उत्तराखंड की पावन भूमि केवल अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह राज्य अपनी अद्वितीय जैव विविधता, घने जंगलों, बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए भी विश्वभर में एक खास पहचान रखता है। इस प्राकृतिक वैभव को सहेजने और मानव तथा वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली है। राजधानी देहरादून स्थित प्रतिष्ठित वन अनुसंधान संस्थान परिसर में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आधिकारिक तौर पर वन्यजीव सप्ताह का शुभारंभ किया। यह आयोजन केवल एक औपचारिक शुरुआत भर नहीं है, बल्कि यह राज्य सरकार की उस दीर्घकालिक नीति का प्रतीक है जिसके तहत प्रकृति की सुरक्षा, स्थानीय अर्थव्यवस्था के संवर्धन और जन-जागरूकता को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री की इस मौजूदगी और उनके द्वारा की गई घोषणाओं से स्पष्ट संकेत मिलता है कि राज्य सरकार आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के मॉडल को धरातल पर उतारने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।
जांबाज नागरिकों का सम्मान और आर्थिक प्रोत्साहन
वन्यजीवों के साथ बढ़ते मानव संघर्ष और इस दौरान उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के बीच इस कार्यक्रम का एक सबसे संवेदनशील और प्रेरणादायक पहलू उन नागरिकों का सम्मान रहा, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की रक्षा की। मुख्यमंत्री ने वन्यजीव संघर्ष के दौरान अदम्य साहस का परिचय देने वाले और दूसरों की जिंदगी बचाने वाले अठारह साहसी व्यक्तियों को सम्मानित किया। इसके साथ ही सरकार की ओर से इन सभी सम्मानित नागरिकों को इक्यावन-इक्यावन हजार रुपये की आर्थिक प्रोत्साहन राशि देने का भी ऐलान किया गया। यह कदम न केवल उन जाबांजों के समर्पण का आदर करता है, बल्कि समाज के अन्य लोगों को भी संकट के समय जिम्मेदारी और साहस के साथ खड़े होने की प्रेरणा देता है। कार्यक्रम स्थल पर आयोजित वन्यजीव फोटोग्राफी प्रदर्शनी और विभिन्न स्टॉलों का अवलोकन करते हुए मुख्यमंत्री ने प्राकृतिक धरोहरों के कलात्मक संरक्षण की सराहना की। इसके अलावा वन्यजीवों पर केंद्रित निबंध प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन करने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत कर भावी पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव जगाने का प्रयास किया गया।
हर जिले में नए पर्यटन स्थल और हल्द्वानी चिड़ियाघर की सौगात
पर्यावरण आधारित पर्यटन को राज्य के सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में कम से कम एक नए पर्यटन स्थल की पहचान की जाए। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि मूल प्राकृतिक सौंदर्य को बिना नुकसान पहुंचाए वहां पर्यटकों के लिए आधुनिक और सुरक्षित सुविधाएं विकसित की जाएं। इससे न केवल मुख्य पर्यटन केंद्रों पर दबाव कम होगा, बल्कि छिपे हुए प्राकृतिक स्थलों को भी एक पहचान मिलेगी। इसी क्रम में मैदानी क्षेत्रों में पर्यावरण शिक्षा और पर्यटन को नया आयाम देने के लिए हल्द्वानी में एक अत्याधुनिक चिड़ियाघर के निर्माण का संकल्प दोहराया गया है। यह परियोजना राज्य सरकार के घोषणा पत्र का एक प्रमुख बिंदु रही है। हल्द्वानी में बनने वाला यह चिड़ियाघर न केवल वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि यह क्षेत्र के बच्चों और शोधकर्ताओं के लिए पर्यावरण शिक्षा और ज्ञान का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।
सनातन संस्कृति, सह-अस्तित्व और एलिवेटेड कॉरिडोर
हमारी प्राचीन परंपरा और सनातन संस्कृति हमेशा से जीवों के प्रति दया और सह-अस्तित्व का संदेश देती आई है। हमारे देवी-देवताओं के साथ जुड़े पशु-पक्षी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि प्रकृति और मानव का रिश्ता कितना गहरा और पवित्र है। इसी सांस्कृतिक सोच को आधुनिक नीति का हिस्सा बनाते हुए राज्य सरकार विकास परियोजनाओं के साथ-साथ वन्यजीवों के सुरक्षित प्राकृतिक गलियारों को बनाए रखने पर काम कर रही है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर है, जहां वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए एशिया के सबसे लंबे एलिवेटेड वाइल्डलाइफ कॉरिडोर का निर्माण किया गया है। यह दिखाता है कि आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के दौरान भी वन्यजीवों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की अनदेखी नहीं की गई है। जिम कॉर्बेट और राजाजी जैसे विश्व प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड की पहचान हैं, जो साल भर लाखों देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। सरकार की प्राथमिकता इन उद्यानों का संरक्षण करते हुए होमस्टे और ईको-टूरिज्म जैसी गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय निवासियों की आय बढ़ाना है।
टाइगर री-लॉकेशन और स्नो लेपर्ड प्रोजेक्ट से बढ़ेगा रोजगार
संरक्षण के इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए वन्यजीव पुनर्वसन की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से राजाजी टाइगर रिजर्व में बाघों को सफलतापूर्वक बसाने की योजना का दूसरा चरण शुरू किया जा रहा है, जिससे राजाजी क्षेत्र में बाघों का कुनबा बढ़ेगा और जैविक संतुलन बेहतर होगा। दूसरी ओर, उच्च हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशील पारिस्थितिकी में स्नो लेपर्ड यानी हिम तेंदुए के संरक्षण और उनके आधार पर नियंत्रित पर्यटन की संभावनाओं को तराशा जा रहा है। उच्च पर्वतीय इलाकों में हिम तेंदुए की मौजूदगी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ होने का सूचक है। यदि इन क्षेत्रों में स्नो लेपर्ड टूरिज्म को वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से बढ़ावा दिया जाता है, तो इससे सीमांत और दुर्गम गांवों के युवाओं को स्थानीय स्तर पर ही स्वरोजगार के बेहतरीन अवसर मिल सकेंगे और पलायन पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए सुरक्षा बल का गठन
राज्य के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती मानव और वन्यजीवों के बीच होने वाला टकराव है। इस संघर्ष को न्यूनतम करने के लिए निगरानी तंत्र को आधुनिक तकनीक से लैस किया जा रहा है। संवेदनशील जंगलों की निगरानी के लिए ड्रोन और आधुनिक गश्ती प्रणालियों का सहारा लिया जा रहा है। इसके साथ ही, कॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व में स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स का गठन करने का निर्णय लिया गया है। यह समर्पित बल अवैध शिकार पर लगाम लगाने के साथ-साथ जंगलों की सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगा। सरकार का यह स्पष्ट मानना है कि किसी भी संरक्षण नीति की सफलता स्थानीय समुदाय की भागीदारी के बिना संभव नहीं है। जब तक जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को संरक्षण के आर्थिक और सामाजिक लाभ नहीं मिलेंगे, तब तक वे इस अभियान से पूरी तरह नहीं जुड़ सकते।
‘सीएम यंग ईको-प्रिन्योर’ योजना और ईको क्लब की शुरुआत
इसी सोच के तहत राज्य में एक लाख युवाओं को मुख्यमंत्री यंग ईको-प्रिन्योर बनाने की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम चल रहा है। इस दूरदर्शी पहल का उद्देश्य राज्य के युवाओं को प्रकृति और वन्यजीव क्षेत्र में पेशेवर रूप से दक्ष बनाना है। इसके अंतर्गत युवाओं को नेचर गाइड, ड्रोन पायलट, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और ईको-टूरिज्म विशेषज्ञ के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है। इस कौशल विकास से युवा केवल रोजगार मांगने वाले नहीं, बल्कि पर्यावरण के क्षेत्र में नए उद्यम खड़े करने वाले बनेंगे। इसके अलावा, स्कूली बच्चों में बचपन से ही प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता पैदा करने के लिए प्रत्येक जिले में ईको क्लब स्थापित किए गए हैं, जिनके माध्यम से विद्यार्थियों को वनों और अभ्यारण्यों की शैक्षणिक यात्राएं कराई जा रही हैं।
जीईपी मूल्यांकन, मिशन लाइफ और अनुग्रह राशि में बढ़ोतरी
उत्तराखंड आज देश का ऐसा राज्य बनकर उभर रहा है जो ईकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन बिठाने का व्यावहारिक मॉडल पेश कर रहा है। केंद्र सरकार के मिशन लाइफ यानी पर्यावरण के लिए जीवन शैली के सिद्धांत को अपनाते हुए रोजमर्रा की आदतों में पर्यावरण संरक्षण को शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों के आर्थिक और सामाजिक मूल्य को आंकने के लिए ग्रॉस एनवायरमेंट प्रोडक्ट यानी जीईपी की अवधारणा को लागू किया गया है। इसके माध्यम से हवा, पानी, मिट्टी और वनों के योगदान का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा रहा है। संरक्षण के साथ-साथ वन्यजीव हमलों से प्रभावित होने वाले नागरिकों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है। सरकार ने वन्यजीव हमले में जनहानि होने पर दी जाने वाली आर्थिक अनुग्रह राशि को छह लाख रुपये से बढ़ाकर दस लाख रुपये कर दिया है, जबकि गंभीर रूप से घायल लोगों के इलाज का संपूर्ण खर्च अब राज्य सरकार खुद वहन कर रही है।
पर्यटकों से जिम्मेदारी और स्वच्छता बनाए रखने की अपील
संरक्षण की इस पूरी कवायद में पर्यटकों और आम जनता की जिम्मेदारी भी बेहद अहम हो जाती है। राज्य में आने वाले पर्यटकों से यह अपील की जा रही है कि वे जब भी किसी राष्ट्रीय उद्यान, जंगल सफारी या धार्मिक स्थल पर जाएं तो वहां स्वच्छता बनाए रखें। सिंगल यूज प्लास्टिक का पूरी तरह बहिष्कार करें, कूड़ा-कचरा निर्धारित स्थानों पर ही डालें और वन्यजीवों से एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखें। जंगलों में शोर मचाना या जीवों को परेशान करना उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित करता है। यदि हर नागरिक और पर्यटक अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को समझे, तो यह छोटा सा प्रयास उत्तराखंड के अमूल्य प्राकृतिक पर्यावरण और वन्यजीवों को सुरक्षित रखने में एक क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है।


