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उत्तराखंड में सांस्कृतिक नवजागरण: सीएम धामी के विजन से विश्व पटल पर निखरती देवभूमि की पहचान

उत्तराखंड की पहचान हमेशा से उसकी पावन देवभूमि वाली छवि, समृद्ध धार्मिक मान्यताओं, अनुपम लोक संस्कृति और नैसर्गिक सौंदर्य से रही है। समय के साथ किसी भी राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह आधुनिकता की दौड़ में अपनी प्राचीन पहचान और सांस्कृतिक धरोहरों को कैसे सुरक्षित रखे। राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का मानना है कि उत्तराखंड की असली ताकत उसकी जड़ों में है, और इसीलिए प्रदेश सरकार विकास की तीव्र गति के साथ-साथ विरासत के संरक्षण की दिशा में एक संतुलित नीति पर काम कर रही है।

सीमांत जिले चम्पावत को एक मॉडल के रूप में विकसित करने का जो बीड़ा उठाया गया है, वह केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के कायाकल्प की योजना नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड के लिए सतत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध विकास का एक अनूठा खाका है। जब किसी क्षेत्र में आधुनिक परिवहन, खेल सुविधाएं, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार के साधन सीधे धार्मिक पर्यटन और स्थानीय परंपराओं से जुड़ते हैं, तो वह केवल कागजी योजना नहीं रह जाती, बल्कि आम इंसान के जीवन में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव लाती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का आधुनिक नवजागरण
उत्तराखंड के सीमांत जनपदों में चम्पावत का अपना एक विशेष ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व रहा है। कुमाऊं राजवंश की ऐतिहासिक राजधानी होने से लेकर सिद्धपीठों और लोकदेवताओं की पावन भूमि होने तक, इस क्षेत्र ने सदियों से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने टनकपुर में नवयुवक रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित दशहरा महोत्सव के पावन अवसर पर इसी सांस्कृतिक चेतना का आह्वान किया।

दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं है, बल्कि यह समाज को एकजुट करने और अपनी परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक बड़ा माध्यम भी है। राज्य सरकार का मानना है कि जब तक हमारी लोक परंपराएं, रामलीलाएं और स्थानीय उत्सव जीवंत रहेंगे, तब तक समाज की नैतिक और सांस्कृतिक नींव मजबूत रहेगी। वर्तमान समय में जब देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास और विरासत को एक साथ लेकर आगे बढ़ रहा है, तब उत्तराखंड भी इस राष्ट्रीय संकल्प में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। धार्मिक स्थलों का सौंदर्यीकरण और लोक परंपराओं का संवर्धन केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को ऊर्जा देने का एक सशक्त माध्यम भी है।

आदर्श चम्पावत का संकल्प: संरचनात्मक सुधार और भारी निवेश
चम्पावत को एक मॉडल जिले के रूप में ढालने के लिए बड़े पैमाने पर अवस्थापना यानी बुनियादी ढांचे का निर्माण किया जा रहा है। केवल घोषणाओं तक सीमित न रहकर ज़मीन पर लगभग 237.74 करोड़ रुपये की विशाल लागत से विभिन्न विकास परियोजनाओं को मूर्त रूप दिया जा रहा है। इनमें से कई परियोजनाएं इस क्षेत्र के व्यावसायिक और सामाजिक स्वरूप को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखती हैं।

अत्याधुनिक आईएसबीटी (अंतर्राज्यीय बस अड्डा): टनकपुर को कुमाऊं का प्रवेश द्वार माना जाता है। यहाँ आधुनिक सुविधाओं से लैस आईएसबीटी के निर्माण से न केवल आम यात्रियों को सहूलियत मिलेगी, बल्कि मैदानी इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की यात्रा भी सुगम होगी। बेहतर परिवहन व्यवस्था किसी भी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ होती है।

शारदा घाट का पुनर्विकास एवं सौन्दर्यीकरण: पावन शारदा नदी के तट पर स्थित घाटों को नया और भव्य स्वरूप दिया जा रहा है। बनबसा और टनकपुर क्षेत्र में शारदा घाट के पुनर्विकास से संध्या आरती, स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आने वाले लोगों को एक सुरक्षित, स्वच्छ और आध्यात्मिक वातावरण मिलेगा।

गोल्ज्यू कॉरिडोर का निर्माण: कुमाऊं के न्याय के देवता माने जाने वाले भगवान गोल्ज्यू के प्रति जन-जन की गाढ़ आस्था है। गोल्ज्यू कॉरिडोर के माध्यम से इस पावन स्थल को एक भव्य स्वरूप दिया जा रहा है, जिससे देशभर से आने वाले श्रद्धालु यहाँ के धार्मिक इतिहास से गहराई से जुड़ सकेंगे।

मां पूर्णागिरि धाम: श्रद्धालुओं की सुविधाओं में ऐतिहासिक विस्तार
उत्तर भारत के प्रसिद्ध सिद्धपीठों में से एक मां पूर्णागिरि धाम में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु माँ के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। चैत्र नवरात्र के मेले के दौरान यहाँ जनसैलाब उमड़ता है। इतनी बड़ी संख्या में आने वाले भक्तों की सुरक्षा, सहूलियत और आवागमन को सुचारू बनाना हमेशा से एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती रहा है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए ककराली गेट से मां पूर्णागिरि धाम की ओर जाने वाले पैदल और वाहन मार्गों पर लगभग 8.10 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक प्रकाश व्यवस्था विकसित की जा रही है। रात के समय यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह कदम बेहद राहत देने वाला साबित होगा।

इसके अलावा, पूरे मंदिर मार्ग पर पेयजल, विश्राम स्थल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं का लगातार विस्तार किया जा रहा है। जब किसी धार्मिक स्थल पर बुनियादी सुविधाएं विश्वस्तरीय होती हैं, तो श्रद्धालुओं का अनुभव सुखद बनता है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और क्षेत्र की साख पूरे देश में बढ़ती है।

खेल, शिक्षा और युवा ऊर्जा का प्रोत्साहन
किसी भी राज्य का भविष्य उसके युवाओं के कंधों पर टिका होता है। यदि युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा, सही अवसर और सही संसाधन न मिलें, तो विकास का कोई भी मॉडल अधूरा रह जाता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने चम्पावत दौरे के दौरान स्पोर्ट्स हॉस्टल टनकपुर पहुंचकर वहां रह रहे उभरते हुए खिलाड़ियों से सीधा संवाद किया।
खिलाड़ियों के बीच पहुंचकर उनका हौसला बढ़ाना और उन्हें मेहनत, कड़े अनुशासन तथा निरंतर अभ्यास का मंत्र देना यह दर्शाता है कि सरकार केवल इमारतों और सड़कों के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मानव संसाधन के विकास पर भी उतना ही ध्यान दे रही है।

उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें शुरुआती स्तर पर ही बेहतर प्रशिक्षण, अच्छा भोजन और खेल सामग्री उपलब्ध कराई जाए। टनकपुर और चम्पावत में खेल सुविधाओं का विस्तार होने से स्थानीय युवाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का मौका मिलेगा। इससे युवा नशे जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर रहकर एक स्वस्थ और अनुशासित जीवन शैली की ओर प्रेरित होंगे।

‘मुख्य सेवक संवाद’: अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक शासन की पहुंच
लोकतंत्र की असली सुंदरता इस बात में निहित है कि सरकार और आम जनता के बीच कोई दूरी न हो। मुख्यमंत्री कैम्प कार्यालय में आयोजित ‘मुख्य सेवक संवाद’ कार्यक्रम इसी लोकतांत्रिक मूल्य को धरातल पर उतारने का एक सफल प्रयास है।

इस संवाद कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने सीधे आम नागरिकों, स्थानीय ग्रामीणों, व्यवसायियों और क्षेत्र के गणमान्य लोगों से मुलाकात की और उनकी समस्याओं को सुना। शासन का मूल मंत्र यह होना चाहिए कि योजनाएं केवल फाइलों या राजधानी के वातानुकूलित कमरों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका सीधा लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे।

जब आम नागरिक सीधे अपनी समस्याएं प्रशासनिक तंत्र के मुखिया के सामने रखता है, तो न केवल समस्याओं का त्वरित समाधान होता है, बल्कि जनता के भीतर सरकार के प्रति विश्वास भी गहरा होता है। चम्पावत में इस तरह के निरंतर संवाद से प्रशासनिक जवाबदेही तय हो रही है और पारदर्शी शासन की नींव मजबूत हो रही है।

रोजगार, स्वरोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति
धार्मिक पर्यटन और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था को होता है। चम्पावत जिले में जब सड़कों का जाल बिछता है, बड़े कॉरिडोर बनते हैं और मंदिरों का सौंदर्यीकरण होता है, तो इससे अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के हजारों नए अवसर पैदा होते हैं।

होमस्टे योजना और स्थानीय पर्यटन: चम्पावत की नैसर्गिक सुंदरता को देखने आने वाले पर्यटकों के लिए स्थानीय स्तर पर ‘होमस्टे’ की अवधारणा बेहद लोकप्रिय हो रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपने घरों में पर्यटकों को रखकर अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं।

हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पाद: धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने से स्थानीय हस्तशिल्प, पहाड़ी उत्पाद, ऑर्गेनिक फल, दालें और हस्तनिर्मित सामग्रियों की मांग तेजी से बढ़ी है।
होटल, परिवहन और दुकानदारी: सड़कों और आईएसबीटी के बनने से स्थानीय ट्रांसपोर्टरों, टैक्सी चालकों, छोटे दुकानदारों और होटल व्यवसायियों के कारोबार में सीधा इजाफा हो रहा है।

इस तरह विकास की यह लहर केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित न रहकर आम नागरिक की जेब तक पहुंच रही है और पलायन जैसी गंभीर समस्या पर अंकुश लगाने में मददगार साबित हो रही है।

जनभागीदारी और प्रशासनिक समन्वय से बनता आदर्श मॉडल
किसी भी क्षेत्र को ‘आदर्श’ बनाने के लिए केवल सरकारी बजट ही काफी नहीं होता, बल्कि इसके लिए जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और आम जनता के बीच एक मजबूत समन्वय की आवश्यकता होती है। टनकपुर में आयोजित कार्यक्रमों में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों, विधायकों के प्रतिनिधियों, महिला और युवा मोर्चा की कार्यकर्ताओं, पालिका अध्यक्षों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति रही, वह इस बात का प्रमाण है कि इस पूरे अभियान को एक जन-आंदोलन का रूप दिया जा रहा है।

भावी राह: एक समृद्ध और संतुलित उत्तराखंड का निर्माण
चम्पावत में हो रहे ये बदलाव इस बात के संकेत हैं कि उत्तराखंड अब अपनी विकास प्राथमिकताओं को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है। राज्य को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उसकी प्राकृतिक संवेदनशील पारिस्थितिकी और प्राचीन धार्मिक पहचान को बनाए रखना एक कठिन काम था, लेकिन संतुलित नीतियों के जरिए इसे संभव बनाया जा रहा है।

आदर्श चम्पावत की यह सफलता आने वाले समय में उत्तराखंड के अन्य पर्वतीय जिलों के लिए भी एक मार्गदर्शक का काम करेगी। जब हर जिले में उसकी स्थानीय विशेषताओं के अनुसार बुनियादी ढांचा, खेल सुविधाएं, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और धार्मिक पर्यटन का ढांचा तैयार होगा, तो देवभूमि की गरिमा और अधिक ऊंचाइयों को छुएगी। विकास और विरासत के इस अनूठे संगम से न केवल वर्तमान पीढ़ी का जीवन सुगम हो रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सुरक्षित, समृद्ध और स्वाभिमानी उत्तराखंड की मजबूत नींव रखी जा रही है।

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