उत्तराखण्ड स्टेट सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एण्ड गुड गवर्नेंस की शासी निकाय की बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य के सतत विकास, प्रशासनिक दक्षता और नीतिगत सुधारों को लेकर एक विस्तृत दिशानिर्देश जारी किया है। राजधानी देहरादून स्थित सचिवालय में संपन्न हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में राज्य की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों, दुर्गम क्षेत्रों की चुनौतियों और भविष्य की बढ़ती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नीति निर्माण प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बनाने पर बल दिया गया।
नीति निर्माण में शोध और नवाचार की भूमिका
राज्य के सर्वांगीण विकास के लिए केवल पारंपरिक योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय आधुनिक शोध, नवाचार और प्रभावी क्रियान्वयन की तकनीक को अपनाना समय की मांग है। मुख्यमंत्री ने बैठक को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक जमीनी हकीकत पर आधारित शोध निष्कर्षों का उपयोग सरकारी नीतियों के निर्माण में नहीं होगा, तब तक योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकता।
पहाड़ी राज्यों में विकास की राह मैदानी इलाकों से काफी भिन्न होती है। यहाँ की विषम भौगोलिक परिस्थितियाँ, प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम और संसाधनों की सीमित उपलब्धता जैसी चुनौतियाँ हमेशा बनी रहती हैं। ऐसे में किसी भी नीति को लागू करने से पहले उसके दूरगामी प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना अत्यंत आवश्यक है।
प्रशासनिक क्षमता और जिला स्तरीय प्रशिक्षण पर जोर
शासन-प्रशासन की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि निचले स्तर पर तैनात अधिकारी और कर्मचारी योजनाओं का संचालन किस प्रकार कर रहे हैं। इसी सोच के तहत मुख्यमंत्री ने जिला स्तर पर कार्यरत प्रशासनिक अधिकारियों के नियमित प्रशिक्षण और उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
जब तक जिला स्तर के अधिकारी आधुनिक प्रबंधन पद्धतियों और स्थानीय समस्याओं के समाधान की नई तकनीकों से अवगत नहीं होंगे, तब तक किसी भी बड़े नीतिगत बदलाव को धरातल पर उतारना कठिन होगा। क्षमता विकास के इन कार्यक्रमों से न केवल सरकारी मशीनरी की कार्यकुशलता बढ़ेगी, बल्कि आम जनता और प्रशासन के बीच संवाद और विश्वास भी मजबूत होगा।
मेधावी युवाओं को प्रोत्साहन और कैपस्टोन परियोजना
राज्य के नीतिगत शोध में युवाओं की ऊर्जा और उनके नए दृष्टिकोण को शामिल करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। बैठक में राज्य के प्रमुख विश्वविद्यालयों के प्रतिवर्ष दस स्नातकोत्तर छात्र-छात्राओं को विशेष कैपस्टोन परियोजना के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने की सहमति बनी है।
इस पहल के दूरगामी और सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे:
शोध को बढ़ावा: राज्य की प्राथमिकताओं वाले प्रमुख विषयों पर उच्च स्तरीय शोध को गति मिलेगी।
युवा भागीदारी: प्रदेश के प्रतिभाशाली युवाओं को राज्य के नीति निर्माण और गवर्नेंस के ढांचे को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
व्यावहारिक समाधान: अकादमिक जगत के ज्ञान का सीधे सरकारी योजनाओं और नीतियों की बेहतरी में उपयोग किया जा सकेगा।
स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के नए आयाम
बैठक के दौरान उपस्थित विशेषज्ञों और शासी निकाय के सदस्यों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। पहाड़ी क्षेत्रों की आर्थिकी को गति देने के लिए उच्च मूल्य और कम मात्रा वाले उत्पादों को बढ़ावा देने की रणनीति पर विशेष जोर दिया गया।
उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाकों में पारंपरिक कृषि और जड़ी-बूटी उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। यदि इन उत्पादों का प्रसंस्करण करके उन्हें बाजार में सही पहचान दिलाई जाए, तो कम लागत में अधिक लाभ कमाया जा सकता है। इसके साथ ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के ढांचे को मजबूत करने की बात भी कही गई, जो स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार का सबसे बड़ा जरिया बन सकते हैं।
पर्यटन के क्षेत्र में होम स्टे और स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। पर्वतीय गांवों में होम टूरिज्म के विस्तार से न केवल पर्यटकों को उत्तराखण्ड की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं का प्रत्यक्ष अनुभव मिलेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं को अपने ही गांव में सम्मानजनक रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे। इससे पहाड़ों से हो रहे पलायन पर भी काफी हद तक रोक लगाई जा सकेगी।
विकास के आठ मुख्य क्षेत्र और निरंतर मूल्यांकन
राज्य के भावी विकास को व्यवस्थित रूप देने के लिए विशेषज्ञों ने आठ प्रमुख सुधार क्षेत्रों की पहचान की है, जिन पर विस्तृत अध्ययन और शोध कराने का सुझाव दिया गया है। किसी भी योजना की सफलता केवल उसका बजट तय करने से नहीं होती, बल्कि उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका नियमित मूल्यांकन किया जा रहा है या नहीं।
विकास लक्ष्यों को समय पर हासिल करने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा:
वार्षिक लक्ष्य निर्धारण: प्रत्येक विभाग के लिए वार्षिक मॉनिटरिंग के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जाएंगे।
समयबद्ध समीक्षा: योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों का नियमित अंतराल पर मूल्यांकन किया जाएगा।
नीतिगत सुधार: समय-समय पर लागू नीतियों का परीक्षण कर उनकी उपयोगिता और प्रभावशीलता का आंकलन किया जाएगा, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनमें सुधार किया जा सके।
विकसित उत्तराखण्ड 2047 का रोडमैप
आगामी दशकों में राज्य की दिशा और दशा क्या होगी, इसके लिए एक दूरदर्शी रणनीति पर विचार-विमर्श किया गया। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के संकल्प के साथ कदम मिलाते हुए उत्तराखण्ड को भी हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का खाका तैयार किया जा रहा है।
इस दीर्घकालिक रणनीति में छह मुख्य स्तंभों को प्राथमिकता दी गई है:
आर्थिक विकास एवं रोजगार: स्थानीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके नए रोजगारों का सृजन करना।
मानव संसाधन एवं कल्याण: शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के स्तर में सुधार करके जन-जन का कल्याण सुनिश्चित करना।
वन, जैव विविधता एवं जलवायु अनुकूलन: पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास का संतुलन बनाना और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मुकाबला करना।
अवस्थापना विकास: सड़कों, डिजिटल नेटवर्क और बुनियादी सुविधाओं का सुदूर सीमांत क्षेत्रों तक विस्तार करना।
स्थानीय स्वशासन एवं क्षेत्रीय विकास: पंचायतों और स्थानीय निकायों को अधिक सशक्त बनाकर अंतिम छोर तक विकास पहुंचाना।
तकनीक आधारित सुशासन: सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और शीघ्रता लाने के लिए आधुनिक तकनीक का अधिकतम उपयोग करना।
सतत विकास लक्ष्यों में उत्तराखण्ड की मिसाल
बैठक में यह तथ्य विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि सतत विकास लक्ष्यों के क्रियान्वयन और उनकी प्रभावी निगरानी के मामले में उत्तराखण्ड ने देश के सभी हिमालयी राज्यों में पहला स्थान प्राप्त किया है। यूएससीपीपीजीजी और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के साझा प्रयासों से राज्य में सतत विकास के लक्ष्यों को स्थानीय स्तर पर लागू करने का काम तेजी से चल रहा है।
नीतियों के मूल्यांकन और राज्य की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर किए जा रहे नीतिगत अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि सही दिशा में उठाए गए कदम परिणाम लाते हैं। हिमालयी राज्य होने के नाते पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन उत्तराखण्ड ने इस दिशा में एक आदर्श स्थापित किया है।
विशेष पुस्तक का विमोचन
इस महत्वपूर्ण अवसर पर मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड की 25 वर्षों की विकास यात्रा पर आधारित एक विशेष पुस्तक का विमोचन भी किया। इस पुस्तक में राज्य के गठन से लेकर अब तक के ऐतिहासिक पड़ावों, हासिल की गई उपलब्धियों और विभिन्न क्षेत्रों में हुए उल्लेखनीय कार्यों का विस्तृत ब्यौरा दर्ज किया गया है। यह पुस्तक न केवल राज्य के विकास के इतिहास को समझने का एक प्रामाणिक माध्यम बनेगी, बल्कि भविष्य की योजनाओं के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज के रूप में भी काम करेगी।
मुख्यमंत्री ने शासी निकाय के सभी सदस्यों द्वारा दिए गए रचनात्मक सुझावों की सराहना करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे इन सभी सुझावों का गहराई से परीक्षण करें और जो भी सुझाव राज्य हित में उपयोगी हों, उन्हें तत्काल प्रभाव से योजनाओं में शामिल कर आवश्यक कार्यवाही शुरू करें।


