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कुमाऊं मंडल में भारी बारिश को लेकर एक्शन में आयुक्त दीपक रावत, आपदा कंट्रोल रूम और विभागीय टीमों को किया हाई अलर्ट

कुमाऊं मंडल में भारी बारिश का अलर्ट: कुमाऊं मंडल में भारी बारिश का अलर्ट जारी होने के बाद से ही पूरा प्रशासनिक अमला पूरी तरह मुस्तैद हो चुका है। मौसम विभाग द्वारा पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के लिए जारी की गई चेतावनी के बाद जनजीवन पर पड़ने वाले संभावित असर को देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। कुमाऊं आयुक्त एवं सचिव मुख्यमंत्री दीपक रावत ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए मंडल के अंतर्गत आने वाले सभी छह जनपदों के जिलाधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। प्रशासन की प्राथमिकता यही है कि किसी भी प्रकार की आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए पूर्व तैयारी में कोई कसर न छोड़ी जाए, ताकि आम जनता की
जान-माल की रक्षा हर हाल में सुनिश्चित की जा सके।

भौगोलिक दृष्टि से कुमाऊं का इलाका बेहद संवेदनशील माना जाता है। मानसून के दिनों में यहाँ अचानक होने वाली मूसलाधार बारिश अपने साथ कई तरह की चुनौतियां लेकर आती है। पहाड़ी रास्तों पर दरकते पहाड़, नदियों का बढ़ता जलस्तर और संपर्क मार्गों का टूटना आम बात हो जाती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उच्च स्तर पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि आपदा प्रबंधन से जुड़ी तमाम व्यवस्थाओं को ज़मीन पर उतार दिया गया है। जब भी मौसम का मिजाज बिगड़ता है, तब सबसे ज्यादा जरूरत त्वरित सूचना और तुरंत कार्रवाई की होती है। इसी रणनीति के तहत प्रशासन ने अपनी पूरी मशीनरी को चौबीसों घंटे सक्रिय मोड में रख दिया है।

मौसम की बदलती गतिविधियों को देखते हुए सभी संबंधित विभागों के अधिकारियों की छुट्टियां रद्द करने जैसी स्थिति बन गई है और उन्हें अपने-अपने मुख्यालयों में बने रहने की हिदायत दी गई है। पर्वतीय जिलों में बारिश के कारण पैदा होने वाले हालातों से निपटने के लिए जिला से लेकर स्थानीय स्तर तक संवाद का तंत्र स्थापित किया गया है। स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा ही इस पूरी कसरत का केंद्र बिंदु है, जिसके लिए सरकार और प्रशासन मिलकर काम कर रहे हैं।

आपदा प्रबंधन तंत्र पूरी तरह सक्रिय
कुमाऊं मंडल में भारी बारिश का अलर्ट सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्थाओं की असली परीक्षा का समय भी होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए आपदा प्रबंधन तंत्र को निचले स्तर तक मजबूत किया जा रहा है। आयुक्त ने नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों के जिलाधिकारियों को सीधे तौर पर हिदायत दी है कि आपदा नियंत्रण कक्ष चौबीसों घंटे चालू रहने चाहिए। केवल जिला मुख्यालय ही नहीं, बल्कि तहसील और विकासखंड स्तर तक बने कंट्रोल रूम में अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती सुनिश्चित की गई है।

सूचना का त्वरित आदान-प्रदान किसी भी आपदा के समय सबसे बड़ी ताकत बनता है। अगर किसी दूरस्थ इलाके में पहाड़ी खिसकती है या जलस्तर बढ़ता है, तो उसकी खबर तुरंत मुख्य नियंत्रण कक्ष तक पहुँचनी चाहिए ताकि बिना समय गंवाए राहत दल रवाना किए जा सकें। इसके लिए दूरसंचार व्यवस्था को दुरुस्त रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इसके अलावा, विभिन्न विभागों के बीच तालमेल बैठाना बेहद जरूरी होता है। अक्सर देखा गया है कि आपदा के समय रास्ते बंद होने से राहत सामग्री पहुँचने में देरी हो जाती है। इस समस्या के समाधान के लिए सड़कों की देखरेख करने वाली सभी एजेंसियों को मुस्तैद रहने को कहा गया है। चाहे लोक निर्माण विभाग हो, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण हो या फिर ग्रामीण सड़कों की देखरेख करने वाली संस्थाएं, सभी को स्पष्ट निर्देश हैं कि जहां भी भूस्खलन की संभावना हो, वहां भारी मशीनें पहले से तैनात रखी जाएं।

आपदा की स्थिति में पानी और बिजली की आपूर्ति बाधित होना एक आम समस्या है। इससे निपटने के लिए जल संस्थान और विद्युत विभाग को तैयार रहने को कहा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में सेवाओं को जल्द से जल्द बहाल किया जा सके। बुनियादी सुविधाओं का ठप होना आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है, इसलिए त्वरित मरम्मत दलों को औजारों और आवश्यक उपकरणों के साथ तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं।

कंट्रोल रूम की सक्रियता: जिला, तहसील और ब्लॉक स्तर पर चौबीसों घंटे कर्मचारियों की मुस्तैदी।
सड़क मार्ग सुरक्षा: संवेदनशील और भूस्खलन संभावित रास्तों पर भारी जेसीबी मशीनों की अग्रिम तैनाती।
बुनियादी सेवाएं: पेयजल और विद्युत आपूर्ति बाधित होने पर तुरंत मरम्मत के लिए विशेष टीमों का गठन।
आपदा दल की तैनाती: राज्य और राष्ट्रीय आपदा राहत बलों को किसी भी आपात स्थिति के लिए सतर्क रखा गया है।

संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी और राहत की तैयारी
कुमाऊं मंडल में भारी बारिश का अलर्ट सबसे ज्यादा उन लोगों के लिए चिंता का विषय बनता है जो नदियों, बरसाती नालों और भूस्खलन संभावित ढलानों के आसपास रहते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में नदियां और गधेरे बहुत तेजी से उफान पर आते हैं, जिससे आसपास के रिहायशी इलाकों के लिए खतरा पैदा हो जाता है। इसी खतरे को देखते हुए प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों की पहचान करके वहां विशेष चौकसी बरतने के आदेश दिए हैं।

आयुक्त ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जहां भी नदियों का जलस्तर खतरे के निशान के पास पहुँचे या पहाड़ों से पत्थर गिरने की आशंका हो, वहां से आबादी को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने में बिल्कुल भी देरी न की जाए। समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों जैसे सरकारी स्कूलों, सामुदायिक भवनों या राहत शिविरों में पहुँचाना प्राथमिकता होना चाहिए। आपदा के समय एक-एक मिनट की कीमत होती है, इसलिए प्रशासनिक टीमों को लगातार क्षेत्रों का दौरा करने को कहा गया है।

राहत और बचाव कार्यों के संचालन के लिए स्थानीय प्रशासन को राशन, पीने का साफ पानी, दवाइयां और तिरपाल जैसी जरूरी चीजों का पर्याप्त स्टॉक तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं। अगर कोई गांव मुख्य मार्ग से कट भी जाता है, तो भी वहां आवश्यक वस्तुओं की किल्लत नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग को भी अलर्ट पर रखा गया है ताकि किसी भी चिकित्सीय आपात स्थिति में घायलों या बीमारों को तुरंत इलाज मिल सके।

प्रशासन की योजना यह है कि खतरे की आहट मिलते ही बचाव कार्य शुरू कर दिए जाएं, न कि दुर्घटना होने का इंतजार किया जाए। इसके लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्राम प्रधानों के साथ भी लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है। स्थानीय लोग अपनी भौगोलिक स्थिति को बेहतर ढंग से समझते हैं, इसलिए उनकी मदद से स्थिति पर काबू पाना काफी आसान हो जाता है।

जोखिम वाले इलाकों की पहचान: नदी-नालों के किनारे और दरकते पहाड़ों के नीचे बसे मकानों का त्वरित सर्वेक्षण।
सुरक्षित निकासी योजना: खतरा महसूस होते ही प्रभावित परिवारों को निकटतम राहत शिविरों में स्थानांतरित करना।
आवश्यक सामग्री का भंडारण: दूरस्थ क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न, दवाइयों और सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता।
चिकित्सा दल मुस्तैद: एम्बुलेंस और डॉक्टर टीमों को हाई अलर्ट पर रखना ताकि आपात समय में तुरंत इलाज मिले।

आम जनता से सावधानी और सतर्कता की अपील
कुमाऊं मंडल में भारी बारिश का अलर्ट जारी होने के बाद जहां एक तरफ प्रशासनिक अमला अपनी तैयारियों में जुटा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिकों का सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। शासन और प्रशासन की ओर से लोगों से बार-बार यही आग्रह किया जा रहा है कि वे इस मौसम में पूरी तरह सतर्क रहें और किसी भी तरह का अनावश्यक जोखिम न उठाएं।

पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम का मिजाज बदलते देर नहीं लगती। धूप खिली होने के बाद भी अचानक ऊपरी इलाकों में तेज बारिश शुरू हो सकती है, जिससे निचले इलाकों के बरसाती नालों में अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए आयुक्त ने आम जनता से अपील की है कि जब तक बहुत ज्यादा जरूरी न हो, वे यात्रा करने से बचें। खासकर रात के समय पहाड़ों में सफर करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि ऐसे समय में भूस्खलन या रास्ते बंद होने का पता आसानी से नहीं चल पाता।

नदियों और उफनते गधेरों को पार करने की होड़ अक्सर जानलेवा साबित होती है। कई बार लोग पानी के तेज बहाव का सही अंदाजा नहीं लगा पाते और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। प्रशासन ने साफ तौर पर कहा है कि उफनती नदियों या पुलियों के ऊपर से पानी बहने की स्थिति में रास्ते को पार करने का प्रयास न करें। सुरक्षित स्थान पर रुककर जलस्तर कम होने का इंतजार करना ही समझदारी है।

इसके अलावा, नागरिकों से यह भी कहा गया है कि वे केवल आधिकारिक माध्यमों से मिलने वाली सूचनाओं और मौसम विभाग की चेतावनियों पर ही भरोसा करें। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों से बचें और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत स्थानीय आपदा कंट्रोल रूम या पुलिस को सूचित करें। जनता का संयम और सतर्कता ही प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में सबसे बड़ा हथियार साबित होता है।

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