पिथौरागढ़ में भारी बारिश और पहला हिमपात सीमांत जिले में मौसम के अचानक बदले मिजाज के कारण पैदा हुए विषम हालातों को दर्शा रहा है। उत्तराखंड के इस सीमावर्ती क्षेत्र में कुदरत का दोहरा असर देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां ऊंची पहाड़ियों पर सफेद चादर बिछने लगी है, वहीं दूसरी तरफ निचले और घाटी वाले इलाकों में मूसलाधार बरसात ने तबाही की स्थिति बना दी है। उच्च हिमालयी श्रृंखलाओं में इस सीजन की पहली बर्फबारी दर्ज की गई है, जिससे पूरे इलाके में ठंड का अहसास बढ़ने लगा है। दूसरी ओर, घाटियों में हो रही अनवरत बरसात के कारण नदियां उफान पर हैं और जगह-जगह भूस्खलन होने से जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है। इस प्राकृतिक आपदा और मौसमी बदलाव ने स्थानीय निवासियों की दैनिक दिनचर्या और आवाजाही पर बहुत बुरा असर डाला है।
पिथौरागढ़ में भारी बारिश और पहला हिमपात होने से सीमांत क्षेत्र के तापमान में एकदम से गिरावट आ गई है। सीमावर्ती जनपदों में अगस्त के मध्य के बाद मौसम का यह रूप अक्सर देखने को मिलता है, लेकिन इस बार बारिश की तीव्रता ने पहाड़ों पर रहने वाले लोगों की समस्याओं को कई गुना बढ़ा दिया है। नंदादेवी, नंदाकोट, हरदेवल, त्रिशूली और पंचाचूली जैसी मशहूर चोटियों पर बर्फ की हल्की परत साफ दिखाई देने लगी है। पहाड़ियों पर हुआ यह शुरुआती हिमपात बहुत महीन कणों वाला होता है, जो धूप खिलते ही तेजी से पिघल भी जाता है। फिर भी, इसकी वजह से आसपास के पूरे वातावरण में शीतलहर की शुरुआत हो चुकी है और लोग गर्म कपड़ों का सहारा लेने लगे हैं।
उच्च हिमालयी चोटियों पर बर्फबारी का दौर और मौसमी बदलाव
पिथौरागढ़ में भारी बारिश और पहला हिमपात की इस घटना ने पर्वतीय इलाकों के भूगोल और जीवनचक्र को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। पर्वतीय क्षेत्रों में मानसूनी सीजन के उत्तरार्ध में यानी पंद्रह अगस्त के बाद उच्च शिखरों पर हल्की बर्फबारी होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है। पंचाचूली की धवल पहाड़ियों पर गिरी यह नई बर्फ दिखने में भले ही खूबसूरत लगती हो, लेकिन यह अपने साथ तापमान में भारी गिरावट लेकर आती है।
मौसम के इस बदलाव का सीधा असर नीचे बसे गांवों और कस्बों पर भी पड़ता है। जैसे ही चोटियों पर हिमपात की शुरुआत होती है, निचले इलाकों में चलने वाली हवाएं ठंडी हो जाती हैं। इस बार भी वैसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। हालांकि, यह शुरुआती हिमपात बहुत देर तक नहीं टिकता, क्योंकि जैसे ही आसमान साफ होता है और सूरज की किरणें इन चोटियों पर पड़ती हैं, यह पाउडर जैसी बर्फ बहुत जल्दी गलकर बह जाती है। फिर भी, यह इस बात का स्पष्ट संकेत होता है कि आने वाले दिनों में ठंड का प्रकोप और ज्यादा गहराने वाला है।
मूसलाधार बारिश से नदियों का जलस्तर बढ़ा और उफान पर काली नदी
पिथौरागढ़ में भारी बारिश और पहला हिमपात के बीच जिले के मैदानी और घाटी वाले हिस्सों में मूसलाधार बरसात आफत बनकर टूटी है। शुक्रवार की पूरी रात मुनस्यारी, तेजम, कनालीछीना और जिला मुख्यालय के आसपास के क्षेत्रों में बिना रुके मूसलाधार वर्षा होती रही। शनिवार को भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं देखा गया और दिनभर रुक-रुक कर रिमझिम और तेज बौछारें पड़ती रहीं।
शाम के वक्त अचानक बारिश की रफ्तार और ज्यादा तेज हो गई, जिसकी वजह से बाजारों में सन्नाटा पसर गया और आम लोगों की आवाजाही थम सी गई। लगातार हो रही इस भारी बरसात का सबसे डरावना रूप धारचूला इलाके में बहने वाली काली नदी में देखने को मिल रहा है। नदी का जलस्तर बहुत तेजी से बढ़ता हुआ अपने चेतावनी स्तर अट्ठासी सौ नवासी मीटर को पार करके अट्ठासी सौ नवासी दशमलव पचास मीटर तक पहुंच चुका है।
नदी के इस रौद्र रूप और खतरे के निशान की तरफ बढ़ते पानी को देखकर किनारे बसे बस्तियों के लोग बेहद डरे हुए हैं। प्रशासन लगातार नदी के जलस्तर पर नजर बनाए हुए है, लेकिन पानी का बहाव इतना तेज है कि तटीय इलाकों में कटाव का खतरा लगातार मंडरा रहा है।
छह स्थानों पर मार्ग बाधित होने से प्रसिद्ध यात्रा मार्ग थमा
पिथौरागढ़ में भारी बारिश और पहला हिमपात के कारण बनी इस विकट स्थिति ने यातायात व्यवस्था की रीढ़ ही तोड़ दी है। सबसे ज्यादा असर धार्मिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर पड़ा है। इस मुख्य मार्ग पर जगह-जगह से विशालकाय पत्थर और मलबा गिरकर सड़क पर आ गया है, जिसकी वजह से छह अलग-अलग स्थानों पर वाहनों का चलना पूरी तरह से बंद हो गया है।
मुख्य यात्रा मार्ग के अलावा, जिले के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों को जोड़ने वाली कम से कम सोलह अन्य आंतरिक सड़कें भी भूस्खलन की वजह से पूरी तरह पट चुकी हैं। सड़कें बंद होने का सबसे सीधा और भयानक असर गांव देहात में रहने वाले आम नागरिकों पर पड़ रहा है। राहें बंद हो जाने के कारण न तो लोग अपने घरों से बाहर निकल पा रहे हैं और न ही गांवों तक राशन, दूध, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंच पा रहा है।
पहाड़ी रास्तों पर जगह-जगह गिरे मलबे को हटाने का काम बेहद जोखिम भरा साबित हो रहा है, क्योंकि ऊपर से लगातार ढहती चट्टानें राहत कार्यों में बड़ी रुकावट पैदा कर रही हैं।
सड़क वाशआउट होने से चौंदास घाटी के चौदह गांव अलग-थलग पड़े
पिथौरागढ़ में भारी बारिश और पहला हिमपात के इस दौर में सबसे बुरा हाल चौंदास घाटी का हुआ है। प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्र नारायण आश्रम को जोड़ने वाला कंच्योती मार्ग बलमी काकड़खेत के पास अचानक आई बाढ़ और मलबे की चपेट में आ गया। यहां लगभग सौ मीटर लंबी सड़क का पूरा का पूरा हिस्सा पानी के तेज बहाव में बह गया है।
सड़क का इतना बड़ा हिस्सा पूरी तरह गायब हो जाने से नारायण आश्रम सहित पूरी चौंदास घाटी के चौदह से ज्यादा गांवों का संपर्क बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट चुका है। इन दूरस्थ गांवों में रहने वाले सैकड़ों परिवार अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए धारचूला के मुख्य बाजार पर ही आश्रित रहते हैं। चाहे बैंक का काम हो, राशन खरीदना हो या फिर बीमार मरीज को अस्पताल पहुंचाना हो, सब कुछ इसी रास्ते के भरोसे चलता था।
अब रास्ता पूरी तरह कट जाने से ग्रामीणों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। जो गाड़ियां या वाहन धारचूला से सामान या सवारियां लेकर चौंदास घाटी की तरफ जा रहे थे, वे बीच रास्ते में ही फंस गए और उन्हें मजबूरन उल्टे पांव वापस लौटना पड़ रहा है।
स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक इसलिए हो गई है क्योंकि इस इलाके का दूसरा वैकल्पिक मार्ग, जो तवाघाट और थानीधार होकर नारायण आश्रम की तरफ जाता है, वह भी काफी समय से भूस्खलन के कारण बंद पड़ा हुआ है। दोनों ही रास्तों के एक साथ ठप हो जाने से घाटी के लोग पूरी तरह से अपने ही गांवों में कैद होकर रह गए हैं।
सीमांत क्षेत्र में अस्त-व्यस्त जनजीवन और राहत कार्य में चुनौतियां
पिथौरागढ़ में भारी बारिश और पहला हिमपात ने पूरे सीमांत तंत्र की कार्यप्रणाली को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ जहां काली नदी का उफान निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ लगातार गिरते मलबे ने लोक निर्माण विभाग और आपदा प्रबंधन टीम के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
बंद पड़ी दर्जनों सड़कों को दोबारा खोलना और कटी हुई बस्तियों तक तुरंत राहत सामग्री पहुंचाना इस वक्त स्थानीय प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है। हालांकि, रुक-रुक कर हो रही तेज बारिश और पहाड़ी ढलानों से लगातार गिरते पत्थरों की वजह से बुलडोजर और मशीनों को मौके पर काम में लगाना बहुत खतरनाक साबित हो रहा है।
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं, क्योंकि आपातकालीन स्थिति में मरीजों को डोली या कंदील के सहारे उफनते नाले और बंद रास्तों को पार कराकर अस्पताल पहुंचाना पड़ रहा है। स्थानीय लोग किसी तरह आपसी मदद से इस मुश्किल घड़ी का सामना कर रहे हैं, लेकिन अगर मौसम का मिजाज जल्द ही ठीक नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में खाद्य पदार्थों और जरूरी दवाओं का संकट और ज्यादा गहरा सकता है।
स्थानीय प्रशासन की ओर से नदी किनारे रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और बहुत जरूरी न होने पर यात्रा न करने की सख्त सलाह दी गई है।


