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उत्तराखण्ड में ‘धामी मॉडल’ की धूम: सीएम पुष्कर सिंह धामी के कठोर और ऐतिहासिक निर्णयों से सुरक्षित हो रहा राज्य का भविष्य

उत्तराखण्ड की खूबसूरत तराइयों में बसा खटीमा शहर हाल ही में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सांस्कृतिक समागम का साक्षी बना। तीन दिवसीय उत्तराखण्ड आदि रंगोत्सव के रंगारंग मंच ने न केवल देश भर की जनजातीय संस्कृतियों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया, बल्कि इसने राज्य के सीमांत और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों के सर्वांगीण विकास की एक नई पटकथा भी लिखी। केंद्र और राज्य सरकार की साझा प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धता का यह समागम इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि देश के सुदूर कोनों में बसे थारू, बोक्सा, जौनसारी और राजी जैसे समुदायों को अब विकास की मुख्यधारा में सबसे आगे रखने का संकल्प लिया जा चुका है। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम और केंद्रीय संसदीय व अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को एक नए राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भर दिया। यह केवल लोक कला और नृत्यों का उत्सव मात्र नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी प्रशासनिक और नीतिगत सोच का प्रकटीकरण था, जो जनजातीय पहचान को सम्मान देने के साथ-साथ उनके सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर को सशक्त बनाने के लिए पूरी तरह समर्पित है।

जनजातीय मामलों का अलग मंत्रालय: अटल बिहारी वाजपेयी के ऐतिहासिक निर्णय की याद
खटीमा की विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दूरदर्शी नेतृत्व को नमन किया। उन्होंने देश के जनजातीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण मोड़ को याद किया जब वर्ष 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने जनजातीय समुदायों के लिए एक सर्वथा पृथक मंत्रालय का गठन किया था। आजादी के पांच दशकों तक जनजातीय समाज के मुद्दे अन्य मंत्रालयों की फाइलों में दबे रहते थे और उनकी विशिष्ट समस्याओं की ओर ध्यान केंद्रित नहीं हो पाता था। पृथक जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्थापना ने नीतियों के निर्धारण से लेकर उनके क्रियान्वयन तक एक नई क्रांति की नींव रखी।

इस निर्णय का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि देश के अलग-अलग हिस्सों में फैली विभिन्न जनजातियों की विशिष्ट जरूरतों को समझकर उनके अनुकूल नीतियां बनाई जाने लगीं। उत्तराखण्ड के संदर्भ में थारू, बोक्सा, जौनसारी, भोटिया और राजी जैसे समुदायों के लिए विशेष योजनाएं तैयार की गईं। इस मंत्रालय के गठन के बाद से ही योजनाबद्ध तरीके से बजट आवंटन, शिक्षा के बुनियादी ढांचे का विस्तार, स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास और पारंपरिक शिल्पकला को प्रोत्साहन देने के मार्ग प्रशस्त हुए। अटल जी की इस दूरदर्शिता का ही परिणाम है कि आज दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाला जनजातीय समाज अपनी पहचान खोए बिना आधुनिक विकास की सीढ़ियां चढ़ रहा है।

शिक्षा के दीप से रोशन जनजातीय भविष्य: एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल
किसी भी समाज के सशक्तिकरण का सबसे सशक्त माध्यम शिक्षा ही होती है। खटीमा में आयोजित इस जनसभा के दौरान केंद्रीय मंत्री ने एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल की भूमिका पर विशेष जोर दिया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और केंद्र सरकार के साझा प्रयासों का परिणाम है कि खटीमा में एक आधुनिक और सर्वसुविधायुक्त एकलव्य विद्यालय आकार ले चुका है। यह विद्यालय केवल एक भवन मात्र नहीं है, बल्कि जनजातीय बच्चों के सपनों को उड़ान देने की एक सशक्त प्रयोगशाला है।

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने इस विद्यालय की व्यवस्थाओं को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए एक बड़ी वित्तीय घोषणा की है। भारत सरकार द्वारा खटीमा स्थित इस एकलव्य विद्यालय के विस्तार और वहां आधुनिक सुविधाएं जुटाने के लिए लगभग दस करोड़ रुपये की राशि खर्च की जाएगी। इसमें से करीब चार करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले नए छात्रवास का निविदा कार्य पूरा किया जा चुका है और बहुत जल्द इसका निर्माण कार्य भी धरातल पर शुरू होने वाला है।

इस आवासीय विद्यालय में छात्रों के रहने और पढ़ने के लिए बेहतरीन वातावरण तैयार किया जा रहा है:

कुल अध्ययन क्षमता: 480 विद्यार्थी।

बालकों के लिए क्षमता: 240 छात्र।

बालिकाओं के लिए क्षमता: 240 छात्राएं।

यह देखा गया है कि जनजातीय क्षेत्रों में बालिकाओं की शिक्षा दर में भौगोलिक और सामाजिक कारणों से गिरावट आ जाती थी। बालकों और बालिकाओं को बराबर स्थान देकर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि समाज का हर वर्ग समान रूप से आगे बढ़े।

खटीमा के इस एकलव्य विद्यालय ने शैक्षणिक गुणवत्ता के मामले में जो कीर्तिमान स्थापित किया है, वह बेहद प्रेरणादायक है। शत-प्रतिशत परीक्षा परिणाम हासिल करके इस विद्यालय के विद्यार्थियों ने साबित कर दिया है कि यदि सही अवसर और अनुकूल माहौल मिले, तो प्रतिभा किसी परिचय की मोहताज नहीं होती। खटीमा के साथ-साथ राज्य के अन्य जनजातीय बहुल क्षेत्रों जैसे बाजपुर, चकराता और देहरादून के कालसी क्षेत्र में संचालित एकलव्य विद्यालय भी इसी प्रकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का प्रकाश फैला रहे हैं। ये विद्यालय आने वाले समय में जनजातीय समाज से डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और कुशल पेशेवर तैयार करने की नर्सरी साबित होंगे।

उत्तराखण्ड की समृद्ध जनजातीय विविधता और भौगोलिक चुनौतियां
उत्तराखण्ड केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसकी असली ताकत इसकी अनूठी सांस्कृतिक विविधता में निहित है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्य की इस अद्वितीय धरोहर की सराहना करते हुए कहा कि यहाँ की जनजातीय विविधता राज्य की आत्मा है। उत्तराखण्ड की सीमाओं के भीतर मुख्य रूप से निम्नलिखित जनजातीय समुदाय सदियों से अपनी विशिष्ट जीवनशैली के साथ निवास कर रहे हैं:

थारू जनजाति: मुख्य रूप से उधम सिंह नगर और तराई के इलाकों में निवास करने वाला यह समाज अपनी अनूठी सांस्कृतिक व्यवस्था और प्रकृति-प्रेमी जीवनशैली के लिए जाना जाता है।

बोक्सा जनजाति: तराई और भाबर क्षेत्रों में बसे इस समुदाय की अपनी समृद्ध परंपराएं और लोक मान्यताएं हैं।

जौनसारी समाज: गढ़वाल के जौनसार-बावर क्षेत्र में निवास करने वाली यह जनजाति अपनी विशिष्ट वेशभूषा, अनूठे लोक नृत्यों और समृद्ध लोकगाथाओं के लिए प्रसिद्ध है।

राजी जनजाति: जिन्हें ‘बनरावत’ या ‘जंगल के राजा’ भी कहा जाता है, पिथौरागढ़ के सीमांत जंगलों और घाटियों में निवास करने वाली एक अत्यंत संवेदनशील और प्राचीन जनजाति है।

इन सभी समुदायों की अपनी बोलियां, पहनावा, खान-पान, पर्व-त्योहार और सामाजिक संरचनाएं हैं, जो उत्तराखण्ड की पहचान को एक अनूठा रंग प्रदान करती हैं। हालांकि, इन क्षेत्रों का विकास हमेशा से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण एक बड़ी चुनौती रहा है।

पूर्वोत्तर भारत से आने के कारण किरेन रिजिजू पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों की वास्तविक चुनौतियों को भली-भांति समझते हैं। उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और संकल्प शक्ति की जमकर तारीफ की। उत्तराखण्ड समय-समय पर भीषण प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलन, और विकट जन-जीवन जैसी चुनौतियों से जूझता रहता है। चाहे वह सिलक्यारा सुरंग में फंसी जिंदगियों को बचाने का कठिन अभियान हो या फिर आपदा प्रबंधन का त्वरित कार्य, मुख्यमंत्री ने अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व किया है। संकट की हर घड़ी में धैर्य, संवेदनशीलता और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देने वाले जनसेवक ही किसी प्रदेश को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकाल पाते हैं।

भगवान बिरसा मुंडा और जनजातीय गौरव दिवस: एक नई पहचान का दौर
वर्ष 2014 के बाद से देश में जनजातीय समाज के प्रति दृष्टिकोण में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। इतिहास के पन्नों में जिन महान जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को वह स्थान नहीं मिल पाया था जिसके वे हकदार थे, उन्हें अब राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को केंद्र सरकार द्वारा जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की ऐतिहासिक शुरुआत की गई।

इस पहल ने देश भर के जनजातीय समाज के भीतर अपनी महान विरासत और स्वाभिमान का एक नया भाव जगाया है। अब यह समाज स्वयं को उपेक्षित महसूस करने के बजाय देश के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखता है।

दुर्गम और अति-पिछड़े जनजातीय समूहों तक विकास की किरण पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने पीएम-जनमन (प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान) जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं। इस योजना का मुख्य उद्देश्य अंतिम छोर पर खड़े उस व्यक्ति तक पहुंचना है, जो दशकों से बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित पक्के कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जा रहा है:

अति-संवेदनशील जनजातीय बस्तियों तक पक्की सड़कों का निर्माण।

हर घर तक नल से स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता।

दूरस्थ क्षेत्रों में निर्बाध बिजली और मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी।

पक्के मकानों का निर्माण और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार।

यह अभियान केवल योजनाओं को कागजों पर लागू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन इंसानी जिंदगियों में वास्तविक बदलाव ला रहा है जो अब तक आधुनिक विकास की मुख्यधारा से कटे हुए थे।

सांस्कृतिक महासंगम: विकसित भारत 2047 की ओर एकजुट कदम
खटीमा का आदि रंगोत्सव केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि यह पूरे भारत की सांस्कृतिक एकता का एक जीवंत चित्र बन गया था। इस तीन दिवसीय आयोजन में देश के एक-दो नहीं, बल्कि एक दर्जन से अधिक राज्यों के जनजातीय कलाकारों ने हिस्सा लिया।

मंच पर जब विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने अपनी-अपनी पारंपरिक वेशभूषा में कदम रखा, तो ऐसा लगा मानो पूरा भारत खटीमा की धरती पर उतर आया हो। इस रंगोत्सव में शामिल प्रमुख राज्य और उनकी प्रस्तुतियां निम्नलिखित थीं:

उत्तराखण्ड: थारू और जौनसारी नृत्यों की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुतियां।

राजस्थान और मध्य प्रदेश: मरुभूमि और मध्य भारत की प्राचीन जनजातीय धुनों का जादू।

छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा: पूर्वी भारत की समृद्ध मांदल और ढोल की थाप पर आधारित लोक नृत्य।

अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम: पूर्वोत्तर की मनमोहक, शांत और प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज पारंपरिक कलाएं।

पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और हरियाणा: विविधता में एकता को दर्शाती सांस्कृतिक प्रस्तुतियां।

रंग-बिरंगे परिधानों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और ऊर्जा से भरपूर लोक नृत्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। यह इस बात का स्पष्ट संदेश था कि भारत की असली ताकत उसकी इस सांस्कृतिक विविधता में ही निहित है।

संसदीय कार्य मंत्री ने अपने संबोधन में देश के सभी जनजातीय समुदायों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों, भाषाओं, शिल्पकला और अनूठी परंपराओं को सहेजकर रखने का भावुक आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में अपनी पहचान को खोना नहीं है, बल्कि अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करते हुए आगे बढ़ना है।

भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक देश को एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने का जो लक्ष्य रखा है, वह तब तक अधूरा रहेगा जब तक देश का जनजातीय समाज इसमें बराबरी का भागीदार नहीं बनता। शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और तकनीकी कौशल के माध्यम से जब जनजातीय युवा सशक्त होंगे, तभी वे एक आत्मनिर्भर और सशक्त भारत की नींव को मजबूती प्रदान कर सकेंगे।

सामूहिक प्रतिबद्धता और जनभागीदारी का संदेश
उत्तराखण्ड आदि रंगोत्सव की सफलता के पीछे केवल केंद्रीय नेतृत्व ही नहीं, बल्कि राज्य के स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और आम जनता का अटूट सहयोग रहा। इस कार्यक्रम ने दर्शाया कि जब केंद्र, राज्य और स्थानीय प्रशासन एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो किस प्रकार के दूरगामी परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद गणमान्य व्यक्तियों ने इस बात पर सहमति जताई कि सीमांत क्षेत्रों का विकास केवल ढांचागत निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वहां के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना प्राथमिकता होनी चाहिए। केंद्रीय राज्य मंत्री और स्थानीय सांसदों की उपस्थिति ने यह भरोसा दिलाया कि खटीमा और आसपास के इलाकों की जो भी स्थानीय या क्षेत्रीय समस्याएं हैं, उनका समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा।

जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारियों की मुस्तैदी ने इस विशाल आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराया। हजारों की संख्या में पहुंचे स्थानीय लोगों और विशेष रूप से जनजातीय समुदाय के युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि वे अपने अधिकारों और विकास की नई दिशा को लेकर अत्यंत जागरूक हो चुके हैं।

खटीमा में संपन्न हुआ यह तीन दिवसीय आदि रंगोत्सव आने वाले समय के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। दस करोड़ रुपये की लागत से होने वाला एकलव्य विद्यालय का विस्तार केवल एक सरकारी घोषणा नहीं है, बल्कि यह उन सैकड़ों बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है जो आने वाले कल में देश का नेतृत्व करेंगे। सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और आधुनिक विकास के इस अद्भुत संतुलन से ही उत्तराखण्ड का यह सीमांत क्षेत्र सशक्तिकरण के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।

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