उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना और यहां की नदियां राज्य के विकास का मुख्य आधार रही हैं। हालांकि, हर साल मानसून के दौरान यही नदियां भीषण आपदा और तबाही का कारण भी बनती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन और मैदानों में बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए एक ठोस और दीर्घकालिक जल प्रबंधन नीति की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। इसी दिशा में हाल ही में देहरादून के यमुना कॉलोनी स्थित लोक निर्माण विभाग के सभागार में एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में प्रदेश के सिंचाई मंत्री सतपाल महाराज ने सिंचाई विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लंबित परियोजनाओं, जल प्रबंधन, किसानों के लिए सिंचाई सुविधाओं और आगामी कुंभ मेले की तैयारियों पर विस्तृत चर्चा की। समीक्षा बैठक का मुख्य संदेश यही था कि राज्य में जल संसाधनों का वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रबंधन करके न केवल आपदा के खतरे को कम किया जाए, बल्कि कृषि क्षेत्र को भी सशक्त बनाया जाए।
नदियों का प्राथमिकता से चैनेलाइजेशन और सुरक्षा
नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को नियंत्रित करने, पुलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और तटीय इलाकों को कटाव से बचाने के लिए नदियों का चैनेलाइजेशन एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। सिंचाई मंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि नदियों के चैनेलाइजेशन का कार्य प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए। अक्सर देखा जाता है कि मानसून के समय नदियों में बड़ी मात्रा में गाद, रेत और पत्थर बहकर आ जाते हैं, जो पुलों के नीचे और संकरे रास्तों में जमा हो जाते हैं। इससे नदी का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध होता है और पानी आसपास के आवासीय तथा कृषि क्षेत्रों में घुसकर तबाही मचाता है। पुलों के नीचे सही तरीके से सफ़ाई और चैनेलाइजेशन होने से जलप्रवाह सुचारू बना रहेगा, जिससे न केवल संरचनात्मक नुकसान रुकेगा बल्कि पुलों की उम्र भी बढ़ेगी।
वैज्ञानिक अध्ययन और नदियों का मोर्फोलॉजिकल विश्लेषण
वैज्ञानिक आधार पर नदियों के व्यवहार को समझे बिना किया गया कोई भी निर्माण कार्य लंबे समय तक प्रभावी नहीं हो सकता। इसी बात को ध्यान में रखते हुए गढ़वाल और कुमाऊँ मंडल की प्रमुख नदियों का आकारिकी और वैज्ञानिक अध्ययन कराया जा रहा है। इस अध्ययन के माध्यम से नदियों के जलभराव, गाद जमा होने की दर और उनके मोड़ों की बनावट का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाएगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किस स्थान पर तटबंध बनाने की आवश्यकता है और कहाँ नदी के मार्ग को सीधा या गहरा करने की जरूरत है। वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर किया गया चैनेलाइजेशन न केवल टिकाऊ होगा, बल्कि इससे पर्यावरण पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
किसानों को सिंचाई सुविधा और टेल फीडिंग पर जोर
उत्तराखंड एक कृषि प्रधान राज्य भी है, जहाँ मैदानी और घाटी वाले इलाकों में खेती आजीविका का मुख्य साधन है। समीक्षा बैठक में सिंचाई क्षमता और उसके वास्तविक उपयोग के बीच के अंतर पर चिंता व्यक्त की गई। वर्तमान में उपलब्ध सिंचाई क्षमता के सापेक्ष किसानों को खेतों तक पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। इस अंतर को समाप्त करने के लिए सिंचाई मंत्री ने अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि सभी नहरों की अंतिम छोर तक पानी पहुँचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। अक्सर देखा जाता है कि नहरों की शुरुआत में तो पानी का बहाव ठीक रहता है, लेकिन देखरेख के अभाव में या गाद जमा होने से अंतिम छोर पर स्थित खेतों तक पानी नहीं पहुँच पाता। इस व्यवस्था के दुरुस्त होने से राज्य के हजारों किसानों को सीधे लाभ मिलेगा और कृषि पैदावार में वृद्धि होगी।
निर्माण कार्यों में पारदर्शिता और थर्ड पार्टी टेस्टिंग
निर्माण कार्यों में पारदर्शिता और मजबूती सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। अब पाँच करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली सभी सिंचाई और तटबंध योजनाओं के लिए तीसरे पक्ष से परीक्षण की व्यवस्था लागू की जाएगी। इस व्यवस्था के तहत किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और तकनीक का निरीक्षण किया जाएगा। पर्वतीय क्षेत्रों में अक्सर घटिया निर्माण सामग्री के कारण तटबंध और नहरें पहली ही बारिश में बह जाती हैं, जिससे जनता के पैसे का नुकसान होता है। स्वतंत्र एजेंसी से जाँच कराने से अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय होगी और योजनाओं की मजबूती सुनिश्चित की जा सकेगी।
आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए भारी बजट की मांग
राज्य में पिछले वर्षों के दौरान आई प्राकृतिक आपदाओं ने सिंचाई ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया है। विशेष रूप से चमोली और थराली क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन के कारण दर्जनों सिंचाई योजनाएं और तटबंध क्षतिग्रस्त हो गए थे। इन क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और सुरक्षा कार्यों के लिए विशाल बजट की मांग की गई है। चमोली और थराली में आपदा से प्रभावित चौबीस प्रमुख कार्यों के लिए एक हजार छियात्तर करोड़ रुपये की राशि प्रस्तावित की गई है। इसके अलावा सात अन्य बड़ी योजनाओं के लिए सात सौ चौहत्तर करोड़ रुपये से अधिक का बजट मांगा गया है। इन स्वीकृतियों के मिलने से सीमांत क्षेत्रों में सुरक्षा दीवारें, तटबंध और नहरों का पुनर्निर्माण तेज़ी से पूरा हो सकेगा, जिससे स्थानीय निवासियों को भविष्य की आपदाओं से सुरक्षा मिलेगी।
हरिद्वार कुंभ मेला तैयारियों हेतु विशेष बजटीय प्रावधान
हरिद्वार में आयोजित होने वाला महाकुंभ मेला न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए एक सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। कुंभ मेले के दौरान देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए हरिद्वार पहुँचते हैं। इतने बड़े आयोजन के लिए सुचारू जल प्रबंधन, घाटों की मरम्मत और सुरक्षा व्यवस्था अति आवश्यक होती है। समीक्षा बैठक में कुंभ कार्यों के लिए नब्बे करोड़ रुपये के विशेष बजट की मांग पर चर्चा की गई। इस बजट का उपयोग घाटों के सौंदर्यीकरण, गंगा के तटबंधों को मजबूत करने, जलस्तर को नियंत्रित करने और श्रद्धालुओं की सुरक्षा हेतु आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में किया जाएगा। समय रहते इन कार्यों को शुरू करने से कुंभ मेले का आयोजन सुरक्षित और भव्य तरीके से संपन्न हो सकेगा।
जमरानी बांध परियोजना और जल संचयन की दिशा में कदम
जल संचयन और बहुउद्देशीय परियोजनाओं की दृष्टि से जमरानी बांध परियोजना कुमाऊँ क्षेत्र के लिए एक वरदान साबित होने वाली है। इस परियोजना से न केवल विशाल आबादी को पीने का पानी मिलेगा, बल्कि हजारों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई भी संभव हो सकेगी। बैठक में बताया गया कि इस वर्ष जमरानी बांध के लिए तीन सौ सैंतीस करोड़ रुपये का बजट रखा गया है, जिसमें से एक सौ छाछठ करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृति जारी की जा चुकी है। इस बजट के आवंटन से बांध निर्माण के कार्यों में तेजी आएगी। जलाशय और बैराजों की निरंतर निगरानी के लिए मुख्य संस्थाओं को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं ताकि जल प्रबंधन में किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो।
पर्यावरण संतुलन और सतत विकास की अनिवार्यता
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। मानसून के समय जल का सही प्रबंधन न होना केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं पहुंचाता, बल्कि जन-धन की हानि का कारण भी बनता है। सरकार द्वारा उठाए जा रहे ये कदम जैसे वैज्ञानिक अध्ययन, गुणवत्ता परीक्षण और पर्याप्त बजट का प्रावधान, राज्य को आपदा से सुरक्षित बनाने में दूरगामी भूमिका निभाएंगे। जब नहरों का अंतिम छोर पानी से समृद्ध होगा और नदियाँ नियंत्रित मार्ग से बहेंगी, तब राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा मिलेगी।
प्रशासनिक मुस्तैदी और योजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन की आवश्यकता
समीक्षा बैठक में प्रशासनिक स्तर पर उच्च अधिकारियों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि सरकार इन योजनाओं को लेकर पूरी तरह गंभीर है। बैठक में अपर सचिव गरिमा रौंकली, प्रमुख अभियंता सुभाष चंद्र पांडे, मुख्य अभियंता शंकर कुमार शाह और मुख्य अभियंता चंद्रशेखर सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया गया है कि बजट का व्यय तय मानकों के अनुसार हो और कार्यों को समय सीमा के भीतर पूरा किया जाए। यदि इन सभी निर्णयों का धरातल पर सही तरीके से क्रियान्वयन होता है, तो उत्तराखंड में जल संकट, सिंचाई की कमी और बाढ़ की विभीषिका से काफी हद तक राहत मिल सकेगी।


