उधम सिंह नगर जिले में स्थित देश के पहले और ऐतिहासिक गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में 120वें अखिल भारतीय किसान मेले एवं कृषि प्रदर्शनी का बेहद उत्साहजनक और भव्य शुभारंभ हुआ। राज्य के राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति लेफ़्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने इस ऐतिहासिक आयोजन का औपचारिक उद्घाटन किया। यह मेला न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे उत्तर भारत के किसानों के लिए कृषि जगत का एक महाकुंभ माना जाता है। इस बार का मेला इस मायने में बेहद खास है क्योंकि इसमें पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन प्रणाली और बाजार की समझ को खेती का अभिन्न हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। मेले के दौरान वैज्ञानिकों, शोधार्थियों, नीति निर्माताओं और हजारों किसानों ने एक ही मंच पर एकत्र होकर इस बात पर मंथन किया कि किस प्रकार देश को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनाने के बाद अब किसानों की व्यक्तिगत आय बढ़ाने की दिशा में एक नया मोड़ दिया जाए।
ऐतिहासिक विरासत से आधुनिक नवाचार का सफर
पंतनगर विश्वविद्यालय की जिस पावन भूमि पर आज उन्नत शोध और आधुनिक कृषि मेले आयोजित हो रहे हैं, उसका अपना एक बहुत समृद्ध और संघर्षपूर्ण इतिहास रहा है। स्वतंत्रता के बाद जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, तब इस पूरे क्षेत्र को घने जंगलों और वन्यजीवों से घिरा इलाका माना जाता था। हमारे पूर्वजों, स्थानीय निवासियों और समर्पित वैज्ञानिकों की हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर इस विकट भौगोलिक परिस्थिति को एक उपजाऊ कृषि क्षेत्र के रूप में बदला गया। आज यही भूमि देश की हरित क्रांति की जननी कही जाती है।
इस 120वें किसान मेले के पीछे 119 सफल आयोजनों का गहरा अनुभव और समृद्ध परंपरा छिपी हुई है। यह मेला केवल एक प्रदर्शनी मात्र नहीं है, बल्कि यह देश के वैज्ञानिकों, कृषि व्यवसाय से जुड़े उद्यमियों, छात्रों और सुदूर ग्रामीण अंचलों से आए किसानों को आपस में जोड़ने वाला एक मजबूत सेतु है। इतिहास से सीख लेते हुए अब इस विरासत को 21वीं सदी की तकनीकी आवश्यकताओं के साथ जोड़ना समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।
प्रयोगशाला से खेत तक अनुसंधान पहुंचाने की आवश्यकता
कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह रही है कि उच्च स्तरीय शोध और प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकें कई बार कागजों और कमरों तक ही सीमित रह जाती हैं। उद्घाटन समारोह के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि ‘प्रयोगशाला से खेत तक’ की अवधारणा को पूरी मुस्तैदी से धरातल पर उतारना होगा। वैज्ञानिकों द्वारा वर्षों के कठिन परिश्रम से तैयार की गई नई तकनीकों, उन्नत बीजों और कुशल प्रणालियों का असली मूल्यांकन तब होता है, जब वे एक साधारण किसान के खेत में जाकर उसकी पैदावार और आय में बढ़ोतरी करती हैं।
कृषि विज्ञान केंद्रों को इस दिशा में सबसे अहम भूमिका निभानी होगी। ये केंद्र स्थानीय स्तर पर किसानों को आने वाली व्यावहारिक समस्याओं का तुरंत समाधान देने वाले केंद्र बनने चाहिए। जब तक कृषि वैज्ञानिक और किसान सीधे आपस में संवाद नहीं करेंगे, तब तक शोध का वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा। राज्य के हर जिले में वैज्ञानिक ज्ञान का प्रसार करना ही आज की प्रशासनिक और वैज्ञानिक प्राथमिकता होनी चाहिए।
खेती में तीन नई क्रांतियों का खाका
देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के बाद अब समय आ गया है कि उत्तराखंड जैसी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में तीन विशेष क्रांतियों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
मधुमक्खी पालन और शहद क्रांति: उत्तराखंड का प्राकृतिक वातावरण, विविध वनस्पतियां और स्वच्छ जलवायु गुणवत्तापूर्ण शहद उत्पादन के लिए पूरी तरह अनुकूल हैं। मधुमक्खी पालन न केवल शहद से अतिरिक्त आय देता है, बल्कि यह फसलों में परागण की प्रक्रिया को बढ़ाकर कृषि उत्पादकता में भी ऐतिहासिक सुधार लाता है।
सुगंधित एवं औषधीय फसलें यानी अरोमा क्रांति: राज्य के पर्वतीय और मैदानी इलाकों में औषधीय और सुगंधित पौधों की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से बढ़ रही है। पारंपरिक फसलों की तुलना में कम पानी और कम लागत में तैयार होने वाली ये फसलें किसानों को आर्थिक रूप से बेहद मजबूत बना सकती हैं।
पारंपरिक मोटे अनाज यानी श्रीअन्न क्रांति: कोदा, झंगोरा जैसे स्थानीय और पारंपरिक अनाजों की महत्ता को आज दुनिया स्वीकार कर रही है। पौष्टिकता से भरपूर ये अनाज कम देखभाल और विपरीत मौसम में भी बेहतर उत्पादन देते हैं। इन्हें आधुनिक पैकेजिंग और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़कर एक नई आर्थिक क्रांति खड़ी की जा सकती है।
आधुनिक तकनीक और डिजिटल कृषि से मित्रता
आधुनिक युग में तकनीक से दूरी बनाना खेती के नुकसान का कारण बन सकता है। आज के किसान को तकनीक से डरने के बजाय उसे अपना सबसे अच्छा मित्र बनाना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन तकनीक, सेंसर आधारित सिंचाई प्रणाली और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी व्यवस्थाएं अब केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये सीधे खेत-खलिहानों में दस्तक दे चुकी हैं।
किसान मेलों में प्रदर्शित किए जा रहे आधुनिक ड्रोन के माध्यम से कम समय और कम पानी में कीटनाशकों व उर्वरकों का सटीक छिड़काव संभव हो रहा है। सेंसर आधारित प्रणालियां मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की सटीक जानकारी तुरंत किसान के फोन पर भेज देती हैं। जब तकनीक किसान के हाथ में होगी और नवाचार खेत में होगा, तब न केवल श्रम की बचत होगी बल्कि उत्पादन लागत में भी भारी कमी आएगी।
केवल उत्पादन नहीं, अब बाजार और आपूर्ति श्रृंखला पर ध्यान जरूरी
परंपरागत रूप से भारत का किसान केवल फसल उगाने तक खुद को सीमित रखता आया है। फसल काटने के बाद उसे सही दाम न मिलना या बिचौलियों के हाथों नुकसान उठाना एक पुरानी समस्या रही है। आज के आधुनिक किसान को केवल एक उत्पादक बनकर नहीं रहना है, बल्कि उसे एक कुशल कृषि-उद्यमी की भूमिका निभानी होगी।
किसानों को अपनी उपज की बेहतर पैकेजिंग, गुणवत्ता नियंत्रण, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति श्रृंखला का बुनियादी ज्ञान हासिल करना होगा। जब तक किसान को यह समझ नहीं होगी कि उसकी फसल किस बाजार में किस रूप में बेहतर दाम पा सकती है, तब तक केवल उत्पादन बढ़ाकर आय बढ़ाना संभव नहीं है। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां लगाकर कच्चे माल को तैयार उत्पाद में बदलना ही मुनाफे का असली मंत्र है।
महिला शक्ति और स्वयं सहायता समूहों का अनुकरणीय योगदान
उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ हमेशा से यहां की महिला शक्ति रही है। किसान मेले में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं द्वारा लगाए गए स्टॉल इस बात का जीवंत प्रमाण हैं। ग्रामीण महिलाओं द्वारा बनाए जा रहे अचार, जैम, जेली, बेकरी उत्पाद, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजन न केवल गुणवत्ता में अव्वल हैं, बल्कि वे ग्रामीण आजीविका का एक मजबूत आधार भी बन रहे हैं।
विशेष रूप से खुशी की बात यह है कि राज्य की महिलाएं अब पारंपरिक कार्यों से आगे बढ़कर कृषि में आधुनिक ड्रोन उड़ाने और स्मार्ट उपकरणों को चलाने का प्रशिक्षण भी सफलता से ले रही हैं। जब गांव की महिलाएं तकनीक और बाजार से जुड़ती हैं, तो पूरे परिवार और समाज का आर्थिक स्तर अपने आप ऊपर उठने लगता है।
प्रदर्शनी के मुख्य आकर्षण और वैज्ञानिक गतिविधियां
इस वर्ष आयोजित 120वें किसान मेले में 560 से अधिक विविध स्टॉल लगाए गए हैं, जिनमें कृषि से जुड़े हर पहलू को वैज्ञानिक ढंग से प्रदर्शित किया गया है। मेले में देश भर से लगभग 40 से 50 हजार किसानों के पहुंचने का अनुमान है।
स्मार्ट कृषि उपकरण और ड्रोन: विभिन्न कंपनियों और विश्वविद्यालय के विभागों द्वारा स्वचालित कृषि यंत्रों, ड्रोन और सेंसर प्रणालियों का जीवंत प्रदर्शन किया जा रहा है।
उन्नत बीज और प्रजातियां: फल, फूल, सब्जियों और खाद्यान्न फसलों की नई, रोगरोधी तथा अधिक पैदावार देने वाली किस्मों के बीजों का वितरण और प्रदर्शन किया जा रहा है।
पशुपालन और मत्स्य पालन: दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की आधुनिक तकनीकों, पशु आहार, मधुमक्खी पालन और मत्स्य पालन से जुड़े व्यावहारिक मॉडल दिखाए गए हैं।
जैविक एवं प्राकृतिक खेती: रसायनों के बिना सुरक्षित और टिकाऊ खेती करने के आसान तरीके तथा जैविक खाद बनाने की विधियां बताई जा रही हैं।
प्रगतिशील किसानों का सम्मान: राज्य के अलग-अलग जिलों से आए 9 उत्कृष्ट और प्रगतिशील किसानों को उनके उल्लेखनीय नवाचारों के लिए सम्मानित भी किया गया, जिससे अन्य किसानों को भी प्रेरणा मिले।
टिकाऊ विकास और विकसित भारत के लक्ष्य में योगदान
देश ने वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लिया है। इस राष्ट्रीय लक्ष्य की सफलता का रास्ता सीधे गांव की पगडंडियों और खेतों से होकर गुजरता है। जब तक देश का अन्नदाता आर्थिक रूप से सक्षम, तकनीक से लैस और आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक किसी भी विकास दर का आंकड़ा अधूरा ही रहेगा।
कृषि को अब केवल जीवन यापन का साधन न मानकर एक आकर्षक, लाभकारी और सम्मानजनक व्यवसाय के रूप में स्थापित करना होगा। इसके लिए वैज्ञानिकों की दूरदृष्टि, सरकार की जनकल्याणकारी नीतियां, युवाओं का नवाचार और किसानों का अथक परिश्रम – इन चारों स्तंभों को एक दिशा में मिलकर काम करना होगा। पंतनगर विश्वविद्यालय का यह 120वां किसान मेला इसी सामूहिक प्रयास और नई सोच की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और मील का पत्थर साबित हो रहा है।


