नीम करोली बाबा के जीवन पर बन रही फिल्म ‘हनुमान अंश’ की शूटिंग के दौरान कई ऐसी अजीब और अद्भूत घटनाएँ सामने आई हैं, जिन्हें सेट पर मौजूद लोग किसी चमत्कार से कम नहीं मान रहे हैं। अध्यात्म, आस्था और सिनेमा का यह अनोखा संगम इन दिनों हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है। किसी भी महापुरुष या महान संत के जीवन पर जब कोई सिनेमाई कृति तैयार होती है, तो उससे जुड़ी भावनाएँ बेहद गहरी होती हैं। लेकिन जब किसी फिल्म के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान ही कुछ ऐसे वाकये घटने लगें जो सामान्य मानवीय समझ से परे हों, तो लोगों का ध्यान उस तरफ जाना स्वाभाविक है। इस फिल्म से जुड़े कलाकारों और तकनीकी विशेषज्ञों का दावा है कि कार्यस्थल पर कुछ ऐसे अनुभव हुए हैं, जो सीधे तौर पर दैवीय शक्ति और आस्था के अहसास की ओर इशारा करते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि निर्माण कार्य के दौरान आई तमाम बाधाएँ और अनहोनी परिस्थितियाँ एक विशेष प्रार्थना के बाद अपने आप सुलझती चली गईं। सेट पर अनुशासन और पवित्रता बनाए रखने के लिए जो नियम तय किए गए थे, उन्होंने पूरी टीम के भीतर एक अलग ही ऊर्जा का संचार किया। फिल्म के निर्माण से जुड़ी हर एक कड़ी अब आस्था की एक नई मिसाल बनती दिख रही है।
नीम करोली बाबा के प्रति अटूट आस्था और सेट पर देखा गया अनोखा वाकया
फिल्म की तैयारी के समय जब सेट पर मुख्य आकर्षण का केंद्र बनाई जा रही गुफा का काम चल रहा था, तब एक बेहद ही भावुक और विस्मयकारी दृश्य देखने को मिला। गुफा के भीतर जब संत की प्रतिमा की स्थापना का कार्य अंतिम चरणों में था, ठीक उसी क्षण वहाँ एक लंगूर का आगमन हुआ। वह लंगूर बिना किसी डर या हलचल के बिल्कुल शांत भाव से मूर्ति की स्थापना के दृश्य को देखता रहा। इतना ही नहीं, वह कुछ समय बाद स्वयं गुफा के भीतर भी गया और उसने पूरे स्थान का मुआयना किया।
कार्यस्थल पर मौजूद पूरी टीम के लिए यह पल किसी साधारण घटना जैसा नहीं था। वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने इसे संकटमोचन की उपस्थिति और एक शुभ संकेत के रूप में स्वीकार किया। इस वाकये के बाद से ही पूरी टीम के मनोबल में एक नया उत्साह देखने को मिला और हर कोई इस काम को केवल एक पेशेवर जिम्मेदारी न मानकर एक सेवा भाव से करने लगा।
शूटिंग के दौरान तकनीकी रुकावटें और प्रार्थना का प्रभाव
सिनेमा के निर्माण में तकनीकी उपकरणों की मुख्य भूमिका होती है, लेकिन इस फिल्म के काम के दौरान कई बार ऐसे मौके आए जब आधुनिक उपकरण अचानक काम करना बंद कर देते थे। कई मौकों पर चलते हुए रिकॉर्डिंग उपकरण अचानक ठप हो जाते थे या उनमें कोई न कोई गड़बड़ी आ जाती थी। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जब-जब ऐसी परिस्थितियाँ बनीं, तब-तब पूरी टीम ने काम रोककर एक साथ बैठकर पवित्र प्रार्थना का पाठ किया।
प्रार्थना समाप्त होते ही वे सभी तकनीकी गड़बड़ियाँ अपने आप दूर हो जाती थीं और उपकरण फिर से सुचारू रूप से काम करने लगते थे। यह सिलसिला किसी एक दिन का नहीं था, बल्कि कई बार ऐसा ही अनुभव देखने को मिला। इस प्रक्रिया ने वहाँ मौजूद हर एक व्यक्ति को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कुछ शक्तियाँ ऐसी भी हैं जो हमारी सोच और विज्ञान से परे काम करती हैं।
अचानक बदला मुख्य कलाकार और मिला नया रूप
फिल्म निर्माण के दौरान सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब मुख्य पात्र निभाने वाले अभिनेता की तबीयत अचानक बिगड़ गई। ऐन मौके पर अभिनेता के अस्वस्थ हो जाने से पूरे प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था किनीम करोली बाबा की जीवनी पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ के निर्माण के दौरान कई ऐसे वाकये सामने आए हैं जिन्होंने पूरी टीम को हैरान कर दिया है। कैंची धाम वाले नीम करोली बाबा के प्रति दुनिया भर के करोड़ों लोगों की अटूट श्रद्धा है। जब भी उनके जीवन या उनके चमत्कारों की चर्चा होती है, तो भक्त भावविभ्वल हो उठते हैं। हाल ही में इस दिव्य व्यक्तित्व पर बनने वाली सिनेमाई कृति के निर्माण के दौरान जो घटा, उसने सेट पर मौजूद हर शख्स को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव से भर दिया है। पर्दे के पीछे की इस कहानी में आस्था, विश्वास और कई ऐसी घटनाएं शामिल हैं जिन्हें लोग किसी चमत्कार से कम नहीं मान रहे हैं।
फिल्म की शूटिंग के दौरान कई ऐसे लम्हे आए जब पूरी यूनिट को किसी अनदेखी शक्ति की मौजूदगी महसूस हुई। सेट का माहौल किसी सामान्य शूटिंग स्थल जैसा न रहकर एक पवित्र आश्रम जैसा बन गया था। इस सिनेमाई सफर के दौरान किस तरह की घटनाएं घटीं, किस प्रकार की बाधाएं आईं और कैसे वे खुद-ब-खुद दूर होती चली गईं, यह जानना बेहद दिलचस्प है।
नीम करोली बाबा की गुफा और मूर्ति स्थापना के समय का वाकया
फिल्म के निर्माण के दौरान सबसे पहला और चौंकाने वाला अनुभव तब हुआ जब सेट पर नीम करोली बाबा की गुफा का ढांचा तैयार किया जा रहा था। जिस समय कलाकार और तकनीशियन पूरी तन्मयता से गुफा के भीतर मूर्ति की स्थापना कर रहे थे, ठीक उसी समय वहां एक लंगूर अचानक आ पहुंचा। आमतौर पर शूटिंग के भारी-भरकम तामझाम, रोशनी और लोगों की चहल-पहल से जंगली जानवर दूर ही रहते हैं, लेकिन यह लंगूर बेहद शांत भाव से आकर वहां बैठ गया।
वह काफी देर तक बिना किसी डर के मूर्ति स्थापना की पूरी प्रक्रिया को गौर से देखता रहा।
इतना ही नहीं, जब मूर्ति स्थापित हो गई तो वह उठकर गुफा के भीतर भी गया और कुछ देर वहां ठहरकर वापस चला गया। सेट पर मौजूद हर व्यक्ति इस दृश्य को देखकर दंग रह गया। फिल्म से जुड़े लोगों और स्थानीय निवासियों ने इसे महज एक इत्तेफाक मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे बजरंगबली की उपस्थिति और बाबा के आशीर्वाद का एक प्रत्यक्ष संकेत माना। इस घटना के बाद से ही पूरी टीम का मनोबल और आस्था कई गुना बढ़ गई।
शूटिंग में तकनीकी अड़चनें और सामूहिक प्रार्थना का असर
सिनेमा निर्माण की प्रक्रिया में तकनीकी कमियां आना आम बात है, लेकिन इस फिल्म के सेट पर जो हो रहा था वह काफी अलग था। कई बार सब कुछ ठीक होने के बावजूद कैमरे अचानक काम करना बंद कर देते थे। कभी रिकॉर्डिंग सिस्टम में अनपेक्षित खराबी आ जाती तो कभी लाइटें अपने आप बंद हो जाती थीं। जब ये परेशानियां बार-बार होने लगीं, तो टीम ने एक नया रास्ता निकाला।
जब भी ऐसी कोई तकनीकी समस्या सामने आती, पूरी यूनिट काम रोक देती थी। निर्देशक से लेकर स्पॉट बॉय तक, सभी लोग एक जगह इकट्ठा होते थे और पूरी श्रद्धा के साथ सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर देते थे। ताज्जुब की बात यह रही कि जैसे ही प्रार्थना संपन्न होती थी, बिना किसी बड़े तकनीकी फेरबदल के उपकरण दोबारा बिल्कुल सही तरीके से काम करने लगते थे। इस सिलसिले ने टीम के मन में यह बात पूरी तरह बैठा दी कि यह परियोजना केवल एक पेशेवर काम नहीं है, बल्कि इसके साथ एक गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव भी मौजूद है।
मुख्य कलाकार की बीमारी और सहायक निर्देशक को मिला मुख्य किरदार
किसी भी फिल्म की शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले अगर मुख्य अभिनेता बीमार पड़ जाए, तो निर्माता और निर्देशक के लिए यह बहुत बड़ी मुसीबत बन जाती है। इस फिल्म के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। नीम करोली बाबा का मुख्य किरदार निभाने के लिए जिस अभिनेता का चयन किया गया था, वह शूटिंग शुरू होने के ठीक पहले अचानक गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए। शेड्यूल तय था और सेट बनकर तैयार था, ऐसे में काम रोकना एक भारी आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता था।
इसी संकट के बीच एक ऐसा मोड़ आया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। फिल्म के सहायक निर्देशक शोभना सत्या, जो खुद मन ही मन बाबा नीम करोली के बहुत बड़े भक्त रहे हैं, उन्हें इस भूमिका के लिए चुना गया। बिना किसी पूर्व योजना के, परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि एक भक्त को ही अपने गुरु और पूज्य संत का किरदार पर्दे पर जीवंत करने का अवसर मिल गया। शोभना सत्या ने इसे बाबा का ही एक बुलावा और आशीर्वाद माना। जब उन्होंने बाबा के रूप में कैमरे के सामने कदम रखा, तो सेट पर मौजूद लोगों को लगा कि यह चुनाव पहले से ही तय था।
नीम करोली बाबा के सिद्धांतों पर आधारित सेट के सख्त नियम
फिल्म के निर्माताओं ने शुरुआत में ही यह तय कर लिया था कि जिस संत के जीवन पर यह कहानी आधारित है, उनकी पवित्रता का पूरा ध्यान सेट पर भी रखा जाएगा। इसके लिए शूटिंग स्थल पर बेहद सख्त और अनुशासित नियम लागू किए गए थे। सेट का वातावरण ऐसा बनाया गया था जिससे हर कोई एक सात्विक और पवित्र अनुभव कर सके।
सात्विक वातावरण: सेट पर शराब और किसी भी तरह के नशीले पदार्थों के सेवन पर पूरी तरह से पाबंदी थी।
खान-पान की पवित्रता: मांसाहारी भोजन को सेट के आसपास भी लाने की सख्त मनाई थी।
आचरण और व्यवहार: सेट पर किसी को भी गाली-गलौज करने, गुस्सा होने या आपस में लड़ाई-झगड़ा करने की अनुमति नहीं थी।
दैनिक प्रार्थना: प्रतिदिन काम की शुरुआत करने से पहले और शूटिंग खत्म होने के बाद पूरी टीम मिलकर हनुमान चालीसा का पाठ करती थी।
इन नियमों का असर यह हुआ कि काम के दौरान होने वाला तनाव गायब हो गया और पूरी यूनिट एक परिवार की तरह पूरी निष्ठा के साथ अपने काम में जुटी रही।
संत प्रेमानंद महाराज का मार्गदर्शन और सात्विक जीवन शैली
फिल्म के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने और इसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने से पहले, फिल्म के निर्माताओं ने पूज्य संत प्रेमानंद महाराज से मुलाकात की और उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। संत प्रेमानंद महाराज ने फिल्म से जुड़ी पूरी स्टारकास्ट और क्रू को अपने जीवन में सात्विकता अपनाने की सलाह दी।
उन्होंने विशेष रूप से पूरी टीम को शुद्ध शाकाहारी जीवनशैली अपनाने का परामर्श दिया। संत श्री के इस मार्गदर्शन को पूरी टीम ने सिर आंखों पर लिया और इसका कड़ाई से पालन किया। कलाकारों का मानना है कि इस सात्विक जीवन शैली को अपनाने के बाद उनके अभिनय में एक अलग तरह की गहराई और चेहरे पर एक अनोखा तेज देखने को मिला। संत प्रेमानंद महाराज के आशीर्वाद ने इस पूरी सिनेमाई यात्रा को और भी अधिक गरिमापूर्ण बना दिया।
आस्था या महज संयोग: एक अनसुलझा विचार
फिल्म की शूटिंग के दौरान घटी इन तमाम घटनाओं को विज्ञान या तर्क की कसौटी पर कसना मुश्किल है। कुछ लोग इसे महज एक इत्तेफाक या दिमागी सोच मान सकते हैं, लेकिन जो लोग उस समय सेट पर मौजूद थे, उनके लिए ये घटनाएं किसी चमत्कार से कम नहीं थीं। लंगूर का शांत भाव से आकर बैठना, कैमरों का अचानक बंद होकर प्रार्थना के बाद खुद-ब-खुद चालू हो जाना, और एक भक्त का अचानक मुख्य भूमिका में आ जाना – ये तमाम बातें किसी न किसी अदृश्य शक्ति के होने का अहसास कराती हैं।
आस्था और विश्वास इंसानी अनुभव के ऐसे पहलू हैं जिन्हें शब्दों में पूरी तरह बयां नहीं किया जा सकता। चाहे आप इसे महज संयोग कहें या नीम करोली बाबा का कोई दिव्य संदेश, लेकिन इतना तो तय है कि इन अनुभवों ने इस फिल्म से जुड़े हर इंसान के जीवन को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया है। इस फिल्म का निर्माण केवल एक व्यावसायिक प्रयास न रहकर एक गहरा आध्यात्मिक सफर बन गया है, जिसकी छाप अब पर्दे पर भी साफ नजर आएगी।


