक का सम्मान नहीं है, बल्कि यह उस गहन शोध, दृष्टिकोण और रचनात्मकता का सम्मान है जिसके माध्यम से हमारे प्राचीन इतिहास को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत किया गया है।

वरिष्ठ पत्रकार मनोज इस्तवाल ने इस पुस्तक को तैयार करने में अपने दशकों के पत्रकारिता अनुभव और क्षेत्रीय अध्ययन का समावेश किया है। एक कॉफी टेबल बुक के रूप में इसमें चित्रों और तथ्यों का जो सुंदर समन्वय किया गया है, वह पाठकों को सीधे उत्तराखंड की पौराणिक जड़ों से जोड़ता है। जब इस स्तर की पुस्तक को अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय निकायों द्वारा मान्यता मिलती है, तो उससे आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी संस्कृति और इतिहास को गहराई से जानने-समझने की प्रेरणा मिलती है।

पौड़ी गढ़वाल की ऐतिहासिक माटी और उसकी विलक्षण प्रतिभाएं
इस विशेष मुलाकात के दौरान महामहिम राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने लेखक मनोज इस्तवाल का संपूर्ण परिचय बड़ी शिद्दत और आत्मीयता के साथ जाना। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि लेखक का संबंध पौड़ी गढ़वाल जिले से है, तो संवाद और भी अधिक रोचक तथा आत्मीय हो गया। महामहिम ने पौड़ी गढ़वाल की उस महान माटी को नमन किया जिसने देश को एक से बढ़कर एक महान जननायक, रणनीतिकार, मुख्य प्रशासक और विचारक दिए हैं।

पौड़ी गढ़वाल की इस विशेष धरती का योगदान भारतीय राजनीति, सैन्य सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में अप्रतिम रहा है। इस क्षेत्र ने देश को ऐसे नगीने दिए हैं जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
देश के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल विपिन रावत: जिन्होंने भारतीय सेना के आधुनिकीकरण और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बिठाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल: जिनकी कूटनीतिक और सुरक्षा रणनीतियों का लोहा आज पूरी दुनिया मानती है।
उत्तराखंड के पांच पूर्व मुख्यमंत्री: जिनमें मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूरी, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा, त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत शामिल हैं। इन सभी नेताओं ने अपने-अपने कार्यकाल में राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उत्तर प्रदेश के दो महान मुख्यमंत्री: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा तथा वर्तमान में उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जिनका मूल संबंध भी इसी पावन पौड़ी गढ़वाल की माटी से है।

महामहिम राज्यपाल ने कहा कि पौड़ी गढ़वाल की थाती और माटी में निश्चित रूप से कुछ ऐसा अद्भुत और अलौकिक तत्व समाहित है, जिसके कारण इस क्षेत्र से लगातार ऐसी महान हस्तियां निकलकर सामने आती रही हैं जिन्होंने देश के भाग्य और दिशा को तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इस जिले की बौद्धिक और सांस्कृतिक उर्वरा शक्ति अद्वितीय है।

पौड़ी के सर्किट हाउस से दिखने वाले हिमालय का मनमोहक सौंदर्य
बातचीत के दौरान महामहिम राज्यपाल केवल प्रशासनिक और राजनीतिक विषयों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने पौड़ी गढ़वाल से जुड़ी अपनी पुरानी और सुंदर स्मृतियों को भी साझा किया। उन्होंने पौड़ी स्थित प्रसिद्ध सर्किट हाउस के अपने अनुभवों को याद करते हुए वहां से दिखाई देने वाले उत्तुंग हिमालयी शिखरों के विहंगम दृश्य का बेहद जीवंत वर्णन किया।

उन्होंने बताया कि पौड़ी के सर्किट हाउस से जब सामने फैले विशाल हिमालय की ओर देखा जाता है, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने अपनी सबसे सुंदर चित्रकारी यहीं उकेर दी हो।
वहां से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां बेहद स्पष्ट, भव्य और मनमोहक नजर आती हैं। विशेष रूप से:
त्रिशूल पर्वत: अपनी विशिष्ट बनावट और राजसी ठाट के साथ क्षितिज पर चमकता हुआ दिखाई देता है।
नंदा देवी पर्वत: भारत की इस पवित्र और विशाल चोटी का सौंदर्य मन को एक अजीब सी शांति और दिव्यता से भर देता है।
चौखंबा शिखर: चार विशाल स्तंभों की तरह खड़ा यह पर्वत समूह सूर्य की किरणों में अलौकिक प्रतीत होता है।
हाथी पर्वत: अपनी अनूठी आकृति के लिए प्रसिद्ध यह शिखर हर दर्शक को मंत्रमुग्ध कर देता है।

महामहिम ने विशेष रूप से यह उल्लेख किया कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय इन हिमाच्छादित चोटियों का रंग पल-पल बदलता रहता है। सुबह की पहली किरण जब इन चोटियों पर पड़ती है, तो वे सुनहरे रंग में नहा उठती हैं, जबकि शाम के समय ढलते सूरज की लालिमा इन्हें एक अद्भुत और जादुई रूप दे देती है। इन दृश्यों को देखना अपने आप में एक आध्यात्मिक और शांतिदायक अनुभव होता है। उन्होंने कहा कि ऐसे विहंगम प्राकृतिक माहौल में रहने वाले लोगों का विचारशील, संवेदनशील और बौद्धिक होना स्वाभाविक ही है।

कण्वाश्रम: चक्रवर्ती राजा भरत और भारतीय सभ्यता का उद्गम स्थल
महामहिम राज्यपाल ने पौड़ी गढ़वाल के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व की चर्चा करते हुए कोटद्वार स्थित महान कण्व नगरी और कण्वाश्रम का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र केवल प्राकृतिक सुंदरता का केंद्र नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी भारतीय सभ्यता और नामकरण का आधार बिंदु भी है।

इसी पवित्र कण्वाश्रम क्षेत्र में महर्षि कण्व का आश्रम स्थापित था, जो प्राचीन काल में ज्ञान, अध्यात्म और तपस्या का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। इसी पावन आश्रम में माता शकुंतला और राजा दुष्यंत के पुत्र चक्रवर्ती राजा भरत का जन्म और लालन-पालन हुआ था। राजा भरत के शौर्य, पराक्रम और न्यायप्रियता के कारण ही हमारे इस महान देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। कोटद्वार के पास मालिनी नदी के तट पर स्थित यह ऐतिहासिक स्थल आज भी उस स्वर्णिम अतीत की गवाही देता है।

कण्वाश्रम भरत से भारतवर्ष पुस्तक के माध्यम से इसी भूले-बिसरे और अत्यंत महत्वपूर्ण इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने का एक बहुत ही सराहनीय प्रयास किया गया है। जब कोई लेखक अपनी लेखनी से इस प्रकार के पौराणिक संदर्भों को उजागर करता है, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं लिखता, बल्कि अपनी संस्कृति की जड़ों को दोबारा सींचने का काम करता है।

पत्रकारिता में 35 वर्षों का अनुभव और सामाजिक उत्तरदायित्व
वरिष्ठ पत्रकार मनोज इस्तवाल का मीडिया क्षेत्र में 35 से भी अधिक वर्षों का एक लंबा और बेदाग सफर रहा है। तीन दशकों से अधिक समय तक लगातार सक्रिय पत्रकारिता में रहने के कारण उन्हें उत्तराखंड की जमीनी हकीकत, जन-सरोकारों, संस्कृति, लोकगाथाओं और भौगोलिक परिस्थितियों की बहुत ही गहरी समझ है।

एक अनुभवी पत्रकार का यह सामाजिक दायित्व होता है कि वह केवल दैनिक घटनाओं की रिपोर्टिंग तक सीमित न रहे, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ ऐसा स्थाई योगदान दे जो ऐतिहासिक धरोहर बन सके। मनोज इस्तवाल ने अपनी इस कलात्मक पुस्तक के जरिए इसी दायित्व का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया है।

उनकी इस पुस्तक को जब अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की निर्णायक मंडलियों द्वारा प्रथम पुरस्कार दिया गया, तो यह इस बात का प्रमाण है कि यदि अनुभव, लगन और सही शोध के साथ काम किया जाए, तो क्षेत्रीय विषयों पर लिखी गई पुस्तकें भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ सकती हैं। महामहिम राज्यपाल ने उनके इस दीर्घकालिक अनुभव और योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन्हें भविष्य में भी इसी तरह उत्तराखंड की सेवा में रचनात्मक कार्य करते रहने के लिए प्रोत्साहित किया।

उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को नई दिशा देती यह ऐतिहासिक कृति
यह उपलब्धि केवल एक व्यक्ति या एक पुस्तक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान को एक नई दिशा देने वाली घटना है। अक्सर देखा जाता है कि राज्यों के इतिहास और पौराणिक महत्व पर बहुत सी पुस्तकें लिखी जाती हैं, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर वह स्थान नहीं मिल पाता जिसकी वे हकदार होती हैं।

कण्वाश्रम भरत से भारतवर्ष ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर यह साबित कर दिया है कि यदि सामग्री प्रामाणिक हो और उसकी प्रस्तुति अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो, तो उसे हर मंच पर सराहा जाएगा। इस पुस्तक की सफलता से राज्य के अन्य शोधकर्ताओं, नए लेखकों और पत्रकारों को भी यह प्रेरणा मिलेगी कि वे अपनी समृद्ध परंपराओं और इतिहास को दुनिया के सामने सही ढंग से रखें।

महामहिम राज्यपाल के साथ हुई इस अत्यंत सौहार्दपूर्ण मुलाकात के अंत में लेखक ने महामहिम का हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल महोदय द्वारा दिया गया समय, उनका आत्मीय मार्गदर्शन और पौड़ी गढ़वाल की माटी के प्रति व्यक्त किए गए उद्गार उनके लिए अत्यंत गौरवशाली और स्मरणीय क्षण हैं। यह प्रोत्साहन उन्हें आगे भी उत्तराखंड की अनमोल संस्कृति और इतिहास पर और अधिक निष्ठा के साथ काम करने की ऊर्जा प्रदान करेगा।

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