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आवारा पशु प्रबंधन के लिए डीएम डॉ. आशीष चौहान का मास्टरप्लान: अब डिजिटल पोर्टल पर दर्ज होगा हर जानवर का डेटा

आवारा पशु प्रबंधन को लेकर शासन और प्रशासन अब पूरी तरह से सख्त रुख अपना चुका है। आवारा पशु प्रबंधन केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि सड़कों पर चलने वाले आम नागरिकों की सुरक्षा और बेजुबान जानवरों के कल्याण से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील विषय है। देहरादून जिले में सड़कों पर घूमते लावारिस मवेशियों और सड़कों पर रहने वाले कुत्तों की बढ़ती संख्या से पैदा हो रही समस्याओं पर नकेल कसने के लिए जिला प्रशासन ने बड़े पैमाने पर कदम उठाने का फैसला किया है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के पालन में जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने एक उच्चस्तरीय बैठक कर सभी संबंधित विभागों और नगर निकायों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। इस नई रणनीति का मुख्य मकसद सड़कों को आम जनता के लिए सुरक्षित बनाना और पशुओं के लिए बेहतर स्वास्थ्य और आश्रय की व्यवस्था करना है। सड़कों पर बेसहारा घूमते जानवरों की सही गिनती से लेकर उनके टीकाकरण, नसबंदी और आश्रय स्थल तक के लिए एक पूरी योजना तैयार की गई है, जिससे आने वाले समय में शहर की तस्वीर बदलने की उम्मीद है।

प्रशासनिक सख्ती और सर्वेक्षण की नई रणनीति
शहरों और कस्बों में बढ़ती बेसहारा जानवरों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहला कदम सटीक आंकड़े जुटाना है। जिलाधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब तक हमारे पास सड़कों पर मौजूद जानवरों की सही संख्या नहीं होगी, तब तक कोई भी योजना पूरी तरह से सफल नहीं हो सकती। इसी को ध्यान में रखते हुए सभी नगर निकायों को अपने-अपने क्षेत्रों में सड़कों पर रहने वाले कुत्तों और आवारा मवेशियों का व्यापक सर्वेक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं।

इस सर्वेक्षण के दौरान जुटाए गए पूरे आंकड़ों को एक विशेष डिजिटल मंच पर डाला जाएगा। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर डेटा उपलब्ध होने से प्रशासन को यह समझने में आसानी होगी कि किस इलाके में कितने जानवरों को देखभाल, नसबंदी या टीकाकरण की जरूरत है। प्रमाणित आंकड़ों के आधार पर बनाई गई योजनाएं न केवल अधिक सटीक होंगी, बल्कि इससे संसाधनों का सही इस्तेमाल भी संभव हो सकेगा।

इस पूरी व्यवस्था को लागू करने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी क्षेत्र में अव्यवस्था न फैले। जब हर इलाके का डेटा प्रशासन के पास होगा, तो उसी हिसाब से वहां नसबंदी और टीकाकरण की टीमें भेजी जा सकती हैं। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर निगरानी रखना भी काफी आसान हो जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया से यह भी पता चल सकेगा कि किन इलाकों में जानवरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और वहां अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता है या नहीं। पारदर्शी और तकनीक आधारित यह व्यवस्था आने वाले दिनों में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

पालतू जानवरों का पंजीकरण और नियमों की अनदेखी पर रोक
अक्सर यह देखा गया है कि लोग उत्साह में आकर घर में कुत्ता या अन्य जानवर पाल तो लेते हैं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी पूरी तरह से नहीं निभाते। कई बार जब पालतू जानवर बीमार या बूढ़े हो जाते हैं, या फिर मालिक उनका ध्यान नहीं रख पाते, तो वे उन्हें सड़कों पर बेसहारा छोड़ देते हैं। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने पालतू कुत्तों का अनिवार्य पंजीकरण कराने पर विशेष जोर दिया है। अब शहर के हर उस नागरिक को अपने पालतू जानवर का आधिकारिक लाइसेंस या पंजीकरण कराना होगा, जो अपने घर में कुत्ता रखते हैं।

यदि कोई व्यक्ति अपने पालतू जानवर को पंजीकृत नहीं कराता है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। इस नियम का मकसद लोगों में जिम्मेदारी की भावना पैदा करना है। जब किसी जानवर का पूरा रिकॉर्ड प्रशासन के पास होगा, तो मालिक उसे आसानी से सड़क पर लावारिस नहीं छोड़ सकेंगे।

अगर कोई ऐसा करता पाया जाता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा। इसके अलावा, सड़कों पर अपने मवेशियों को खुला छोड़ने वाले पशुपालकों पर भी गाज गिरना तय है। जो लोग दिनभर अपने गाय-बैलों को सड़कों पर चरने के लिए छोड़ देते हैं, जिससे यातायात बाधित होता है और हादसे होते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। ऐसे जानवरों को सीधे सरकारी आश्रय स्थलों में पहुंचा दिया जाएगा और उनके मालिकों से भारी जुर्माना वसूला जाएगा।

नसबंदी और टीकाकरण अभियानों में तेजी
सड़कों पर रहने वाले कुत्तों की आबादी को मानवीय और वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित करने के लिए नसबंदी और रेबीज रोधी टीकाकरण सबसे प्रभावी माध्यम माने जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप, जिले में एनीमल बर्थ कंट्रोल यानी नसबंदी कार्यक्रम और रेबीज रोधी टीकाकरण अभियान को और अधिक तेजी से चलाने के निर्देश दिए गए हैं। इस अभियान की सफलता के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जा रहा है।

क्षेत्रीय जरूरतों को देखते हुए डोईवाला, विकासनगर और ऋषिकेश जैसे प्रमुख इलाकों में कुत्तों की नसबंदी और शल्य चिकित्सा के लिए नई जमीन चिन्हित करने की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करने को कहा गया है। इन स्थानों पर आधुनिक सुविधाओं से लैस केंद्र बनाए जाएंगे, जहां जानवरों की नसबंदी के बाद उनकी उचित देखभाल की जा सके। इसके अलावा, सड़कों पर रहने वाले जानवरों को भोजन देने के लिए भी विशेष स्थान तय किए जा रहे हैं। इससे सड़कों और रास्तों पर भोजन फेंकने से होने वाली गंदगी से मुक्ति मिलेगी और जानवरों को भी निश्चित जगह पर खाना मिल सकेगा।

नगर निगम क्षेत्र में इस दिशा में पहले ही बड़े पैमाने पर काम किया जा चुका है। अब तक पचास हजार से भी ज्यादा सड़कों पर रहने वाले कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। जानवरों को नसबंदी के बाद रखने के लिए दर्जनों नए बाड़े बनाए जा रहे हैं। जब ये सभी नए बाड़े बनकर तैयार हो जाएंगे, तो शहर में एक साथ सैकड़ों जानवरों को सुरक्षित रखने की क्षमता विकसित हो जाएगी। इससे अभियानों की रफ्तार कई गुना बढ़ जाएगी और रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी के खतरे को भी समाज से पूरी तरह समाप्त किया जा सकेगा।

कांजीहाउस और आपातकालीन प्रतिक्रिया दल की भूमिका
सड़कों को लावारिस गोवंश से मुक्त कराने और उनकी उचित देखभाल के लिए सरकारी आश्रय स्थलों यानी कांजीहाउस की भूमिका सबसे अहम होती है। वर्तमान में शहर के अलग-अलग हिस्सों में बने कांजीहाउसों में सैकड़ों बेसहारा मवेशियों को सुरक्षित रखा गया है, जहां उनके चारे, पानी और इलाज की पूरी व्यवस्था की जा रही है।

कांजीहाउस में संरक्षण: केदारपुरम स्थित सरकारी आश्रय केंद्र और सेलाकुई के शंकरपुर स्थित आश्रय केंद्र में वर्तमान में लगभग आठ सौ से अधिक बेसहारा गाय-बैलों को रखा गया है। वहां उनकी नियमित देखभाल की जा रही है ताकि वे सड़कों पर दुर्घटनाओं का शिकार न हों।
त्वरित प्रतिक्रिया दल: सड़कों पर घूम रहे या किसी हादसे में घायल हुए जानवरों को तुरंत राहत पहुंचाने के लिए विशेष त्वरित प्रतिक्रिया टीमों का गठन किया गया है। इन टीमों के पास जानवरों को सुरक्षित ले जाने के लिए विशेष वाहन भी मौजूद हैं।
शिकायत पर तुरंत कार्रवाई: जैसे ही कहीं से सड़कों पर आवारा पशुओं के जमावड़े या ट्रैफिक बाधित होने की सूचना मिलती है, यह दल तुरंत मौके पर पहुंचकर जानवर को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाता है।
बंदरों को सुरक्षित स्थानों पर भेजना: केवल मवेशी या कुत्ते ही नहीं, बल्कि रिहाइशी इलाकों में आतंक मचाने वाले बंदरों को भी पकड़कर सुरक्षित रूप से जंगलों में छोड़ने की प्रक्रिया जारी है। हाल के महीनों में सौ से अधिक बंदरों को पकड़कर उनके प्राकृतिक आवास यानी जंगलों में भेजा जा चुका है।

प्रशासनिक समन्वय और भविष्य की राह
इस विशाल अभियान को धरातल पर उतारने के लिए केवल आदेश देना काफी नहीं है, बल्कि सभी विभागों के बीच आपसी तालमेल होना बेहद जरूरी है। जिलाधिकारी द्वारा आयोजित बैठक में प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों, उप-जिलाधिकारियों, पशु चिकित्सा अधिकारियों और सभी नगर पालिकाओं के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों ने भाग लिया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी विभाग अपनी जिम्मेदारी से पीछे न हटे।

सभी अधिकारियों को स्पष्ट रूप से निर्देशित किया गया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में दैनिक आधार पर इन कार्यों की समीक्षा करें। यदि किसी इलाके में संसाधन की कमी है, तो उसे तुरंत पूरा किया जाए। सड़कों को सुरक्षित बनाना और साथ ही बेजुबान जानवरों के प्रति मानवीय रवैया अपनाना इस पूरे अभियान का मूल आधार है। जब प्रशासनिक मशीनरी, पशु कल्याण संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर प्रयास करेंगे, तभी इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

स्थानीय निवासियों से भी अपील की गई है कि वे इस सरकारी प्रयास में अपना सहयोग दें। यदि कोई व्यक्ति अपने पालतू जानवर को सड़कों पर छोड़ता है तो उसकी सूचना तुरंत अधिकारियों को दें, और अपने आसपास मौजूद पालतू जानवरों का पंजीकरण समय पर करवाएं। एक जागरूक समाज और मुस्तैद प्रशासन मिलकर ही शहरों को आवारा पशुओं की समस्या से मुक्त बना सकते हैं।

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