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देश की राहों को सुरक्षित बनाने का संकल्प: खजान दास और डॉ. आशीष चौहान ने राह-वीरों के प्रोत्साहन पर दिया जोर

देश में सड़क परिवहन का जाल लगातार फैल रहा है, जो आर्थिक विकास की धुरी है, लेकिन इसके साथ ही सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या समाज के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। हर साल लाखों परिवार सड़क हादसों की वजह से अपूरणीय क्षति का सामना करते हैं। इस दर्दनाक स्थिति से निपटने और घायलों को समय पर जीवन रक्षक उपचार उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हाल ही में देहरादून के सर्वे चौक स्थित अनुसंधान विकास एवं प्रशिक्षण संस्थान (आईआरडीटी) ऑडिटोरियम में आयोजित विशेष संगोष्ठी में इन योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री खजान दास और जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने दीप प्रज्वलित कर संगोष्ठी का शुभारंभ किया और इस बात पर विशेष जोर दिया कि सड़क हादसों में होने वाली मौतों को रोकने के लिए प्रशासनिक तत्परता के साथ-साथ आम नागरिकों की संवेदनशीलता और सहभागिता भी उतनी ही जरूरी है।

सड़क दुर्घटनाओं का विदारक सच और समय की मांग
जब हम सड़क सुरक्षा के आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो स्थिति बेहद डरावनी प्रतीत होती है। देश में हर साल होने वाले लाखों हादसों में अनगिनत लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं और उससे भी अधिक संख्या में लोग गंभीर रूप से घायल होकर आजीवन विकलांगता का शिकार हो जाते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, हर घंटे औसतन इक्कीस लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है। सबसे दुखद पहलू यह है कि मरने वालों में अधिकांश युवा वर्ग के लोग होते हैं, जो अपने परिवार का भविष्य और देश की रीढ़ होते हैं। एक युवा की अचानक मृत्यु से पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से बिखर जाता है। इन डरावने आंकड़ों के पीछे मुख्य कारण तेज रफ्तार, यातायात नियमों की अनदेखी और सबसे बढ़कर दुर्घटना के बाद समय पर चिकित्सीय सहायता का न मिल पाना है। चिकित्सा विज्ञान में जिसे स्वर्णिम घंटा कहा जाता है, वह दुर्घटना के तुरंत बाद का समय होता है। यदि इस अवधि के भीतर घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचा दिया जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर कई ऐसी योजनाएं शुरू की हैं, जो घायलों के लिए वरदान साबित हो रही हैं।

प्रधानमंत्री राहत योजना और कैशलेस उपचार की सुविधा
सड़क दुर्घटनाओं के बाद सबसे बड़ी बाधा अस्पताल का खर्च और उपचार की जटिल प्रक्रियाएं होती हैं। कई बार गरीब परिवार पैसों के अभाव में अपने मरीज का समय पर इलाज नहीं करा पाते हैं, जिससे उसकी स्थिति गंभीर हो जाती है। इस समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री राहत योजना के तहत एक अभूतपूर्व प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत सड़क दुर्घटना में घायल होने वाले किसी भी व्यक्ति को निर्धारित प्रावधानों के तहत एक लाख पचास हजार रुपए तक का निःशुल्क और कैशलेस उपचार उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें घायल व्यक्ति की आर्थिक स्थिति आड़े नहीं आती है। उसे किसी भी सूचीबद्ध अस्पताल में तुरंत भर्ती करके इलाज शुरू कर दिया जाता है, जिससे कीमती समय की बचत होती है। इस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के तकनीक मंच और पुलिस विभाग के ई-डीएआर पोर्टल को आपस में जोड़ा गया है। इससे अस्पतालों और प्रशासन के बीच समन्वय बेहतर होता है और घायलों को तुरंत राहत मिलती है। यह पहल उन परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है जो अचानक आई आपदा के कारण आर्थिक संकट में घिर जाते हैं।

नेक राहगीर योजना: इंसानियत को सलाम और प्रोत्साहन
अक्सर यह देखा गया है कि लोग सड़क पर पड़े घायल व्यक्ति की मदद करने से कतराते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण कानूनी पचड़े में फंसने का डर, पुलिस की पूछताछ और अदालती कार्रवाइयों का भय होता है। समाज में फैली इस विसंगति को दूर करने और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार ने नेक राहगीर योजना की शुरुआत की है। इस योजना के तहत उन सभी साहसी नागरिकों को सम्मानित और पुरस्कृत किया जाता है जो सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को जीवन के सबसे महत्वपूर्ण यानी स्वर्णिम घंटे के दौरान अस्पताल पहुंचाकर उसकी जान बचाते हैं। इस नेक काम के लिए राह-वीर को पच्चीस हजार रुपए तक की नकद पुरस्कार राशि दिए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, पूरे वर्षभर में सबसे उत्कृष्ट कार्य करने वाले चयनित राह-वीरों को राष्ट्रीय स्तर पर एक लाख रुपए की पुरस्कार राशि, आकर्षक ट्रॉफी और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाता है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य नागरिकों के मन से कानूनी डर को पूरी तरह समाप्त करना और उन्हें यह अहसास कराना है कि किसी की जान बचाना सबसे बड़ा पुण्य का काम है। जब आम जनता बिना किसी भय के घायलों की मदद के लिए आगे आएगी, तो निश्चित रूप से सड़क हादसों में होने वाली मौतों के आंकड़ों में भारी कमी दर्ज की जाएगी।

प्रशासनिक समन्वय और विभिन्न विभागों की संयुक्त जिम्मेदारी
सड़क सुरक्षा और आपातकालीन राहत कार्यों को केवल एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता है। इसके लिए परिवहन विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पुलिस प्रशासन, शिक्षा विभाग और सड़क निर्माण से जुड़े निकायों को एक मंच पर आकर काम करना होगा। देहरादून में आयोजित संगोष्ठी में भी इसी समन्वय पर बल दिया गया। अधिकारियों ने इस बात पर चर्चा की कि किस तरह आपातकालीन नंबर ग्यारह सौ बारह और अन्य डिजिटल पोर्टलों का उपयोग करके सहायता को अधिक से अधिक तेज बनाया जा सकता है। पुलिस और परिवहन अधिकारियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रक्रियाओं को इतना सरल बनाएं कि आम आदमी को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। इसके साथ ही, सरकारी और निजी अस्पतालों को भी यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि वे सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को प्राथमिकता के आधार पर उपचार दें और किसी भी हीलाहवाली से बचें। प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता और तत्परता ही इन योजनाओं को जमीनी स्तर पर सफल बना सकती है।

सामाजिक उत्तरदायित्व और जनजागरूकता की अनिवार्यता
कोई भी योजना तब तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकती जब तक उसमें जनसहभागिता न जुड़े। सड़क सुरक्षा केवल नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक संस्कृति का हिस्सा है। स्कूल, कॉलेज, और सार्वजनिक स्थलों पर सड़क सुरक्षा और प्राथमिक उपचार के बारे में कार्यशालाएं आयोजित किया जाना बेहद आवश्यक है ताकि युवा पीढ़ी शुरुआत से ही इसके प्रति जागरूक हो सके। समाज के हर वर्ग को यह समझना होगा कि सड़क पर चलता हर मुसाफिर किसी का बेटा, भाई, पिता या माता है। यदि हमारे सामने किसी के साथ अनहोनी हो जाती है, तो मूकदर्शक बने रहने के बजाय हमें उसकी मदद के लिए आगे आना चाहिए।

प्रधानमंत्री राहत और नेक राहगीर जैसी योजनाएं हमें एक ऐसा माध्यम प्रदान करती हैं जिसके जरिए हम न केवल किसी की जान बचा सकते हैं, बल्कि समाज में मानवीय मूल्यों को भी मजबूत कर सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन योजनाओं का संदेश देश के अंतिम कोने तक और समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचे, ताकि कोई भी घायल व्यक्ति समय पर उपचार के अभाव में दम न तोड़े।

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