उत्तराखंड जल संसाधन विकास के प्रति राज्य सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता और दूरगामी सोच को देश के मंच पर मजबूती से रखा गया है। नई दिल्ली के सुषमा स्वराज भवन में आयोजित जल शक्ति मंत्रालय के विभागीय शिखर सम्मेलन में प्रदेश के सिंचाई, लोक निर्माण, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने भाग लिया। इस उच्च स्तरीय बैठक में उन्होंने केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों के सामने उत्तराखंड में चल रही प्रमुख जल परियोजनाओं, सिंचाई नेटवर्क के विस्तार, पेयजल संकट के स्थायी समाधान और जल संरक्षण की दिशा में किए जा रहे अभूतपूर्व प्रयासों की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट साझा की।
देश को वर्ष दो हजार सैंतालीस तक एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने के प्रधानमंत्री के संकल्प को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड सरकार लगातार कदम बढ़ा रही है। पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले प्रत्येक नागरिक को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना, कृषि योग्य भूमि तक पानी पहुँचाना, गिरते भूजल स्तर को सुधारना और जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। सतपाल महाराज ने सम्मेलन के दौरान स्पष्ट किया कि जल संसाधनों का सही प्रबंधन न केवल कृषि और पीने के पानी की समस्या को हल करता है, बल्कि यह राज्य में पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा प्रदान करता है।
उत्तराखंड में सिंचाई क्षमता का मौजूदा ढांचा और कृषि विकास
उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से विविध राज्य में खेती और किसानी पूरी तरह से पानी की सुलभ उपलब्धता पर निर्भर करती है। राज्य के सिंचाई विभाग ने पिछले कुछ वर्षों में अपने बुनियादी ढांचे को काफी मजबूत किया है। शिखर सम्मेलन में आंकड़े प्रस्तुत करते हुए सिंचाई मंत्री ने बताया कि राज्य में वर्तमान में तीन हजार से अधिक लिफ्ट नहरें और लगभग पौने दो हजार नलकूप पूरी तरह से क्रियाशील हैं।
इन सिंचाई ढांचों के माध्यम से राज्य के चार लाख हेक्टेयर से भी अधिक कृषि योग्य क्षेत्र को पानी मिल रहा है, जिससे कुल पांच लाख हेक्टेयर से अधिक सिंचन क्षमता का सृजन हुआ है। पर्वतीय इलाकों में विषम परिस्थितियों के बावजूद लिफ्ट नहरों के जरिए पानी को ऊंचाई वाले खेतों तक पहुँचाया जा रहा है, जिससे पारंपरिक फसलों के साथ-साथ बागवानी को भी बढ़ावा मिला है। मैदानी जिलों में नलकूपों की मदद से किसानों को समय पर सिंचाई का पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य इस क्षमता को आने वाले समय में और अधिक विस्तार देना है ताकि कोई भी खेत पानी के अभाव में बंजर न रहे।
देहरादून की भावी आबादी के लिए सौंग बांध परियोजना का निर्माण
राज्य की राजधानी देहरादून और इसके आसपास के इलाकों में तेजी से बढ़ती आबादी को देखते हुए भविष्य की पेयजल जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है। वर्ष दो हजार एकवन तक देहरादून शहर और इसके आसपास के क्षेत्रों की जनसंख्या लगभग ग्यारह लाख तक पहुँचने का अनुमान है। इस विशाल आबादी को निर्बाध और स्वच्छ पानी प्रदान करने के लिए राज्य सरकार गुरुत्वाकर्षण प्रणाली पर आधारित सौंग बांध परियोजना पर तेज़ी से काम कर रही है।
यह विशाल बांध गंगा नदी की सहायक सौंग नदी पर देहरादून शहर से करीब बारह किलोमीटर की दूरी पर बनाया जा रहा है। इसकी कुल ऊंचाई एक सौ तैंतीस मीटर होगी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के निर्माण से लगभग पौने चार किलोमीटर लंबी एक विशाल और सुंदर झील का निर्माण होगा। गुरुत्वाकर्षण प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसमें पानी को आपूर्ति केंद्रों तक भेजने के लिए किसी भी तरह की भारी बिजली या पंपिंग की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे पर्यावरण और राजस्व दोनों की बचत होती है।
सौंग बांध से प्रतिदिन एक सौ पचास मिलियन लीटर सुनिश्चित पेयजल आपूर्ति की जाएगी। इस परियोजना का निर्माण कार्य नवंबर दो हजार उनतीस तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह बांध न केवल पेयजल संकट को हमेशा के लिए समाप्त करेगा, बल्कि इसके बनने से निर्मित होने वाली झील भविष्य में एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण केंद्र के रूप में भी उभरेगी।
जमरानी और गैरसैण बांध: कुमाऊं और गढ़वाल के लिए वरदान
उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के सबसे बड़े व्यावसायिक शहर हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्रों के लिए जमरानी बांध परियोजना जीवनदायिनी साबित होने जा रही है। हल्द्वानी और इसके नजदीकी इलाकों की वर्ष दो हजार एकवन तक की अनुमानित आबादी लगभग पौने ग्यारह लाख होने वाली है। इस पूरी आबादी को प्रतिदिन एक सौ सत्रह मिलियन लीटर पीने का पानी उपलब्ध कराने की तैयारी की जा चुकी है।
रामगंगा नदी की सहायक गोला नदी पर हल्द्वानी शहर से लगभग दस किलोमीटर ऊपर की ओर जमरानी बांध का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। यह एक सौ पचास मीटर से अधिक ऊंचा एक विशाल कंक्रीट बांध है, जिसकी जल भंडारण क्षमता अत्यंत व्यापक है। इस बांध का सबसे बड़ा फायदा केवल उत्तराखंड को ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश को भी मिलेगा। नैनीताल और उधम सिंह नगर जिलों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के बरेली और रामपुर जिलों के सत्तावन हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य क्षेत्र को इस बांध से सिंचाई का पानी मिलेगा। इस परियोजना को जून दो हजार उनतीस तक पूरा करने की समय सीमा तय की गई है।
इसी तरह राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी भरारीसैण और गैरसैण के आसपास के ग्रामीण अंचलों में पीने के पानी की समस्या को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए रामगंगा नदी पर गैरसैण बांध का निर्माण प्रस्तावित किया गया है। पर्वतीय अंचलों में पानी की किल्लत दूर करने के लिए अन्य नदियों और नालों पर भी छोटे-बड़े बांध और बैराज बनाने की योजनाएं तैयार की जा रही हैं।
जल संवर्धन और वर्षा जल संरक्षण का राज्यव्यापी अभियान
उत्तराखंड के प्राकृतिक जल स्रोतों, जिन्हें स्थानीय भाषा में नौले और धारे कहा जाता है, को संरक्षित करना और भूजल स्तर को बढ़ाना राज्य सरकार का एक मुख्य एजेंडा है। केंद्र सरकार के जल संचयन कार्यक्रम के अंतर्गत राज्यभर में एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत पारंपरिक जल संरचनाओं के जीर्णोद्धार के साथ-साथ नई आधुनिक तकनीकों का समावेश भी किया जा रहा है।
राज्य में चाल-खाल, छोटे चेक डैम, और छतों पर वर्षा जल संचयन जैसी कुल पांच हजार के करीब संरचनाओं को चिन्हित किया गया था। इनमें से लगभग चार हजार संरचनाओं का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है, जबकि बची हुई एक हजार से अधिक संरचनाओं पर काम अंतिम चरण में है। चाल-खाल और चेक डैम के निर्माण से पर्वतीय ढलानों पर बह जाने वाला बारिश का पानी रुकता है, जिससे न केवल मिट्टी का कटाव रुकता है बल्कि आसपास के सूखे जल स्रोत भी पुनर्जीवित हो जाते हैं।
भविष्य का विजन: जल सुरक्षा से समृद्धि की ओर
शिखर सम्मेलन के दौरान सतपाल महाराज ने इस बात पर विशेष बल दिया कि उत्तराखंड जल संसाधन विकास केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के सामाजिक और आर्थिक बदलाव का एक सशक्त माध्यम है। स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होने से ग्रामीण इलाकों में जीवन स्तर में सुधार हो रहा है और जल जनित बीमारियों में कमी आ रही है।
सिंचाई की बेहतर सुविधाओं से किसानों की आय में वृद्धि हो रही है, जिससे पलायन जैसी गंभीर समस्या पर भी अंकुश लगाने में मदद मिल रही है। इसके अतिरिक्त, बांधों के निर्माण से बनने वाली झीलें साहसिक पर्यटन, नौकायन और इको-टूरिज्म को बढ़ावा देंगी, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। केंद्र और राज्य सरकार के तालमेल से उत्तराखंड जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन का एक बेहतरीन मॉडल बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।


