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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बोले – राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का मार्गदर्शन उत्तराखण्ड के विकास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ

किसी भी राज्य की प्रगति और उसकी प्रशासनिक सुदृढ़ता में संवैधानिक प्रमुख यानी राज्यपाल और राज्य की चुनी हुई सरकार के बीच का तालमेल एक धुरी की तरह काम करता है। जब यह समन्वय आत्मीयता, दूरदर्शिता और जनहित के साझा संकल्प में बदल जाता है, तो वह कार्यकाल केवल एक औपचारिकता न रहकर राज्य के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन जाता है। हाल ही में उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून स्थित मुख्यमंत्री आवास में एक ऐसा ही विदाई समारोह आयोजित किया गया। यह आयोजन राज्य के राज्यपाल के विदाई समारोह के रूप में था, जिन्होंने अपनी सेवा के दौरान देवभूमि की आबोहवा, यहाँ के संस्कारों और यहाँ के लोगों के दिलों में एक गहरी छाप छोड़ी है। इस विदाई ने न केवल एक प्रशासनिक कार्यकाल के समापन को रेखांकित किया, बल्कि यह उस वैचारिक और भावनात्मक जुड़ाव का भी गवाह बना जो एक राष्ट्रसेवक और एक पूरे राज्य की जनता के बीच पनपता है।

देवभूमि की आबोहवा में रमे राज्यपाल का सफर
उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी और सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील राज्य में राज्यपाल की भूमिका केवल कागजी या सांविधानिक दायित्वों तक सीमित नहीं रहती है। यहाँ की भौगोलिक चुनौतियाँ, सीमावर्ती क्षेत्र, संस्कृति और विशिष्ट जनजीवन एक ऐसे नेतृत्व की मांग करते हैं जो जमीनी हकीकत से जुड़ा हो। राज्यपाल के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने जब कार्यभार संभाला था, तब उनके पास सेना का लंबा और अनुशासित अनुभव था। एक सैन्य पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति का किसी राज्य का संवैधानिक प्रमुख बनना अपने आप में एक अलग संदेश देता है। उन्होंने अपने इस प्रशासनिक सफर के दौरान यह साबित कर दिया कि कठोर अनुशासन और जनहित के प्रति कोमल संवेदना का अनूठा मेल कैसे शासन व्यवस्था को सुगम बना सकता है। उनके कार्यकाल का यह पूरा दौर इस बात का प्रमाण है कि यदि नियत साफ हो और दिशा स्पष्ट हो, तो संवैधानिक पद की गरिमा के साथ-साथ आम जनता के बीच सीधा संवाद भी कायम किया जा सकता है।

शिक्षा, शोध और युवा शक्ति को नई दिशा
किसी भी राज्य का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के कंधों पर टिका होता है और युवा पीढ़ी का भविष्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर निर्भर करता है। राज्यपाल के पूरे कार्यकाल के दौरान शिक्षा, उच्च शिक्षा और कौशल विकास उनके सबसे पसंदीदा विषय रहे। उन्होंने विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के दौरों के दौरान हमेशा इस बात पर जोर दिया कि पढ़ाई केवल उपाधि हासिल करने का साधन नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह युवाओं को रोजगार के योग्य बनाने और उनके भीतर नवाचार की भावना जगाने वाली होनी चाहिए। उन्होंने पारंपरिक शिक्षा प्रणालियों में सुधार के साथ-साथ आधुनिक तकनीकी युग की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए शोध कार्यों को बढ़ावा देने की वकालत की। राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में उन्होंने अकादमिक माहौल को बेहतर बनाने के लिए जो दिशा-निर्देश दिए, उनसे उच्च शिक्षण संस्थानों में एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और सुधार की लहर देखने को मिली। युवाओं को उद्यमिता की तरफ मोड़ने और उन्हें जीवन में उत्कृष्टता के नए आयाम छूने के लिए प्रेरित करने का उनका अंदाज हमेशा से प्रेरणादायी रहा है।

महिला सशक्तीकरण और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच
उत्तराखण्ड के सामाजिक ताने-बाने में महिलाओं की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी है। पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका से लेकर परिवार चलाने तक का पूरा दारोमदार महिलाओं के हाथों में होता है। राज्यपाल ने अपने दौरों के दौरान इस सच्चाई को बहुत नजदीक से महसूस किया। उन्होंने महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने, उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और स्व-सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के हर प्रयास की सराहना की और उन्हें बढ़ावा दिया। उनके कार्यक्रमों और पहलों में हमेशा इस बात पर विशेष ध्यान रहता था कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुँचे। महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के मुद्दों पर उन्होंने लगातार प्रशासनिक तंत्र का ध्यान आकर्षित किया। इसके परिणाम स्वरूप आज राज्य की माताएं और बहनें विभिन्न क्षेत्रों में आगे आ रही हैं और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं।

सैन्य परंपरा और वीर सैनिकों के प्रति अटूट सम्मान
उत्तराखण्ड को वीरों की भूमि कहा जाता है। यहाँ के हर घर से कोई न कोई युवा देश की सीमाओं की रक्षा के लिए सेना में अपनी सेवा देता है। एक पूर्व सैन्य अधिकारी होने के नाते राज्यपाल का सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के साथ एक स्वाभाविक और गहरा लगाव था। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान इस सैन्य परंपरा को और अधिक गौरवान्वित करने का कार्य किया। वीर सैनिकों के त्याग, बलिदान और राष्ट्र के प्रति उनके अदम्य साहस को उन्होंने हमेशा सर्वोच्च सम्मान दिया। पूर्व सैनिकों की समस्याओं के समाधान, उनके कल्याण से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन और उनके परिवारों के संबल के लिए वे हमेशा तत्पर रहे। युवाओं के दिलों में देशभक्ति की अलख जगाने और उनमें अनुशासन की भावना भरने के लिए उन्होंने शिक्षण संस्थानों में विशेष संवाद कार्यक्रम आयोजित किए। यह उनका फौजी अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का जज्बा ही था जिसने उत्तराखण्ड के हर वर्ग को गहराई से प्रभावित किया।

शासन और प्रशासन के बीच समन्वय का अनूठा संतुलन
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद और राज्यपाल के बीच का मधुर संबंध राज्य की स्थिरता की गारंटी होता है। वर्तमान मुख्यमंत्री के साथ राज्यपाल का तालमेल इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण रहा है कि कैसे दो अलग-अलग संवैधानिक पद मिलकर राज्य के विकास के लिए एक टीम की तरह काम कर सकते हैं। मुख्यमंत्री ने विदाई समारोह के दौरान इस बात को खुले तौर पर स्वीकार किया कि राज्यपाल के दूरदर्शी मार्गदर्शन और सकारात्मक दृष्टिकोण ने प्रदेश के विकास से जुड़े तमाम मुद्दों को एक नई रफ्तार दी। चाहे प्रशासनिक नीतियां हों या फिर जनकल्याणकारी योजनाएं, हर स्तर पर एक सकारात्मक संवाद और सामंजस्य देखने को मिला। राज्यपाल का सौम्य स्वभाव, सरल व्यवहार और किसी से भी मिलने में सहजता का गुण ऐसा था कि आम लोग भी अपनी बात उनके सामने बिना किसी झिझक के रख सकते थे। उनके इस आत्मीय स्वभाव ने राजभवन और जनता के बीच की दूरी को पूरी तरह समाप्त कर दिया था।

देवभूमि की संस्कृति और आतिथ्य का जीवंत अनुभव
विदाई समारोह के दौरान राज्यपाल ने खुद भी इस बात को रेखांकित किया कि देवभूमि उत्तराखण्ड में कार्य करना उनके जीवन का सबसे बड़ा गौरव और सौभाग्य का विषय रहा है। उन्होंने यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और प्राकृतिक वैभव का जिक्र करते हुए कहा कि यहाँ के लोगों का सीधा-साधा स्वभाव और आतिथ्य सत्कार उनके दिल में हमेशा के लिए बस गया है। उत्तराखण्ड की घाटियाँ, पहाड़, नदियाँ और इन सबकी रक्षा करने वाले यहाँ के लोग केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसी ऊर्जा का केंद्र है जो हर आने वाले को अपना बना लेती है। राज्यपाल ने अपने पाँच साल के इस लंबे सफर में राज्य के दूर-दराज के गाँवों का दौरा किया और वहाँ की जीवनशैली को बहुत करीब से जाना। उनका यह अनुभव इस बात को साबित करता है कि किसी पद पर रहते हुए यदि आप जनता के बीच जाते हैं, तो आपको वहाँ की असल समस्याओं के साथ-साथ वहाँ की असल ताकत का भी अहसास होता है।

सामूहिक सहभागिता और भविष्य की मजबूत नींव
किसी भी राज्य का विकास अकेले सरकार या अकेले प्रशासन के बूते नहीं हो सकता। इसके लिए समाज के हर वर्ग, सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और आम जनता का सहयोग अनिवार्य होता है। राज्यपाल के कार्यकाल की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि उन्होंने सभी को साथ लेकर चलने की संस्कृति को बढ़ावा दिया। सामूहिक सहभागिता के जरिए विकास के पहिये को गति देना उनकी कार्यशैली का अहम हिस्सा था। आज जब उनका कार्यकाल पूरा हो चुका है, तो उत्तराखण्ड एक ऐसी मजबूत नींव पर खड़ा है जहाँ से आगे की यात्रा और अधिक सुगम हो सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार, युवाओं का बढ़ता आत्मविश्वास, पूर्व सैनिकों का सम्मान और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी आने वाले समय में राज्य की प्रगति के मुख्य आधार बनेंगे।

एक यादगार विदाई और आत्मीयता के पल
विदाई का क्षण हमेशा भारी होता है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हो। मुख्यमंत्री आवास और लोक भवन में आयोजित विदाई कार्यक्रमों में उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण थी कि राज्यपाल ने अपने कार्यकाल के दौरान लोगों के दिलों में कितनी गहरी जगह बनाई थी। जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य नागरिकों ने उनसे भेंट कर उनके स्वस्थ और सुखी भविष्य की कामना की। यह विदाई केवल एक पद से मुक्ति का उत्सव नहीं था, बल्कि यह उस आत्मीय रिश्ते का सम्मान था जो पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुआ था। राज्यपाल ने भी सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए यह विश्वास दिलाया कि उत्तराखण्ड के साथ उनका यह रिश्ता जीवनभर बना रहेगा और वे देश के किसी भी कोने में रहें, देवभूमि की यादें उनके साथ हमेशा रहेंगी।

यह पूरा आयोजन इस बात की प्रेरणा देता है कि जब पद पर बैठा व्यक्ति अपने दायित्वों को केवल नौकरी न मानकर जनसेवा का माध्यम बनाता है, तो उसकी विदाई के वक्त आँखें नम होती हैं और दिल सम्मान से भर जाता है। उत्तराखण्ड की यह विदाई सभा आने वाले समय में भी प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में एक मिसाल के रूप में याद रखी जाएगी, जहाँ विकास, संवेदना और अनुशासन का ऐसा संगम देखने को मिला जिसने सचमुच देवभूमि का मान बढ़ाया।

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