किसी भी जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी समावेशिता होती है। जब तक देश का अंतिम नागरिक, चाहे वह किसी भी शारीरिक स्थिति, उम्र या दूरस्थ भौगोलिक परिवेश में जीवन यापन कर रहा हो, चुनावी प्रक्रिया में अपनी आवाज दर्ज कराने में सक्षम नहीं होता, तब तक लोकतंत्र का ताना-बाना पूर्ण नहीं माना जा सकता। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित करना हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील दायरा रहा है।
इसी संवैधानिक संकल्प को धरातल पर उतारते हुए उत्तराखंड के देहरादून जिले में जिला निर्वाचन अधिकारी डॉ. आशीष चौहान के मार्गदर्शन में मतदाता जागरूकता का एक विशाल और जन-सरोकारी अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान का मुख्य मकसद समाज के उन वर्गों तक सीधे पहुंचना है, जो अक्सर भौगोलिक या शारीरिक अवरोधों के कारण निर्वाचन प्रणाली की मुख्यधारा से पीछे छूट जाते हैं। शुक्रवार को देहरादून के मोहनी रोड स्थित ‘रेफल होम’ में आयोजित विशेष कार्यक्रम इसी कड़ी का एक अत्यंत संवेदनशील और प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया, जहां दिव्यांगजनों को लोकतंत्र के प्रति जागरूक करते हुए शत-प्रतिशत मतदान की शपथ दिलाई गई।
स्वीप अभियान का मुख्य उद्देश्य और लक्षित समूह
देहरादून जिले में संचालित स्वीप यानी व्यवस्थित मतदाता शिक्षा और चुनावी सहभागिता कार्यक्रम के तहत समाज के प्रत्येक वर्ग को मतदान की अहमियत समझाने के लिए विशेष रणनीतियां बनाई गई हैं। 08 अक्टूबर से शुरू हुए इस सघन अभियान के माध्यम से विशेष रूप से तीन प्रमुख समूहों को केंद्र में रखा गया है: दिव्यांगजन, वयोवृद्ध या वरिष्ठ नागरिक और दूरस्थ तथा दुर्गम इलाकों में बसे जनजातीय समुदाय।
जिला समाज कल्याण अधिकारी और दिव्यांगजन नोडल अधिकारी दीपांकर घिल्डियाल के नेतृत्व में यह अभियान गांव-गांव और संस्था-संस्था तक पहुंच रहा है। विशेष रूप से बुक्सा जनजाति के 46 गांवों में चलाया जा रहा यह अभियान इस बात का प्रमाण है कि निर्वाचन आयोग का लक्ष्य केवल आंकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि हर एक नागरिक के भीतर मताधिकार के सम्मान और अधिकार की भावना को जगाना है। जब समाज का हर व्यक्ति यह महसूस करने लगता है कि उसकी एक उंगली का निशान देश के भविष्य की दिशा तय कर सकता है, तभी वास्तव में एक मजबूत जनतंत्र का निर्माण होता है।
रेफल होम में आयोजित जागरूकता शिविर की मुख्य गतिविधियां
रेफल होम में आयोजित जागरूकता शिविर केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह एक संवेदनशील संवाद का माध्यम बना। शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़कर जब दिव्यांग नागरिक मतदान प्रक्रिया की बारिकियों को समझ रहे थे, तब वहां मौजूद अधिकारियों और संस्था के कर्मचारियों के बीच एक अनोखा उत्साह देखने को मिला। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित दिव्यांगजनों को बहुत ही आसान और सुलभ भाषा में पूरी निर्वाचन प्रक्रिया समझाई गई। उन्हें बताया गया कि किस तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का उपयोग किया जाता है, वीवीपीएटी पर्ची कैसे काम करती है और मतदान केंद्र पर उनके लिए क्या विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। कई बार जानकारी के अभाव या मतदान केंद्रों तक पहुंचने की व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण दिव्यांगजन अपने इस बहुमूल्य अधिकार से वंचित रह जाते हैं। इस कार्यक्रम का मुख्य ध्येय इसी झिझक और अज्ञानता को पूरी तरह समाप्त करना था।
दिव्यांगजनों को समाज का प्रेरणास्रोत बनाने की पहल
इस अवसर पर नोडल अधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रशासन का लक्ष्य केवल दिव्यांगजनों को मतदान केंद्र तक पहुंचाना ही नहीं है, बल्कि उन्हें समाज के अन्य लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बनाना भी है। रेफल होम के निवासियों को प्रेरित किया गया कि वे न केवल आगामी चुनाव में खुद बूथ पर जाकर अपना वोट डालें, बल्कि अपने आसपास के पड़ोसियों, परिजनों और दोस्तों को भी मतदान के प्रति जागरूक करें। जब समाज का एक दिव्यांग नागरिक पूरी निष्ठा और उत्साह के साथ अपने अधिकार का प्रयोग करता है, तो वह पूरे समाज के लिए एक सशक्त संदेश देता है कि कोई भी बाधा नागरिक कर्तव्य के आड़े नहीं आ सकती। इस अवसर पर सुश्री प्रिया लाल, सुश्री पूनम चमोली, श्री पुष्पेंद्र और श्री प्रज्वल समेत संस्था के तमाम प्रमुख लोग उपस्थित रहे, जिन्होंने इस जन-जागरूकता को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
सुगम निर्वाचन हेतु प्रशासनिक सुविधाएं और सुधार
भारत में दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए निर्वाचन प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। निर्वाचन आयोग ने ‘सुगम निर्वाचन’ की अवधारणा को साकार करने के लिए नीतिगत स्तर पर कई बड़े सुधार किए हैं। आज मतदान केंद्रों पर रैंप निर्माण, व्हीलचेयर की उपलब्धता, ब्रेल लिपि युक्त बैलेट पेपर और मतदान केंद्र तक लाने-ले जाने के लिए विशेष परिवहन सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, गंभीर रूप से अस्वस्थ या अत्यधिक बुजुर्ग नागरिकों के लिए घर से ही मतदान यानी होम वोटिंग की सुविधा भी विकसित की गई है। यह व्यवस्था इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि राज्य अपने प्रत्येक नागरिक के वोट का मूल्य समझता है। देहरादून में चल रहा यह अभियान इन्हीं व्यवस्थाओं की जानकारी को जन-जन तक पहुंचा रहा है ताकि कोई भी पात्र मतदाता जानकारी की कमी के कारण अपने अधिकार का उपयोग करने से न चूके।
जनजातीय क्षेत्रों में लोकतांत्रिक सहभागिता का विस्तार
दूसरी ओर, बुक्सा जनजाति के 46 गांवों में चलाया जा रहा सघन अभियान समावेशी लोकतंत्र का एक और महत्वपूर्ण पहलू उजागर करता है। जनजातीय क्षेत्र अक्सर मुख्यधारा के सूचना तंत्र से थोड़ा दूर रह जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में जाकर लोगों को स्थानीय भाषा और बोलचाल में मतदान का महत्व समझाना एक दूरगामी प्रशासनिक प्रयास है। जब जनजातीय समाज के लोग चुनाव प्रक्रिया में खुलकर हिस्सा लेते हैं, तो शासन प्रणाली में उनकी समस्याओं, उनकी मांगों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को सही प्रतिनिधित्व मिलता है। यह प्रक्रिया केवल वोट डालने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह उन्हें राष्ट्र-निर्माण की मुख्यधारा में बराबरी का दर्जा देती है।
शत-प्रतिशत मतदान का सामाजिक एवं प्रशासनिक महत्व
लोकतंत्र में शत-प्रतिशत मतदान केवल एक आंकड़ा या चुनावी सफलता का पैमाना नहीं है, बल्कि यह देश के नागरिकों की सजगता और जिम्मेदारी का दर्पण होता है। जब कोई मतदाता अपने घर से निकलकर बूथ तक जाता है, तो वह केवल एक बटन नहीं दबाता, बल्कि वह स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रोजगार और अपनी आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षा चक्र को तय करता है। यदि समाज का कोई भी वर्ग, चाहे वह दिव्यांग हो या दुर्गम इलाके का निवासी, चुनाव से दूर रहता है, तो जनमत का वह प्रतिनिधित्व अधूरा रह जाता है। इसीलिए इस प्रकार के जागरूकता अभियानों का सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर अत्यधिक व्यापक प्रभाव पड़ता है। यह अभियान लोगों में यह विश्वास पैदा करता है कि उनकी आवाज मायने रखती है और उनकी पसंद देश की दिशा बदल सकती है।
देहरादून जिले का अनुकरणीय प्रशासनिक मॉडल
आगामी चुनावों के दृष्टिकोण से देखें तो देहरादून जिले का यह स्वीप कार्यक्रम अन्य जिलों के लिए भी एक रोल मॉडल की तरह सामने आ रहा है। अधिकारियों का यह प्रयास कि अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक खुद पहुंचा जाए, प्रशासनिक जवाबदेही को दर्शाता है। समाज के प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक संगठनों और मीडिया का भी यह दायित्व बनता है कि वे प्रशासन के इन सुगम प्रयासों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। जब प्रशासन और जनता हाथ से हाथ मिलाकर इस महापर्व में उतरते हैं, तो चुनावी प्रक्रिया केवल राजनीतिक गतिविधि न रहकर एक सामाजिक उत्सव का रूप ले लेती है।
उज्ज्वल लोकतांत्रिक भविष्य का संकल्प
रेफल होम में दिव्यांग भाई-बहनों के चेहरे पर दिखी उत्सुकता और उनका लोकतंत्र के प्रति बढ़ा विश्वास इस बात का संकेत है कि आने वाले चुनावों में देहरादून जिला शत-प्रतिशत मतदान के आंकड़े की ओर मजबूती से कदम बढ़ा रहा है। यह जागरूकता अभियान केवल एक दिन का आयोजन नहीं है, बल्कि यह उस मजबूत सोच की शुरुआत है जहां हर नागरिक बिना किसी भेदभाव, कठिनाई या हिचकिचाहट के अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने के लिए तत्पर रहेगा। जब हर हाथ में वोट की शक्ति होगी और हर नागरिक का संकल्प मजबूत होगा, तभी हमारा लोकतंत्र अपनी वास्तविक ऊंचाइयों को छू सकेगा।


