नशा मुक्त समाज के निर्माण के लिए लोक भवन से ऐतिहासिक आह्वान
उत्तराखंड के लोक भवन में आयोजित ‘एक प्रयास, नशा मुक्त हो समाज’ नामक इस गरिमामयी समारोह का मुख्य लक्ष्य हमारे युवा वर्ग और विद्यार्थियों को नशीले पदार्थों के जानलेवा दुष्प्रभावों के प्रति सचेत करना तथा एक सशक्त, नशा रहित समाज के निर्माण में शैक्षणिक संस्थानों के साथ-साथ पूरे समुदाय की सीधी और सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करना रहा।
‘देहरादून घोषणा-पत्र’ और इसके दस प्रमुख संकल्प
लोक भवन के इस मंच से प्रदेश को पूरी तरह से नशा मुक्त बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए “नशा मुक्त उत्तराखण्ड हेतु देहरादून घोषणा-पत्र” सार्वजनिक रूप से जारी किया गया। यह घोषणा-पत्र केवल एक दस्तावेज मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रदेश के हर नागरिक को इस अभियान से जोड़ने का एक मजबूत ढांचा प्रस्तुत करता है। इस घोषणा-पत्र में दस अत्यंत महत्वपूर्ण और ठोस संकल्पों को समाहित किया गया है, जो इस बात पर जोर देते हैं कि आम जनता की सीधी भागीदारी के बिना इतना बड़ा परिवर्तन संभव नहीं है। इन संकल्पों में मुख्य रूप से युवाओं को नशे के भयानक दलदल से दूर रखने में पारिवारिक नींव को मजबूत करने, नशे की गिरफ्त में फंस चुके पीड़ितों के उचित और आधुनिक उपचार तथा उनके सम्मानजनक पुनर्वास की व्यवस्था करने और पूरे समाज की जिम्मेदारी तय करने जैसे विषय शामिल हैं। इस घोषणा-पत्र का मूल ध्येय समाज के अंतिम व्यक्ति को इस मुहीम के साथ जोड़कर उत्तराखंड की पावन भूमि से नशा नाम के कलंक को सदा के लिए मिटाना है।
व्यसन मुक्त शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण पर विशेष परिचर्चा
कार्यक्रम की रूपरेखा को और अधिक अर्थपूर्ण बनाने के लिए दो विशेष विचार-विमर्श सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें विषय विशेषज्ञों ने गहराई से मंथन किया। पहला विचार-विमर्श सत्र ‘व्यसन मुक्त, सशक्त शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण’ विषय पर केंद्रित था। इस महत्वपूर्ण परिचर्चा का कुशल संचालन श्री अनूप नौटियाल द्वारा किया गया। इस सत्र में शिक्षा जगत की प्रमुख हस्तियों ने भाग लिया, जिनमें दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल, सीआईएमएस ग्रुप ऑफ कॉलेज एवं सजग इंडिया के अध्यक्ष श्री ललित जोशी, डीबीएस ग्लोबल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. संजय जसोला और स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय देहरादून के अध्यक्ष डॉ. विजय धस्माना प्रमुख रूप से शामिल रहे।
नशा विरोधी माहौल और मानसिक काउंसलिंग की आवश्यकता
शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने अपने अनुभवों का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए इस बात पर सर्वसम्मति जताई कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय केवल किताबी ज्ञान बांटने के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे चरित्र निर्माण की प्रयोगशालाएं भी हैं। इसलिए सभी शैक्षणिक परिसरों के भीतर एक सख्त नशा विरोधी वातावरण का निर्माण किया जाना अत्यंत आवश्यक है। वक्ताओं ने कहा कि विद्यार्थियों के मानसिक तनाव को दूर करने के लिए परिसरों में नियमित काउंसलिंग केंद्रों की स्थापना होनी चाहिए और जागरूकता अभियानों को केवल औपचारिकता न मानकर उन्हें अत्यंत प्रभावी और परिणामकारी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।
नशा मुक्ति में समुदाय, पुलिस और प्रशासन की संयुक्त भूमिका
इसके बाद दूसरा परिचर्चा सत्र ‘नशा मुक्त समाज-समुदाय आधारित’ विषय पर केंद्रित हुआ, जिसका संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री अनुपम त्रिवेदी ने अपने तीखे और प्रासंगिक प्रश्नों के साथ किया। इस सत्र में प्रशासनिक, खेल और कानून व्यवस्था के दिग्गजों ने अपने विचार रखे। पैनल में खेल विभाग के विशेष प्रमुख सचिव श्री अमित कुमार सिन्हा, मैक्स हॉस्पिटल की जानी-मानी वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. सलोनी, उत्तराखण्ड तकनीकी विश्वविद्यालय देहरादून की कुलपति डॉ. तृप्ता ठाकुर तथा पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) निलेश आनंद भरणे विशेषज्ञ के तौर पर शामिल हुए।
नशे के विरुद्ध संयुक्त सामाजिक नेटवर्क का गठन
इस परिचर्चा में उभरे विचारों का मुख्य निचोड़ यह रहा कि नशे की रोकथाम केवल पुलिसिया कार्रवाई या सरकारी कानूनों से संभव नहीं है। जब तक परिवार, स्थानीय समुदाय, स्कूल-कॉलेज, पुलिस प्रशासन और स्वयं युवा वर्ग एक मजबूत नेटवर्क की तरह मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकना असंभव है। मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण का यह संगम यह बताने के लिए काफी था कि नशा एक सामाजिक और मानसिक बीमारी है, जिसका इलाज सामूहिक सामाजिक प्रयास ही है।
राज्यपाल का संदेश: नशे के खिलाफ जन-आंदोलन की आवश्यकता
कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह और युवाओं को संबोधित करते हुए राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने अत्यंत ओजस्वी और संवेदनशील विचार व्यक्त किए। उन्होंने बेहद कड़े और स्पष्ट शब्दों में कहा कि नशा केवल एक व्यक्ति के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को ही नष्ट नहीं करता, बल्कि यह पूरे परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से तबाह कर देता है। इतना ही नहीं, जिस देश का युवा नशे की चपेट में आ जाता है, उस राष्ट्र की प्रगति और विकास की गति पूरी तरह थम जाती है। राज्यपाल ने इस बात पर विशेष बल दिया कि नशे के खिलाफ चलाए जा रहे इस युद्ध को केवल सरकारी कागजों, भाषणों या प्रशासनिक अभियानों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अगर हमें इस बुराई पर विजय प्राप्त करनी है, तो इसे एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप देना ही होगा।
युवा ऊर्जा को सकारात्मक दिशा और नशा मुक्ति की प्रतिबद्धता
राज्यपाल ने युवाओं की असीम शक्ति और प्रतिभा का जिक्र करते हुए कहा कि देश के नौजवानों के भीतर ऊर्जा का अकूत भंडार है और उनके पास राष्ट्र निर्माण की अद्भुत क्षमता है। सवाल सिर्फ इस बात का है कि हम उस ऊर्जा का उपयोग किस दिशा में करते हैं। युवाओं की इस असीम ऊर्जा को गलत राह पर जाने से रोकने के लिए हमें उन्हें सकारात्मक रास्ते प्रदान करने होंगे। इसके लिए खेलकूद की गतिविधियों, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, आधुनिक कौशल विकास, रचनात्मक कलाओं और रोजगार के नए अवसरों को धरातल पर तेजी से बढ़ावा देना होगा। उन्होंने उपस्थित विद्यार्थियों और युवाओं से सीधा संवाद करते हुए उनसे यह कड़ा वादा लिया कि वे न केवल स्वयं हर प्रकार के नशे से पूरी तरह दूर रहेंगे, बल्कि अपने आसपास के मित्रों, सहपाठियों और समाज के लोगों को भी इसके दुष्परिणामों के प्रति लगातार जागरूक करते रहेंगे।
नशा मुक्ति की चौतरफा रणनीति और सामूहिक सहयोग
नशा मुक्ति की समग्र रणनीति को रेखांकित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि हमें इस लड़ाई को चार मुख्य मोर्चों पर एक साथ लड़ना होगा—जागरूकता फैलाना, नशीले पदार्थों की आपूर्ति और उपयोग पर रोकथाम, प्रभावित व्यक्तियों का सही इलाज और उनका समाज में पुनस्र्थापन या पुनर्वास। इन चारों स्तंभों पर जब एक साथ काम होगा, तभी परिणाम दिखाई देंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों को अपने परिसर में ऐसा सुरक्षित वातावरण तैयार करना चाहिए जहां विद्यार्थी बिना किसी डर के अपनी समस्याएं साझा कर सकें। इसके लिए प्रभावी काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की एक मजबूत व्यवस्था होनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने पुलिस विभाग, मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक संगठनों और अन्य संबंधित प्रशासनिक तंत्रों से अपील की कि वे आपसी तालमेल बनाकर एक संयुक्त रणनीति के तहत काम करें।
मातृशक्ति और परिवार की निर्णायक भूमिका
संबोधन के एक अत्यंत भावुक मोड़ पर राज्यपाल ने परिवार और विशेष रूप से मां की शक्ति को नमन किया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को नशे के दलदल से बाहर निकालने में उसके परिवार का संबल और मां का निस्वार्थ प्रेम सबसे बड़ा हथियार होता है। ईश्वर ने मां को इस संसार का सबसे पहला, सबसे सुंदर और सबसे महान चिकित्सक बनाया है। जब किसी परिवार का कोई चिराग या बेटा नशे की गिरफ्त में आता है, तो उसकी शारीरिक पीड़ा से कहीं अधिक मानसिक और आत्मिक वेदना उसकी मां झेलती है। मां उस दर्द को पल-पल जीती है। इसलिए, नशा मुक्ति के इस महाअभियान में मातृशक्ति की भूमिका सबसे केंद्रीय और निर्णायक है। यदि मां को जागरूक और सशक्त बनाया जाए, तो कोई भी बच्चा गलत रास्ते पर कदम रखने से पहले सौ बार सोचेगा।
कार्यक्रम का शुभारंभ एवं जोनल निदेशक के विचार
कार्यक्रम का भव्य आगाज उच्च शिक्षा विभाग के अपर सचिव श्री मनुज गोयल के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने दूर-दराज से आए सभी अतिथियों, विशेषज्ञों, शिक्षकों और विद्यार्थियों का हृदय से अभिनंदन किया। अपने संबोधन में उन्होंने इस पूरे आयोजन के व्यापक उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और बताया कि क्यों आज के समय में नशे के खिलाफ एक अटूट जनभागीदारी की सख्त जरूरत है। इसके उपरांत, उत्तराखण्ड के जोनल निदेशक श्री देवानंद ने ‘नशा निवारण एवं युवा सतर्कता’ विषय पर अपने विचार विस्तार से रखे। उन्होंने आंकड़ों और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि युवा किस तरह अनजाने में इस जाल में फंसते हैं और सही समय पर बरती गई सतर्कता कैसे किसी का जीवन बचा सकती है।
नुक्कड़ नाटक के जरिए दिया गया संवेदनशील संदेश
युवाओं के दिलों को छूने और उन्हें सीधे तौर पर इस गंभीर मुद्दे से जोड़ने के लिए दून विश्वविद्यालय के थिएटर विभाग के कलाकारों द्वारा एक बेहद जीवंत और प्रभावशाली नुक्कड़ नाटक का मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने अभिनय, बुलंद आवाज़ और मार्मिक दृश्यों के माध्यम से यह दिखाया कि कैसे नशा हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ देता है और युवाओं के सपनों को चिता की राख में बदल देता है। नाटक के अंत में कलाकारों ने सभी को एक स्वस्थ, अनुशासित और नशे से मुक्त जीवनशैली अपनाने का कड़ा संदेश दिया, जिसने सभागार में मौजूद हर व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर दिया।
विद्यार्थियों के साथ जीवंत प्रश्नोत्तर सत्र
इसके पश्चात कार्यक्रम में एक बेहद जीवंत और उत्साहपूर्ण प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने सीधे विशेषज्ञों के सामने अपने मन की शंकाएं रखीं। छात्र-छात्राओं ने पूरी बेबाकी के साथ सवाल पूछे कि अगर कोई मित्र नशे की लत में पड़ जाए तो उसकी मदद कैसे करें, पढ़ाई और करियर के तनाव से कैसे निपटें, मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर कैसे रखें, पुनर्वास केंद्रों की कार्यशैली क्या होती है और नशा छोड़ने के बाद समाज में दोबारा सामान्य जीवन कैसे शुरू किया जाए। विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों के हर प्रश्न का बहुत ही सरल, व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्तर दिया, जिससे युवाओं का मार्गदर्शन हुआ।
पुस्तक विमोचन, संकल्प ग्रहण और गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति
इस ऐतिहासिक अवसर पर एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ी जब राज्यपाल ने डॉ. रोहित रस्तोगी द्वारा लिखित पुस्तक ‘नशा मुक्त नव-निर्माण’ का औपचारिक विमोचन किया। यह पुस्तक नशा मुक्ति के विभिन्न पहलुओं और युवाओं के सही मार्गदर्शन पर एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम के अंतिम चरण में राज्यपाल ने सभागार में उपस्थित सभी विद्यार्थियों, शिक्षकों, प्रशासनिक अधिकारियों और प्रतिभागियों को हाथ उठवाकर ‘नशा मुक्ति संकल्प’ दिलाया, जिसमें सभी ने जीवन भर नशे से दूर रहने और समाज को नशा मुक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य करने की शपथ ली।
समारोह में शासन और प्रशासन की कई नामचीन हस्तियां मौजूद रहीं। इस अवसर पर उच्च शिक्षा उन्नयन समिति के उपाध्यक्ष डॉ. देवेन्द्र भसीन, सचिव श्री शैलेश बगोली, राज्यपाल के सचिव श्री रविनाथ रामन, राज्यपाल के विधिक सलाहकार श्री कौशल किशोर शुक्ल सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, प्रशासनिक अधिकारी, प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षण संस्थाओं के प्रतिनिधि और भारी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


