किसी भी जनपद का सर्वांगीण विकास केवल कागजी आंकड़ों या औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसका असली प्रभाव धरातल पर दिखने वाले प्रशासनिक कदमों और नीतियों के सटीक क्रियान्वयन से तय होता है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और उसके आसपास के जनपदीय क्षेत्रों में बढ़ते शहरीकरण, पर्यटन के भारी दबाव और आम नागरिकों की दैनिक समस्याओं को देखते हुए प्रशासनिक सतर्कता बेहद अनिवार्य हो गई है। इसी दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की अध्यक्षता में कलेक्ट्रेट स्थित ऋषिपर्णा सभागार में जनपद स्तर पर संचालित मुख्य योजनाओं और कार्यक्रमों की उपलब्धियों की विस्तृत समीक्षा बैठक संपन्न हुई।
यह समीक्षा बैठक केवल औपचारिक लेखा-जोखा मात्र नहीं थी, बल्कि इसमें जनहित से जुड़े कुल 25 संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषयों पर गहराई से मंथन किया गया। बैठक में राजस्व प्राप्ति, कानून व्यवस्था के प्रवर्तन कार्यों, विकास योजनाओं की गति, पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं पर बिंदुवार चर्चा की गई। इस बैठक का मुख्य ध्येय जनपद के प्रशासनिक ढांचे को अधिक पारदर्शी, गतिशील और परिणामोन्मुखी बनाना था, ताकि सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक सुगमता से पहुँच सके।
पर्यटन, होमस्टे नीति और ईको टूरिज्म से स्थानीय आजीविका को बल
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था और पहचान का मुख्य आधार पर्यटन उद्योग है। जनपद स्तर पर पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए जिला प्रशासन पूरी तरह प्रतिबद्ध दिखाई दे रहा है। समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी ने ईको टूरिज्म, नई पर्यटन नीति और होमस्टे योजना से जुड़े कार्यों की विस्तार से पड़ताल की। वर्तमान समय में ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे योजना केवल पर्यटकों को ठहरने की सुविधा ही प्रदान नहीं करती, बल्कि यह स्थानीय युवाओं और महिलाओं के लिए स्वरोजगार का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरी है।
समीक्षा के दौरान अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि होमस्टे पंजीकरण की प्रक्रिया को और अधिक सरल और पारदर्शी बनाया जाए, जिससे दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग भी इस योजना से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। इसके साथ ही, ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता देने पर बल दिया गया। अधिकारियों से कहा गया कि वे ऐसे नए पर्यटन स्थलों को चिह्नित करें जो अब तक अनदेखे रहे हैं, ताकि प्रमुख पर्यटन केंद्रों पर पर्यटकों के अत्यधिक दबाव को कम किया जा सके और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना सतत विकास की अवधारणा को साकार किया जा सके।
कूड़ा निस्तारण, सीवेज ट्रीटमेंट और रीसाइक्लिंग की आधुनिक व्यवस्था
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ कचरा प्रबंधन जनपद की सबसे बड़ी और जटिल समस्याओं में से एक बन चुका है। इस चुनौती से निपटने के लिए बैठक में कूड़ा निस्तारण की वर्तमान स्थिति, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की कार्यप्रणाली, प्लास्टिक कचरे के निस्तारण और रीसाइक्लिंग प्लांटों की स्थापना पर गहन चर्चा हुई। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि केवल कचरा एकत्र करना ही काफी नहीं है, बल्कि कचरे को उसके उद्गम स्थल यानी स्रोत पर ही गीले और सूखे कचरे के रूप में अलग-अलग करने की व्यवस्था को शत-प्रतिशत लागू किया जाना चाहिए।
जब तक नागरिक अपने घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और संस्थानों में ही कचरा पृथक्कीकरण का पालन नहीं करेंगे, तब तक बड़े रीसाइक्लिंग प्लांटों की क्षमता का पूर्ण उपयोग संभव नहीं हो पाएगा। नगर निगम और स्थानीय निकायों को निर्देश दिए गए कि वे डोर-टू-डोर कूड़ा उठान व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाएं तथा रीसाइक्लिंग इकाइयों को आधुनिक तकनीकों से लैस करें ताकि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के मानकों का कड़ाई से अनुपालन हो सके।
नदियों का संरक्षण: रिस्पना नदी पर ‘ट्रैश स्क्रीन’ की पायलट परियोजना
जनपद में बहने वाली नदियां और बरसाती नाले लगातार प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरे के डंपिंग ग्राउंड बनते जा रहे हैं, जो न केवल जलीय पारिस्थितिकी को नष्ट कर रहे हैं बल्कि मानसून के दौरान भीषण जलभराव का कारण भी बनते हैं। इस गंभीर समस्या को रेखांकित करते हुए जिलाधिकारी ने नालों और पुलियाओं के माध्यम से नदियों में बहकर जाने वाले कचरे को रोकने के लिए एक अभिनव तकनीकी समाधान पर विचार किया। बैठक में निर्णय लिया गया कि नालों के मुहाने पर ‘ट्रैश स्क्रीन’ यानी कचरा रोकने वाली जालियां स्थापित करने की संभावनाओं पर काम किया जाए। इस व्यवस्था को प्रायोगिक तौर पर सबसे पहले ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व रखने वाली रिस्पना नदी पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू करने की दिशा में सहमति बनी। यदि यह प्रयोग रिस्पना नदी पर सफल रहता है, तो इसे जनपद की अन्य नदियों और प्रमुख नालों पर भी चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
इसके साथ ही यह भी माना गया कि केवल प्रशासनिक या तकनीकी प्रयासों से नदियों को स्वच्छ नहीं रखा जा सकता। इसके लिए जनता की भागीदारी और व्यवहार में परिवर्तन लाना बेहद आवश्यक है। इसलिए, प्रशासन द्वारा जल्द ही व्यापक जन-जागरूकता अभियान शुरू किया जाएगा, जिसके तहत नागरिकों से नदियों में कचरा न फेंकने की अपील की जाएगी और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ चालानी कार्रवाई भी अमल में लाई जाएगी।
यातायात प्रबंधन और नए पार्किंग स्थलों का चयन
शहर में दिन-प्रतिदिन बढ़ती वाहनों की संख्या और संकीर्ण सड़कों के कारण यातायात जाम एक स्थाई समस्या बनता जा रहा है। विशेष रूप से पर्यटन सीजन के दौरान सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें आम जनता और पर्यटकों दोनों के लिए भारी असुविधा का कारण बनती हैं। इस जटिल समस्या के स्थायी समाधान के लिए जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि वे जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में पार्किंग के लिए उपयुक्त भूमि और स्थलों को प्राथमिकता के आधार पर चिह्नित करें।
यातायात की दीर्घकालिक योजना तैयार करने के लिए मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण के मास्टर प्लान का गहराई से अध्ययन और संदर्भ लेने के निर्देश दिए गए हैं। एमडीडीए के मास्टर प्लान के अनुरूप नए मल्टी-लेवल पार्किंग स्थलों, ऑफ-स्ट्रीट पार्किंग और अस्थायी पार्किंग जोनों का खाका तैयार किया जाएगा। अधिकारियों से कहा गया कि वे ऐसे स्थलों का चयन करें जहाँ से मुख्य बाज़ारों और पर्यटन स्थलों तक पहुँच आसान हो, जिससे सड़कों पर अवैध रूप से खड़े होने वाले वाहनों पर अंकुश लगाया जा सके और सुगम यातायात व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।
नशामुक्ति अभियान, कैच द रेन और सामाजिक कल्याण योजनाएं
जनपद को सामाजिक और पर्यावरण के मोर्चे पर समृद्ध बनाने के लिए बैठक में कई अन्य प्रमुख अभियानों की समीक्षा भी की गई। युवा पीढ़ी को नशे की गर्त से बाहर निकालने के लिए चलाए जा रहे नशामुक्ति अभियान की प्रगति पर संतोष व्यक्त करते हुए इसे और अधिक आक्रामक बनाने के निर्देश दिए गए। नशीली दवाओं की अवैध बिक्री पर शिकंजा कसने के साथ-साथ पुनर्वास केंद्रों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने पर बल दिया गया।
इसके अलावा, जल संरक्षण के राष्ट्रीय मिशन ‘कैच द रेन’ और SARRA योजना की समीक्षा के दौरान वर्षा जल संचयन संरचनाओं के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया। सरकारी भवनों, स्कूलों और सार्वजनिक परिसरों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करने की प्रगति की जांच की गई। वहीं, सड़कों पर लावारिस घूम रहे निराश्रित पशुओं के प्रबंधन के लिए ‘कैटल पाउंड’ यानी गोवंश संरक्षण केंद्रों की क्षमता बढ़ाने और उनके उचित रख-रखाव के निर्देश दिए गए, जिससे सड़कों पर हादसों की संभावना को कम किया जा सके और मवेशियों को भी सुरक्षित आश्रय मिल सके।
अंतर-विभागीय समन्वय और नियमित निगरानी का मंत्र
किसी भी योजना की सफलता उसके विभागों के बीच आपसी तालमेल पर निर्भर करती है। अक्सर देखा जाता है कि विभागों में समन्वय की कमी के कारण महत्वपूर्ण परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पातीं। इस बात को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी ने बैठक में मौजूद सभी विभागाध्यक्षों को सख्त हिदायत दी कि वे योजनाओं के क्रियान्वयन में विभागों के बीच मजबूत अंतर-विभागीय समन्वय बनाए रखें। किसी भी परियोजना में आने वाली प्रशासनिक या तकनीकी बाधाओं को आपसी संवाद से तुरंत दूर किया जाए।
जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि सभी विभागीय अधिकारी अपने-अपने विभागों की प्रगति की नियमित रूप से निगरानी करेंगे और मासिक समीक्षा रिपोर्ट सौंपेंगे। लापरवाही बरतने या निर्धारित समयावधि में लक्ष्य पूरा न करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। इस महत्वपूर्ण बैठक में मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज कुमार शर्मा, नगर आयुक्त ऋषिकेश विजय नाथ शुक्ला सहित जनपद के सभी प्रमुख विभागों के विभागाध्यक्ष उपस्थित रहे और उन्होंने अपनी-अपनी विभागीय कार्ययोजनाओं को पटल पर रखा।


