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दून विश्वविद्यालय में दो दिवसीय सम्मेलन में मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन ने एआई-आधारित आपदा प्रबंधन और जोखिम आकलन मॉडल अपनाने पर दिया जोर

दून विश्वविद्यालय में “बदलती जलवायु में हिमालयः आपदाएं, सतत विकास एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन भारत के पर्यावरण और तकनीकी परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। इस संगोष्ठी का शुभारंभ उत्तराखंड के मुख्य सचिव श्री आनन्द बर्द्धन द्वारा किया गया, जिसमें देश-विदेश के जाने-माने वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और शिक्षाविदों ने भाग लिया। आज पूरा हिमालयी क्षेत्र अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रहा है। समय से पहले ग्लेशियरों का पिघलना, बादलों का फटना, अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन और जमीन धंसने जैसी घटनाएं अब केवल प्राकृतिक आपदाएं नहीं रहीं, बल्कि ये स्थानीय जीवन और अर्थव्यवस्था के लिए अस्तित्व का संकट बन चुकी हैं। इस गंभीर स्थिति में मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया कि यदि हमें हिमालय को बचाना है और यहाँ रहने वाले करोड़ों लोगों के जीवन को सुरक्षित करना है, तो हमें आधुनिक तकनीक, विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेना ही होगा। तकनीक जब स्थानीय समुदायों की समझ और पारंपरिक ज्ञान के साथ मिलती है, तब सतत विकास के वास्तविक और स्थायी मॉडल का निर्माण होता है।
हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता और बढ़ता जलवायु संकट
हिमालय को केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की जल सुरक्षा, मौसम प्रणाली और पारिस्थितिकी का मुख्य स्तंभ है। इसे पृथ्वी का ‘तीसरा ध्रुव’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद बर्फ का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है। हालांकि, वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालयी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। यहाँ तापमान में वृद्धि की दर वैश्विक औसत से अधिक दर्ज की जा रही है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम चक्र पूरी तरह से अनियमित हो चुका है। भारी बारिश की संक्षिप्त और तीव्र घटनाएं (क्लाउडबर्स्ट), ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़, और पहाड़ों में जमीन धंसने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। केदारनाथ की आपदा से लेकर जोशीमठ के संकट और उत्तरकाशी में हालिया भूस्खलन तक, इन सभी घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि पुरानी प्रशासनिक और पारंपरिक आपदा प्रबंधन प्रणालियां अब इस नए जलवायु संकट से निपटने के लिए अपर्याप्त साबित हो रही हैं।

जब पहाड़ खिसकते हैं या नदियां उफान पर होती हैं, तो इसका प्रभाव केवल ढांचागत नुकसान तक सीमित नहीं रहता। यह स्थानीय खेती, पशुपालन, पर्यटन और संपूर्ण आजीविका को नष्ट कर देता है। इसलिए, हिमालय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए आपदाओं के सटीक पूर्वानुमान और जोखिम न्यूनीकरण के लिए एक नई और वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता है।

आपदा प्रबंधन और जोखिम न्यूनीकरण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्रांतिकारी भूमिका
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल सूचना प्रौद्योगिकी या उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। मुख्य सचिव श्री आनन्द बर्द्धन ने अपने संबोधन में इसी बात पर जोर दिया कि एआई के माध्यम से आपदाओं के उत्पन्न होने से पहले उनके जोखिमों का आकलन किया जा सकता है और उनके संभावित प्रभावों का समय रहते पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

एआई और मशीन लर्निंग तकनीकें उपग्रह से प्राप्त चित्रों, मौसम वैज्ञानिक आंकड़ों, नदियों के जलस्तर और भू-वैज्ञानिक संवेदकों (सेंसर्स) से मिलने वाले विशाल डेटा का कुछ ही सेकंड में विश्लेषण कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, एआई आधारित एल्गोरिदम यह पहचान सकते हैं कि बारिश की कितनी तीव्रता पर किस विशेष पहाड़ी क्षेत्र में भूस्खलन की सबसे अधिक संभावना है। इसी तरह, उपग्रह चित्रों के माध्यम से ग्लेशियर झीलों में हो रहे बदलावों पर लगातार नजर रखी जा सकती है और उनके फटने से काफी पहले निचले इलाकों में चेतावनी जारी की जा सकती है।

तकनीक की यह अर्ली वार्निंग सिस्टम बहुमूल्य मानव जीवन और पशुधन को बचाने में अत्यंत प्रभावी साबित हो सकती है। इसके अलावा, आपदा आने के बाद राहत और बचाव कार्यों के दौरान भी एआई का उपयोग मलबे में दबे लोगों की तलाश, सुरक्षित रास्तों की मैपिंग और बुनियादी सुविधाओं की तेजी से बहाली के लिए किया जा सकता है।

‘स्मॉल एआई’: कम संसाधनों में बड़े और सुलभ समाधान
संगोष्ठी में दक्षिण कैरोलिना विश्वविद्यालय के प्राध्यापक तथा आईएआईआरओ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं संस्थापक निदेशक प्रो. अमित शेठ ने एआई तकनीक के एक नए और अत्यंत व्यावहारिक आयाम – ‘स्मॉल एआई’ पर विस्तार से प्रकाश डाला। यह अवधारणा भारत और विशेष रूप से हिमालय जैसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों के लिए बेहद प्रासंगिक है।

आमतौर पर बड़े आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल को चलाने के लिए विशाल सुपरकंप्यूटर, अत्यधिक बिजली और विशाल डिजिटल बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है। यह सब दूरस्थ और ग्रामीण हिमालयी क्षेत्रों में हमेशा उपलब्ध नहीं हो सकता। इसके विपरीत, ‘स्मॉल एआई’ छोटे, कुशल और कम संसाधनों में चलने वाले ऐसे तकनीकी मॉडल होते हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर स्मार्टफोन्स, छोटे सेंसर्स या कम क्षमता वाले कंप्यूटिंग उपकरणों पर आसानी से संचालित किया जा सकता है।

प्रो. शेठ ने रेखांकित किया कि भारत की विकास संबंधी आवश्यकताएं पश्चिमी देशों से भिन्न हैं। हिमालय में एक के बाद एक आने वाली आपदाओं, जैसे बारिश के बाद भूस्खलन, और उससे नदी का मार्ग रुकने के बाद आने वाली बाढ़ की जटिलता को समझने के लिए स्मॉल एआई का उपयोग बहुत किफायती और प्रभावी साबित हो सकता है। यह तकनीक कम लागत में स्थानीय स्तर पर तुरंत डेटा प्रोसेस करके आपदा प्रबंधन दल को निर्णय लेने में मदद कर सकती है।

नीति निर्माण, नियोजन और निर्णय प्रक्रिया में तकनीक का एकीकरण
आपदा केवल एक अचानक घटने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह बिना सोचे-समझे किए गए विकास कार्यों का परिणाम भी हो सकती है। इसलिए, विकास की योजनाओं के निर्माण चरण में ही एआई का उपयोग किया जाना अनिवार्य है। मुख्य सचिव ने कहा कि तकनीक आधारित समाधान स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए।

जब हम पहाड़ों में सड़कों, सुरंगों, बांधों या बस्तियों का निर्माण करते हैं, तो अक्सर वहाँ के भू-वैज्ञानिक ढांचे को अनदेखा कर दिया जाता है। यदि हम एआई आधारित सिमुलेशन और मैपिंग का उपयोग करें, तो निर्माण शुरू होने से पहले ही यह स्पष्ट हो सकता है कि किसी विशेष पहाड़ी संरचना पर उस निर्माण का क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।

यह तकनीक प्रशासनिक निर्णय लेने वाले अधिकारियों, योजनाकारों और इंजीनियरों को डेटा-आधारित फैसले लेने में सक्षम बनाती है। इससे अनियोजित निर्माण पर रोक लगेगी और पारिस्थितिकी के अनुकूल विकास को बढ़ावा मिलेगा। निर्णय प्रक्रिया में जब डेटा और वैज्ञानिक शोध का समावेश होता है, तो नीतियां केवल कागजों तक सीमित न रहकर धरातल पर अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ बनती हैं।

स्थानीय समुदायों की भागीदारी: तकनीक और पारंपरिक ज्ञान का संगम
एआई और आधुनिक तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाएं, वे स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी के बिना अधूरी हैं। मुख्य सचिव श्री आनन्द बर्द्धन ने इस बात पर विशेष बल दिया कि सतत विकास की सभी योजनाओं में स्थानीय समुदायों को भागीदार बनाना अत्यंत आवश्यक है।

हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय निवासियों के पास पीढ़ियों से संचित पारंपरिक ज्ञान होता है। वे पहाड़ों की ढलान, मौसम के सूक्ष्म बदलावों, स्थानीय वनस्पतियों और पानी के स्रोतों के व्यवहार को अच्छी तरह समझते हैं। जब एआई के वैज्ञानिक डेटा को स्थानीय लोगों के अनुभव और ज्ञान के साथ जोड़ा जाता है, तो एक बहुत ही मजबूत आपदा-रोधी प्रणाली तैयार होती है।

उदाहरण के लिए, यदि एआई आधारित पूर्व चेतावनी किसी मोबाइल ऐप या स्थानीय संचार माध्यम से गांव के प्रधान या स्थानीय आपदा मित्रों तक तुरंत पहुंच जाए, तो पूरे गांव को कुछ ही मिनटों में सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण संरक्षण, वनों की सुरक्षा और जल स्रोतों के पुनरुद्धार जैसे कार्यों में जब तक स्थानीय समुदाय की स्वामित्व भावना नहीं होगी, तब तक कोई भी तकनीकी समाधान लंबे समय तक सफल नहीं हो सकता।

देश में अनुसंधान और शोध वातावरण का सुदृढ़ीकरण
संगोष्ठी के दौरान अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के संयुक्त सचिव डॉ. निशांत वर्मा ने दून विश्वविद्यालय में विकसित हो रहे शोध और वैज्ञानिक अध्ययन के अनुकूल वातावरण की सराहना की। उन्होंने बताया कि भारत सरकार देश भर में अनुसंधान गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और शैक्षणिक संस्थानों को उद्योग व नीति निर्माताओं से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।

हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए अकादमिक शोध का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। जब विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान और सरकारी विभाग मिलकर काम करते हैं, तो शोध केवल सैद्धांतिक नहीं रहता, बल्कि वह समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है।

दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और अनुसंधान संबंधी उपलब्धियों को साझा करते हुए बताया कि संस्थान के शोधकर्ता और शिक्षक हिमालयी पर्यावरण, भूविज्ञान और जलवायु परिवर्तन पर निरंतर शोध कर रहे हैं। इस प्रकार की राष्ट्रीय संगोष्ठियों से विश्वविद्यालय के युवा शोधकर्ताओं और छात्रों को देश-विदेश के अग्रणी विशेषज्ञों से सीखने और नए विचार साझा करने का एक बेहतरीन मंच प्राप्त होता है।

संस्थागत सहयोग और अंतर-विषय दृष्टिकोण की आवश्यकता
हिमालयी क्षेत्र की चुनौतियां इतनी जटिल हैं कि कोई भी एक विषय या एक संस्थान अकेले इनका समाधान नहीं खोज सकता। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की, दून विश्वविद्यालय सहित देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों के भूवैज्ञानिकों, एआई विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं का एक साथ आना एक सकारात्मक कदम है।

संगोष्ठी के संयोजक एवं भूविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. विपिन कुमार और अन्य विशेषज्ञों के समन्वय से आयोजित इस परिचर्चा का मुख्य उद्देश्य भूविज्ञान (जियोलॉजी), कंप्यूटर विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान और समाजशास्त्र को एक मंच पर लाना है। जब विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ एक साथ विचार-विमर्श करते हैं, तो एकीकृत और दूरदर्शी समाधान निकलकर सामने आते हैं।

आईआईटी रुड़की जैसे तकनीकी संस्थानों की इंजीनियरिंग क्षमता, दिल्ली विश्वविद्यालय और दून विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों का मौलिक शोध, तथा राज्य सरकार का प्रशासनिक अनुभव—ये तीनों मिलकर हिमालय के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार कर सकते हैं।

सतत विकास और सुरक्षित हिमालय का संकल्प
दून विश्वविद्यालय में आयोजित यह राष्ट्रीय संगोष्ठी केवल भाषणों और चर्चाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की कार्ययोजना तय करने की एक ठोस शुरुआत है। हिमालयी क्षेत्र में विकास की गति को रोका नहीं जा सकता और न ही रोका जाना चाहिए, क्योंकि वहां रहने वाले नागरिकों को भी बेहतर बुनियादी सुविधाएं, रोजगार और बेहतर जीवन स्तर प्राप्त करने का पूरा अधिकार है। लेकिन यह विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ‘स्मॉल एआई’ जैसी उभरती तकनीकें हमें यह अवसर प्रदान करती हैं कि हम पर्यावरण और विकास के बीच एक संतुलन स्थापित कर सकें। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है:

एआई आधारित पूर्व चेतावनी प्रणालियों का विस्तार: उत्तराखंड और संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में संवेदनशील स्थानों पर सेंसर्स और एआई-संचालित मॉनिटरिंग नेटवर्क का विस्तार किया जाना चाहिए।

स्थानीय भाषा में सूचना प्रसार: तकनीक द्वारा उत्पन्न चेतावनियों और सुझावों को स्थानीय और सरल भाषा में आम लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

शोध के लिए बजटीय सहायता: हिमालयी आपदाओं और एआई के अनुप्रयोग पर केंद्रित शोध परियोजनाओं के लिए एएनआरएफ और राज्य सरकारों द्वारा पर्याप्त धन और संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर और सतत पर्यटन: पहाड़ों में निर्माण कार्य केवल एआई-आधारित जोखिम मूल्यांकन के बाद ही स्वीकृत किए जाने चाहिए और पर्यटन की वहन क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

हिमालय केवल भारत का मुकुट ही नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन और संस्कृति का आधार है। बदलती जलवायु के इस कठिन दौर में यदि हम तकनीक, वैज्ञानिक शोध और सामुदायिक सहभागिता को एक साथ मिलाकर सही दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो हम न केवल आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम कर सकते हैं, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, समृद्ध और सतत हिमालय का निर्माण भी कर सकते हैं।

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