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उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का बड़ा प्रयास, स्वतंत्रता सेनानी जयानंद भारती की धरोहर का होगा कायाकल्प

उत्तराखंड की पावन धरा हमेशा से वीरों, साधकों और सामाजिक क्रांति के पुरोधाओं की भूमि रही है। जब भी इस पहाड़ी अंचल में सामाजिक न्याय, मान-सम्मान और स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है, तो ‘उत्तराखंड रत्न’ कर्मवीर जयानंद भारती जी का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में उभरकर आता है। हाल ही में प्रदेश सरकार द्वारा ली गई एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल ने इस महान स्वतंत्रता सेनानी के ऐतिहासिक स्मृति स्थलों को सहेजने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है।

पौड़ी गढ़वाल जिले के बीरोंखाल विकासखंड अंतर्गत साबली (पंचपुरी) में स्थित जयानंद भारती जी का पैतृक एवं ऐतिहासिक भवन, जो लंबे समय से उपेक्षा और समय की मार झेलते हुए जीर्ण-शीर्ण स्थिति में पहुंच गया था, अब अपने पुराने वैभव और गरिमा को पुनः प्राप्त करने जा रहा है। राज्य सरकार ने इस ऐतिहासिक धरोहर के जीर्णोद्धार और संरक्षण कार्य को आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री घोषणा में शामिल कर लिया है। इस निर्णय से न केवल स्थानीय निवासियों की वर्षों पुरानी मांग पूरी हुई है, बल्कि पूरे उत्तराखंड में सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक विरासत के प्रति एक नया सम्मान जागृत हुआ है।

यह संपूर्ण घटनाक्रम प्रदेश के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में काफी मायनों में खास माना जा रहा है। 17 अक्टूबर को स्वतंत्रता सेनानी कर्मवीर जयानंद भारती जी की 146वीं जयंती का भव्य आयोजन बीरोंखाल स्थित राजकीय इंटर कॉलेज स्यूंसी के मैदान में दो दिवसीय राजकीय मेले के रूप में किया गया था। इस गरिमामयी समारोह के दौरान चौबट्टाखाल के क्षेत्रीय विधायक और प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने क्षेत्रवासियों से एक वादा किया था। उन्होंने इस ऐतिहासिक स्थल की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त करते हुए घोषणा की थी कि वे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिलकर इस भवन के संरक्षण के लिए विशेष बजट स्वीकृत करवाएंगे। अपने उसी वादे को अमलीजामा पहनाते हुए कैबिनेट मंत्री ने राज्य के शीर्ष नेतृत्व से पत्राचार और व्यक्तिगत वार्ता की। इसके सुखद परिणाम स्वरूप मुख्यमंत्री ने जनभावनाओं और ऐतिहासिक महत्व को प्राथमिकता देते हुए लगभग पचास लाख रुपये की लागत से इस भवन के कायाकल्प को मुख्यमंत्री घोषणा में शामिल कर लिया।

डोला-पालकी आंदोलन और जयानंद भारती जी का सामाजिक योगदान
इस ऐतिहासिक भवन के संरक्षण के महत्व को समझने के लिए कर्मवीर जयानंद भारती जी के त्याग, संघर्ष और सामाजिक योगदान को गहराई से जानना बेहद जरूरी है। 17 अक्टूबर 1881 को जन्मे जयानंद भारती जी मात्र एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि वे उत्तराखंड के सामाजिक पुनर्जागरण के सबसे बड़े स्तंभों में से एक थे। बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में जब उत्तराखंड का समाज कई तरह की कुरीतियों, छुआछूत और सामाजिक असमानता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब जयानंद भारती जी ने दबे-कुचले और वंचित वर्गों के अधिकारों की आवाज उठाई।

उनका सबसे बड़ा और ऐतिहासिक योगदान प्रसिद्ध ‘डोला-पालकी आंदोलन’ था। उस दौर में पहाड़ी इलाकों में सामाजिक बंदिशें इतनी कठोर थीं कि शिल्पकार वर्ग के दूल्हा-दुल्हन को विवाह के समय डोला या पालकी में बैठने की अनुमति नहीं थी, जबकि अन्य वर्गों के लिए यह आम बात थी। इस अमानवीय और अपमानजनक प्रथा के खिलाफ जयानंद भारती जी ने एक लंबा और अहिंसक संघर्ष छेड़ा। उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ ब्रिटिश अदालतों से लेकर सामाजिक मंचों तक लड़ाई लड़ी। लगभग बीस वर्षों के कड़े संघर्ष के बाद अंततः वर्ष 1936 में वे इस कुप्रथा को समाप्त कराने में सफल रहे। यह आंदोलन केवल एक प्रथा का अंत नहीं था, बल्कि यह समाज में प्रत्येक नागरिक को बराबरी का दर्जा और मानवीय गरिमा दिलाने की एक बड़ी क्रांति थी।

स्वतंत्रता संग्राम में अप्रतिम योगदान और राष्ट्रीय पहचान
कर्मवीर जयानंद भारती जी का कार्यक्षेत्र केवल सामाजिक सुधारों तक ही सीमित नहीं रहा। जब भारत छोड़ो आंदोलन और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की लहर पूरे देश में फैली, तो वे अग्रणी भूमिका निभाते हुए अग्रिम मोर्चे पर डट गए। उन्होंने महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों से प्रेरित होकर गढ़वाल के गांव-गांव में जाकर लोगों को आजादी के प्रति जागरूक किया।

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं, लेकिन उनके बुलंद हौसले कभी पस्त नहीं हुए। उन्होंने आर्य समाज के माध्यम से शिक्षा के प्रसार, कुरीति निवारण और मद्यपान निषेध जैसे अभियानों को भी घर-घर पहुंचाया। स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक क्रांति में उनके इसी अद्वितीय योगदान के कारण उन्हें ‘उत्तराखंड रत्न’ और ‘कर्मवीर’ जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया। ऐसे महान व्यक्तित्व के निवास स्थान और स्मृतियों को सहेजना आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी है।

जीर्णोद्धार योजना और पचास लाख का प्रस्तावित बजट
साबली, पंचपुरी स्थित जयानंद भारती जी का भवन वर्षों से देखरेख के अभाव में जर्जर हो रहा था। स्थानीय लोग, इतिहासकार और सामाजिक संगठन लंबे समय से इसके संरक्षण की गुहार लगा रहे थे। सरकार द्वारा इस भवन के जीर्णोद्धार के लिए स्वीकृत की गई लगभग पचास लाख रुपये की धनराशि से इस स्थल को एक जीवंत स्मारक के रूप में विकसित किया जाएगा।

इस योजना के अंतर्गत भवन की मूल वास्तुकला और पारंपरिक पहाड़ी शैली को बनाए रखते हुए इसकी संरचनात्मक मरम्मत की जाएगी। इसके साथ ही इस परिसर में एक आधुनिक संग्रहालय, पुस्तकालय और शोध केंद्र स्थापित करने की भी योजना है, जहां जयानंद भारती जी के जीवन से जुड़े दस्तावेज, उनकी पुरानी तस्वीरें, उनके द्वारा लिखे गए पत्र और डोला-पालकी आंदोलन से संबंधित ऐतिहासिक साक्ष्य प्रदर्शित किए जाएंगे। यह स्थान न केवल एक स्मारक बनेगा, बल्कि शोधार्थियों, छात्रों और पर्यटकों के लिए एक प्रेरणा केंद्र के रूप में भी कार्य करेगा।

पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव
उत्तराखंड सरकार का यह कदम केवल एक भवन के नवीनीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक पर्यटन से भी जुड़ा हुआ है। पौड़ी गढ़वाल का बीरोंखाल और चौबट्टाखाल क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर होने के बावजूद कई विकास कार्यों में पीछे रहा है। जब किसी ऐतिहासिक धरोहर को सहेजा जाता है और उसे पर्यटन मानचित्र पर लाया जाता है, तो उससे पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदलती है।

सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा: जयानंद भारती जी के इस स्मारक को राज्य के सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाएगा। इससे देश-विदेश से आने वाले पर्यटक और शोधार्थी इस दूरस्थ क्षेत्र का रुख करेंगे।
स्थानीय रोजगार के अवसर: पर्यटन गतिविधियों के बढ़ने से स्थानीय होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प और गाइड सेवाओं को नया जीवन मिलेगा, जिससे युवाओं के लिए स्वरोजगार के रास्ते खुलेंगे।
पलायन पर अंकुश: पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकने में ऐसे सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब गांव में ही आर्थिक अवसर पैदा होंगे, तो स्थानीय लोग अपने मूल निवास स्थानों की ओर लौटेंगे।
ऐतिहासिक विरासत की सुरक्षा: इस पहल से राज्य की अन्य गुमनाम और उपेक्षित ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

जनभावनाओं का सम्मान और शासन की प्रतिबद्धता
सांस्कृतिक मंत्री सतपाल महाराज ने मुख्यमंत्री के इस फैसले पर आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह निर्णय केवल एक बजट आवंटन नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के जन-जन की भावनाओं का सम्मान है। उन्होंने कहा कि कर्मवीर जयानंद भारती जी का जीवन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो समाज में बदलाव और न्याय की इच्छा रखता है। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाएगा और इसे समय सीमा के भीतर पूरा किया जाएगा ताकि साबली गांव को एक वैश्विक पहचान मिल सके।
स्थानीय निवासियों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सरकार के इस फैसले का जोरदार स्वागत किया है। बीरोंखाल के ग्रामीणों का कहना है कि यह निर्णय साबली गांव और पूरे गढ़वाल क्षेत्र के लिए गौरव का क्षण है। वर्षों से जिस धरोहर को वे अपनी आंखों के सामने ढहते हुए देख रहे थे, अब उसके पुनरुद्धार की खबर ने पूरे क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ा दी है।

भावी पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा पुंज
आज के दौर में जब युवा पीढ़ी डिजिटल क्रांति के युग में जी रही है, तब अपने इतिहास, महापुरुषों और उनके संघर्षों से जुड़े रहना अत्यंत आवश्यक है। जयानंद भारती जी का जीवन हमें सिखाता है कि किस प्रकार सीमित संसाधनों और भारी सामाजिक विरोध के बावजूद सत्य, अहिंसा और न्याय के मार्ग पर चलकर समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।
साबली में बनने वाला यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देगा कि उत्तराखंड का इतिहास केवल युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना, समरसता और अधिकारों के लिए लड़ी गई सफल क्रांतियों का भी गवाह रहा है। जब स्कूली छात्र और शोधार्थी इस स्थल का दौरा करेंगे, तो वे अपनी मिट्टी के गौरवशाली इतिहास को नजदीक से जान पाएंगे।

उत्तराखंड रत्न कर्मवीर जयानंद भारती के साबली स्थित पैतृक भवन के जीर्णोद्धार का निर्णय एक स्वागत योग्य और ऐतिहासिक कदम है। पचास लाख रुपये की लागत से होने वाला यह कायाकल्प न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है, बल्कि यह उत्तराखंड की समृद्ध सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक भागीरथी प्रयास भी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज की यह संयुक्त पहल बीरोंखाल क्षेत्र के विकास, सांस्कृतिक पर्यटन के विस्तार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में मील का पत्थर साबित होगी। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि निर्माण कार्य जल्द से जल्द पूरा होकर इस ऐतिहासिक स्थल को जनता और भावी पीढ़ियों को समर्पित किया जाएगा।

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