एसएसबी का ऑल-वुमन माउंट श्रीकंठ अभियान 2026 भारत की नारी शक्ति, अदम्य साहस और सीमा सुरक्षा बलों के अटूट संकल्प का एक नया स्वर्णिम अध्याय लिखने जा रहा है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित राजभवन परिसर से आयोजित एक भव्य और गरिमामय समारोह के दौरान राज्य के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने सशस्त्र सीमा बल की इस साहसी ऑल-वुमन पर्वतारोही टीम को राष्ट्रीय ध्वज और अभियान का प्रतीक सौंपकर औपचारिक रूप से रवाना किया।
यह पूरा आयोजन केवल एक पर्वतारोहण यात्रा का शुभारंभ भर नहीं है, बल्कि यह देश और दुनिया को यह स्पष्ट संदेश देता है कि भारत की बेटियां अब सीमाओं की चौकसी करने तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश के सबसे दुर्गम, चुनौतीपूर्ण और खतरनाक पर्वत शिखरों को फतेह करने के लिए पूरी तरह सक्षम और तत्पर हैं। राजभवन के इस विशेष कार्यक्रम में राज्यपाल ने अभियान दल के प्रत्येक सदस्य से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की, उनके मनोबल की सराहना की और हिमालय की दुर्गम चोटियों पर भारत का तिरंगा लहराने के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं। इस दल की प्रत्येक महिला सैनिक की आंखों में राष्ट्र सेवा, अनुशासन और हिमालय के शिखर को छूने का एक अद्भुत उत्साह दिखाई दे रहा था।
राज्यपाल ने बढ़ाया महिला पर्वतारोहियों का उत्साह
राजभवन के प्रांगण में आयोजित फ्लैग-ऑफ समारोह के दौरान राज्यपाल ने सीमा सुरक्षा बल की इस विशेष पहल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि जब सशस्त्र बलों की महिला जवान इस प्रकार के अत्यंत कठिन और साहसिक अभियानों का नेतृत्व संभालती हैं, तो यह केवल एक बल की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह पूरे देश की करोड़ों बेटियों के लिए एक महान प्रेरणा का स्रोत बनती है। पर्वतारोहण केवल एक शारीरिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह इंसानी शरीर, मस्तिष्क, धैर्य, दूरदर्शिता और अटूट अनुशासन की बेहद कड़ी परीक्षा होती है।
राज्यपाल ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि आज का भारत एक नई सोच, असीम ऊर्जा और मजबूत संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। भारतीय महिलाएं आज खेल के मैदान से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक और देश की सुरक्षा की अग्रिम पंक्तियों से लेकर हिमालय की बर्फीली चोटियों तक हर जगह अपनी काबिलियत का परचम लहरा रही हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के चुनौतीपूर्ण अभियानों से युवाओं में जोखिम उठाने, विपरीत परिस्थितियों में संयम बनाए रखने और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में बढ़-चढ़कर योगदान देने की भावना बलवती होती है।
माउंट श्रीकंठ की भौगोलिक स्थिति और गंभीर चुनौतियां
गढ़वाल हिमालय के उत्तरकाशी क्षेत्र में स्थित माउंट श्रीकंठ की गिनती देश और दुनिया की सबसे कठिन, जोखिम भरी और तकनीकी रूप से जटिल पर्वत चोटियों में की जाती है। समुद्र तल से लगभग 6,133 मीटर की विशाल ऊंचाई पर स्थित यह पर्वत अपनी अत्यधिक खड़ी ढलानों, जानलेवा बर्फीले तूफानों और अनिश्चित मौसम प्रणाली के लिए जाना जाता है। माउंट श्रीकंठ की चढ़ाई के दौरान ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ हवा में ऑक्सीजन का स्तर काफी कम हो जाता है, जिससे पर्वतारोहियों के लिए सांस लेना भी एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है।
इसके अतिरिक्त, इस पर्वत पर चलने वाली तेज बर्फीली हवाएं और शून्य से कई डिग्री नीचे गिरा हुआ तापमान किसी भी इंसान की शारीरिक और मानसिक क्षमता की अंतिम सीमा तक परीक्षा लेते हैं। इस पूरे मार्ग में गहरे हिमनद, खिसकने वाले बर्फ के तोदे और अदृश्य दरारें मौजूद रहती हैं, जो हर कदम पर बड़े खतरे का कारण बनती हैं। ऐसी विषम और जानलेवा परिस्थितियों में नया मार्ग बनाना, भारी-भरकम उपकरणों को ढोना और लगातार आगे बढ़ते रहना केवल और केवल उच्च स्तरीय प्रशिक्षण, मानसिक दृढ़ता और अनुशासन से ही संभव हो सकता है।
अभियान दल की संरचना और सदस्यों की विशेषताएं
इस ऐतिहासिक और साहसिक अभियान की योजना बेहद पेशेवर और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार की गई है। इस पूरे दल में कुल 10 अत्यंत अनुशासित और दक्ष सदस्य शामिल हैं। अभियान की मुख्य रीढ़ सशस्त्र सीमा बल की 7 जांबाज महिला पर्वतारोही हैं, जिन्होंने देश के अग्रणी पर्वतारोहण संस्थानों से बेसिक और एडवांस्ड पर्वतारोहण पाठ्यक्रमों में उत्कृष्ट सफलता हासिल की है। इन महिला जवानों के पास कठिन से कठिन चट्टानों पर चढ़ने, बर्फ में रास्ता बनाने और विषम परिस्थितियों में जीवित रहने का व्यापक अनुभव है।
दल की सुरक्षा, तकनीकी मार्गदर्शन और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने के लिए सशस्त्र सीमा बल के ग्वालदम स्थित काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल से 3 बेहद अनुभवी और कुशल सहयोगी पर्वतारोहियों को शामिल किया गया है। ये सहयोगी सदस्य मुख्य रूप से मार्ग निर्धारण, आपातकालीन चिकित्सा सहायता, रस्सियों को बांधने और भारी साजो-सामान के प्रबंधन में महिला पर्वतारोहियों की मदद करेंगे, जिससे अभियान की सफलता और सभी सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
कड़ा प्रशिक्षण दौर और वैज्ञानिक तैयारियां
हिमालय के 6,133 मीटर ऊंचे शिखर को छूने की तैयारी रातों-रात नहीं होती। इसके लिए इस दल के सभी सदस्यों को कई महीनों के बेहद कड़े, अनुशासित और शारीरिक रूप से थका देने वाले प्रशिक्षण दौर से गुजरना पड़ा है। ग्वालदम, औली और उत्तरकाशी के उच्च पर्वतीय इलाकों में इन जवानों ने सहनशक्ति बढ़ाने, भारी वजन उठाकर चढ़ाई करने और शून्य से नीचे के तापमान में बिना रुके काम करने का अभ्यास किया।
प्रशिक्षण के दौरान जवानों को अचानक आने वाले बर्फीले तूफानों से बचाव, हिमस्खलन की स्थिति में जीवित रहने के उपाय, उच्च पर्वतीय बीमारियों के लक्षण पहचानने और उनका तत्काल उपचार करने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही, सैटेलाइट संचार उपकरणों का सटीक संचालन और पूरी टीम के बीच त्वरित संवाद स्थापित करने की कला भी सिखाई गई। मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए टीम को योग, ध्यान और समूह गतिविधियों में व्यस्त रखा गया ताकि किसी भी संकट के समय पूरी टीम एक मजबूत इकाई के रूप में काम कर सके।
अभियान की विस्तृत समय-सीमा और कार्ययोजना
सशस्त्र सीमा बल का यह साहसिक अभियान 17 सितंबर से औपचारिक रूप से प्रारंभ हो चुका है और यह अक्टूबर के पहले सप्ताह तक जारी रहेगा। इस पूरे अभियान को कई चरणबद्ध और रणनीतिक भागों में विभाजित किया गया है ताकि किसी भी दुर्घटना से बचा जा सके और शिखर तक सफलतापूर्वक पहुंचा जा सके:
प्रारंभिक प्रस्थान एवं बेस कैंप यात्रा: 17 सितंबर से दल अपने मुख्य प्रस्थान बिंदु से आगे बढ़ेगा और उत्तरकाशी क्षेत्र के अंतिम सड़क मार्ग से पैदल यात्रा शुरू करते हुए अपने मुख्य आधार शिविर की ओर प्रस्थान करेगा।
वातावरण अनुकूलन का चरण: आधार शिविर पहुंचने के पश्चात पर्वतारोही तुरंत चढ़ाई शुरू नहीं करेंगे। वे कुछ दिनों तक उच्च ऊंचाई वाले इलाके में रहकर अपने शरीर को वहां के कम ऑक्सीजन और अत्यधिक ठंडे वातावरण के अनुकूल ढालने का प्रयास करेंगे।
एडवांस्ड कैंप की स्थापना: अनुकूलन प्रक्रिया पूरी होने के बाद दल धीरे-धीरे पर्वत की ढलानों पर कैंप-1 और कैंप-2 की स्थापना करेगा और आवश्यक राशन तथा सुरक्षा उपकरण ऊपर पहुंचाएगा।
अंतिम शिखर चढ़ाई: 3 अक्टूबर से 6 अक्टूबर के बीच जब मौसम सबसे अधिक अनुकूल और साफ रहने की संभावना होगी, तब दल का मुख्य प्रहार समूह आधार शिविर से अंतिम चढ़ाई शुरू करेगा और 6,133 मीटर ऊंचे माउंट श्रीकंठ के शिखर पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज और सशस्त्र सीमा बल का ध्वज फहराएगा।
विशेष अवसर और नई राष्ट्र चेतना का संदेश
राजभवन में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि यह अभियान एक बेहद शुभ और विशेष अवसर पर शुरू हो रहा है, जो देश के निर्माण और नई राष्ट्र चेतना का प्रतीक है। आज का भारत किसी भी चुनौती के सामने झुकने को तैयार नहीं है और देश के सुरक्षा बल इस नई सोच की अगुवाई कर रहे हैं।
यह ऑल-वुमन अभियान देश की सभी महिलाओं को यह भरोसा दिलाता है कि अगर संकल्प मजबूत हो तो दुनिया की कोई भी ऊंचाई या बाधा उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। सीमा सुरक्षा बल द्वारा आयोजित यह साहसिक गतिविधि देश भक्ति, अदम्य साहस, समर्पण और अनुशासन का एक अनूठा संगम है जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का काम करेगा।
सुरक्षा, अनुशासन और टीम भावना का महत्व
पर्वतारोहण की दुनिया में यह सर्वमान्य नियम है कि शिखर तक पहुंचना केवल आधी सफलता होती है; असली सफलता तब मानी जाती है जब पूरी टीम सुरक्षित और सकुशल वापस अपने आधार शिविर लौट आए। राज्यपाल ने अभियान दल को संबोधित करते हुए कहा कि वे पहाड़ों के विशाल रूप और मौसम के मिजाज का हमेशा सम्मान करें और अपनी सुरक्षा के साथ कभी कोई समझौता न करें।
अटूट टीम भावना: पर्वतारोहण में व्यक्तिगत पराक्रम के स्थान पर सामूहिक प्रयास की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। एक सदस्य की गति और सुरक्षा पूरी टीम से जुड़ी होती है।
त्वरित निर्णय लेने की क्षमता: पहाड़ों पर मौसम सेकंडों में बदलता है। ऐसी स्थिति में टीम लीडर द्वारा लिया गया सही और त्वरित फैसला जीवन रक्षा के लिए निर्णायक साबित होता है।
सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन: चढ़ाई के दौरान सुरक्षा रस्सियों, कुल्हाड़ी, क्रैम्पॉन्स और अन्य तकनीकी उपकरणों का उपयोग निर्धारित मानकों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
उच्च अधिकारियों की उपस्थिति और गरिमामय वातावरण
राजभवन के इस विशेष फ्लैग-ऑफ समारोह में शासन, प्रशासन और सशस्त्र सीमा बल के अनेक उच्च पदस्थ अधिकारी उपस्थित रहे। सशस्त्र सीमा बल के महानिदेशक संजय सिंघल, उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ, गढ़वाल मंडल के आयुक्त आनंद स्वरूप तथा महानिरीक्षक (प्रशिक्षण) संजीव शर्मा सहित कई अन्य अधिकारियों ने कार्यक्रम में सहभागिता की।
कार्यक्रम में मौजूद सभी वरिष्ठ अधिकारियों, प्रशिक्षकों और अतिथियों ने कर्तल ध्वनि से महिला पर्वतारोहियों के दल का उत्साहवर्धन किया। अधिकारियों ने विश्वास व्यक्त किया कि सभी सदस्यों का कड़ा प्रशिक्षण, अनुशासन और आत्मविश्वास इस अभियान को ऐतिहासिक सफलता दिलाएगा और यह दल भारत के खेल व साहसिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगा।
भारतीय महिलाओं का सशक्त भविष्य और प्रेरणादायी संदेश
यह ऑल-वुमन अभियान इस बात का निर्विवाद प्रमाण है कि भारतीय समाज और हमारे सशस्त्र बलों में महिलाओं की भूमिका कितनी तेजी से और किस सकारात्मक दिशा में बदल रही है। आज की भारतीय नारी केवल घरेलू या पारंपरिक जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह रक्षा, सुरक्षा, अंतरिक्ष, खेल और साहसिक अभियानों के हर मोर्चे पर देश का नेतृत्व कर रही है।
माउंट श्रीकंठ की 6,133 मीटर ऊंची बर्फीली चोटी को फतेह करने का यह प्रयास देश के दूर-दराज के गांवों और कस्बों में रहने वाली उन लाखों लड़कियों के लिए एक प्रेरणा पुंज बनेगा जो जीवन में बड़े सपने देखती हैं। यह अभियान उन्हें यह विश्वास दिलाएगा कि मेहनत, समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर हर असंभव दिखने वाले लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। जब यह दल माउंट श्रीकंठ के शिखर पर भारत का तिरंगा फहराकर सुरक्षित वापस लौटेगा, तो वह अपने साथ केवल एक विजय गाथा नहीं लाएगा, बल्कि भारत की नारी शक्ति की अमर गाथा भी लिखेगा।


