Homeउत्तराखंडउत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने राजभवन में संस्कृत, योग...

उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने राजभवन में संस्कृत, योग और आयुर्वेद के विकास को लेकर बनी नई रणनीति

उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह से लोक भवन में स्वस्तिवाचनम् संस्था के एक खास प्रतिनिधिमंडल ने शिष्टाचार भेंट की। इस बेहद महत्वपूर्ण और औपचारिक मुलाकात के दौरान उत्तराखण्ड राज्य में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, संरक्षण तथा योग और आयुर्वेद जैसी महान प्राचीन विधाओं के संवर्धन को लेकर बहुत विस्तार से चर्चा की गई। राजभवन में आयोजित इस विशेष बैठक के दौरान संस्था के ट्रस्टी हरीश चन्द्र जोशी, संस्था के सम्मानित सदस्य डॉ. सुनील जोशी और डॉ. जीवन जोशी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल की ओर से महान संस्कृत विद्वान आचार्य दिनेश चंद्र जोशी की स्मृति को समर्पित एक विशेष स्मारक डाक टिकट राज्यपाल को भेंट किया गया। उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने इस पहल का दिल से स्वागत किया और कहा कि अपनी महान प्रतिभाओं और विद्वानों को सम्मान देना समाज की एक बहुत बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मान समारोह और स्मारक डाक टिकट हमारी आने वाली युवा पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और अपनी भाषा के लिए काम करने की एक नई प्रेरणा देते हैं।

संस्कृत भाषा ही हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर और ज्ञान का शाश्वत आधार है
राजभवन में हुई इस परिचर्चा के दौरान राज्यपाल ने संस्कृत भाषा के महत्व पर बहुत बारीकी से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल बातचीत करने का एक माध्यम भर नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान, गौरवशाली इतिहास और प्राचीन ज्ञान का सबसे बड़ा और मजबूत आधार है। यह एक ऐसी भाषा है जो हमें अपनी परंपराओं, जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक जड़ों से सीधे तौर पर जोड़ने का काम करती है।
राज्यपाल ने इस बात को रेखांकित किया कि हमारे सभी प्राचीन ग्रंथ, वेद, उपनिषद, दर्शन और विज्ञान से जुड़े महान दस्तावेज़ मूल रूप से संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। यदि हमें भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्वरूप को सही अर्थों में समझना है, तो हमें संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करना ही होगा। जब हम अपनी इस पावन भाषा को संरक्षित करते हैं, तो हम केवल एक बोली को नहीं बचाते, बल्कि हज़ारों सालों से चले आ रहे ज्ञान के उस सागर को सहेजते हैं जो पूरी मानव जाति के कल्याण के लिए रचा गया था।

देवभूमि उत्तराखण्ड को संस्कृत के विकास में निभानी होगी अग्रणी भूमिका
बैठक के दौरान राज्यपाल ने राज्य की विशिष्ट पहचान पर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड को पूरे विश्व में देवभूमि के रूप में पूजा जाता है। इस पावन धरती का हमारी संस्कृत भाषा, वेदों और प्राचीन ज्ञान परंपरा से अत्यंत गहरा और अटूट नाता रहा है। इतिहास साक्षी है कि इस भूमि पर महान ऋषियों, मुनियों और विद्वानों ने तपस्या की और ज्ञान का सृजन किया।

इसीलिए उत्तराखण्ड राज्य की यह पहली और सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के कार्यों में पूरे देश का नेतृत्व करे। राज्यपाल ने कहा कि उत्तराखण्ड को एक ऐसा वैश्विक मॉडल या केंद्र बनना चाहिए जहाँ से संस्कृत के ज्ञान की तरंगे न केवल भारत के कोने-कोने तक पहुँचे, बल्कि पूरी दुनिया के अलग-अलग देशों तक इसकी गूंज सुनाई दे। इसके लिए राज्य स्तर पर व्यापक योजनाएँ तैयार करने और उन्हें धरातल पर उतारने की तुरंत आवश्यकता है।

AI और आधुनिक तकनीक से संस्कृत को मिलेगी नई वैश्विक पहचान
आज का युग कंप्यूटर, इंटरनेट और आधुनिक तकनीक का युग है, और राज्यपाल ने इस बात पर सबसे अधिक बल दिया। उन्होंने कहा कि यदि हमें अपनी इस प्राचीनतम भाषा को आज के आधुनिक दौर में प्रासंगिक बनाए रखना है और इसे आम जनमानस तक पहुँचाना है, तो हमें आधुनिक तकनीक का सहारा लेना ही होगा। वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी कंप्यूटर विज्ञान की नई तकनीकों के माध्यम से संस्कृत के प्रचार-प्रसार की असीम और अभूतपूर्व संभावनाएँ मौजूद हैं।

राज्यपाल ने इस विषय को विस्तार से समझाते हुए कहा कि यदि हम इन आधुनिक तकनीकों का सही और प्रभावी ढंग से उपयोग करें, तो संस्कृत भाषा में लिखे विशाल साहित्य, जटिल व्याकरण और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े गूढ़ विषयों को बहुत ही सरल, सुगम और आकर्षक रूप में दुनिया भर के लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन कोर्सेस, मोबाइल एप्लीकेशन और एआई टूल्स की मदद से दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति आसानी से संस्कृत भाषा सीख सकता है और इसके साहित्य पर शोध कर सकता है।

योग और आयुर्वेद के साथ संस्कृत भाषा का अटूट और गहरा संबंध
संस्कृत के साथ-साथ इस महत्वपूर्ण बैठक में योग और आयुर्वेद के व्यापक प्रचार-प्रसार पर भी बहुत गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया। उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने कहा कि संस्कृत, योग और आयुर्वेद – ये तीनों ही भारतीय जीवन शैली के तीन मुख्य और अटूट स्तंभ हैं। ये तीनों विधाएँ एक-दूसरे से पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं और इन्हें अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।

आयुर्वेद के जितने भी मूल ग्रंथ हैं, चाहे वह चरक संहिता हो या सुश्रुत संहिता, वे सभी मूल रूप से संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। इसी प्रकार योग का पूरा दर्शन, पतंजलि योग सूत्र और ध्यान की विधियाँ भी संस्कृत में ही वर्णित हैं। यदि हमें योग और आयुर्वेद के वास्तविक स्वरूप और उसके वैज्ञानिक आधार को सही तरीके से समझना है, तो हमें संस्कृत भाषा का मूल ज्ञान होना आवश्यक है। आज जब पूरी दुनिया उत्तम स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए योग और आयुर्वेद को अपना रही है, तब हमें इन तीनों प्राचीन विधाओं को एक साथ जोड़कर दुनिया के सामने प्रस्तुत करना होगा।

नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से जोड़ने के लिए नए प्रयासों की आवश्यकता
आज की युवा पीढ़ी तेजी से बदलती दुनिया और पश्चिमी प्रभाव के बीच अपनी मूल संस्कृति से दूर होती जा रही है। राज्यपाल ने इस बात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि युवाओं को अपनी पुरानी विरासत से जोड़ना आज के समय का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संकल्प होना चाहिए। इसके लिए हमें संस्कृत पढ़ाने के तरीकों में थोड़ा बदलाव लाना होगा और इसे आज के बच्चों के अनुकूल सरल और मनोरंजक बनाना होगा।

स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा की शिक्षा को केवल परीक्षा पास करने का जरिया नहीं बनाना चाहिए, बल्कि इसे आधुनिक विज्ञान, कंप्यूटर कोडिंग और व्यावहारिक जीवन से जोड़कर पढ़ाया जाना चाहिए। जब युवा यह समझ पाएंगे कि संस्कृत भाषा का ढाँचा पूरी तरह से वैज्ञानिक है और यह कंप्यूटर एल्गोरिदम के लिए सबसे उपयुक्त भाषा मानी जाती है, तो उनके मन में इस भाषा को सीखने के प्रति एक नया उत्साह और आकर्षण पैदा होगा।

स्वस्तिवाचनम् संस्था के कार्यों और सामाजिक सहयोग की सराहना
बैठक के समापन अवसर पर राज्यपाल ने स्वस्तिवाचनम् संस्था द्वारा संस्कृत, योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में किए जा रहे निस्वार्थ और निरंतर प्रयासों की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि अपनी संस्कृति और ज्ञान परंपरा को बचाने का कार्य केवल सरकार या प्रशासन अकेले नहीं कर सकता। इसके लिए सामाजिक संस्थाओं, विद्वानों और आम नागरिकों को एक साथ मिलकर आगे आना होगा।

आचार्य दिनेश चंद्र जोशी को समर्पित स्मारक डाक टिकट भेंट किए जाने की पहल को राज्यपाल ने एक बेहद ऐतिहासिक और सम्मानजनक कदम बताया। उन्होंने कहा कि जिन विद्वानों ने अपना पूरा जीवन संस्कृत भाषा के अध्ययन, अध्यापन और सेवा में समर्पित कर दिया, उन्हें इस प्रकार याद रखना और सम्मानित करना समाज का कर्तव्य है। यह पहल अन्य संस्थाओं और लोगों को भी अपनी भाषा के संवर्धन के लिए कार्य करने की प्रेरणा देगी।

एक नए और स्वर्णिम युग की शुरुआत की ओर बढ़ता कदम
राजभवन में आयोजित यह शिष्टाचार मुलाकात इस बात का स्पष्ट और ठोस प्रमाण है कि राज्य का शीर्ष नेतृत्व अपनी पौराणिक धरोहरों और प्राचीन ज्ञान प्रणालियों को सहेजने के लिए कितना अधिक गंभीर और प्रतिबद्ध है। उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का यह दृष्टिकोण कि प्राचीन परंपराओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाए, आने वाले समय में एक बहुत बड़े और दूरगामी परिवर्तन की नींव रख सकता है।

जब देवभूमि उत्तराखण्ड से संस्कृत, योग और आयुर्वेद को तकनीक के माध्यम से दुनिया भर में फैलाने की योजनाएँ धरातल पर उतरेंगी, तो इससे न केवल हमारे राज्य का मान-सम्मान बढ़ेगा, बल्कि पूरी दुनिया को भारतीय ज्ञान परंपरा का लाभ मिल सकेगा। अब वह समय आ चुका है जब हम संस्कृत को केवल पुरानी किताबों या धार्मिक अनुष्ठानों की भाषा न मानकर, इसे भविष्य के ज्ञान, विज्ञान और वैश्विक संवाद की भाषा के रूप में स्थापित करें।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments