कुमाऊं की पावन भूमि केवल अपनी प्राकृतिक छटा और दुर्गम पर्वतीय भूगोल के लिए ही पूरी दुनिया में नहीं जानी जाती, बल्कि यह राज्य अपनी अनूठी लोक संस्कृति, समृद्ध आध्यात्मिक चेतना और स्वाभिमानी जनमानस के लिए एक विशिष्ट पहचान रखता है। हाल ही में हल्द्वानी के धरातल पर आयोजित ‘कुमाऊं द्वार महोत्सव’ केवल एक सांस्कृतिक मंच मात्र नहीं था, बल्कि यह पर्वतीय समाज की लोक कलाओं के संरक्षण, राज्य की अस्मिता की रक्षा और पारदर्शी सुशासन के प्रति प्रशासनिक प्रतिबद्धता का एक जीवंत प्रतीक बनकर उभरा।
हल्द्वानी में आयोजित भव्य ‘कुमाऊं द्वार महोत्सव’ में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। समारोह में पधारे जनसमूह का आत्मीय अभिनंदन करते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य की समृद्ध लोक कलाओं, देवतुल्य परंपराओं और धरोहरों को सहेजने के लिए आयोजकों के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कुमाऊं का प्रवेश द्वार हल्द्वानी न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्वतीय संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र भी है। यह मंच हमारी पारंपरिक जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान को एक नया आयाम देता है। महोत्सव में उमड़ी भारी भीड़ इस बात का जीवंत प्रमाण है कि उत्तराखंड के लोग आज भी अपनी जड़ों और समृद्ध विरासत से पूरी आत्मीयता से जुड़े हुए हैं।
लोक संस्कृति का संरक्षण और युवा पीढ़ी से जुड़ाव
उत्तराखंड का लोक जीवन प्रकृति, ऋतु चक्र, लोक आस्था और संघर्षमय पर्वतीय जीवनशैली से गहराई से रचा-बसा है। राज्य की पारंपरिक गायन शैलियां और नृत्य विधाएं केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये सदियों से चली आ रही हमारी सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक विरासत की जीवंत दस्तावेज़ हैं। छोलिया नृत्य जहां वीर रस और उत्तराखंड के ऐतिहासिक योद्धाओं की गाथा बयां करता है, वहीं झोड़ा, चांचरी और बरदा नाटी सामूहिक एकता और ऋतु परिवर्तन के हर्षोल्लास को दर्शाते हैं। इसी प्रकार, मांगल गीत और चैती जैसे पारंपरिक गायन मांगलिक अवसरों और धार्मिक आस्थाओं के प्रतीक रहे हैं।
आज के डिजिटल युग में, जब वैश्विक संस्कृति का प्रभाव हर जगह देखने को मिल रहा है, तब ‘वैदेही कल्चरल एजुकेशन एंड आर्ट फाउंडेशन’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से इन विधाओं को जीवित रखना एक बहुत बड़ा कार्य है। आधुनिक तकनीक, सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने उत्तराखंड के लोक संगीत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई है। आज प्रदेश का युवा वर्ग न केवल इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों और गीतों को सीख रहा है, बल्कि नए अंदाज में वैश्विक पटल पर प्रस्तुत भी कर रहा है। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यदि सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो लोक कलाएं कभी विलुप्त नहीं हो सकतीं।
देवभूमि की अस्मिता और कड़े विधायी निर्णय
उत्तराखंड केवल एक प्रशासनिक राज्य नहीं है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र और पवित्र देवभूमि है। इसकी जनसांख्यिकी, शांतिप्रिय माहौल और आध्यात्मिक पवित्रता को बनाए रखना राज्य के स्थायित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने देवभूमि की अस्मिता और पहचान को अक्षुण्ण रखने के लिए कई ऐतिहासिक और कड़े कानून पारित किए हैं।
- समान नागरिक संहिता: राज्य में सभी नागरिकों के लिए एक समान सामाजिक और कानूनी ढांचा तैयार करने की दिशा में उठाया गया यह कदम सामाजिक समरसता और लैंगिक समानता की ओर एक ऐतिहासिक कदम है।
- सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून: देवभूमि के धार्मिक स्वरूप और मौलिक ताने-बाने को अवैध धर्मांतरण के प्रयासों से सुरक्षित रखने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान लागू किए गए हैं।
- दंगारोधी कानून और अवैध अतिक्रमण पर कार्रवाई: सार्वजनिक और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के साथ-साथ राज्य भर में सरकारी जमीनों पर हुए अवैध कब्जों को हटाने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया है।
- सशक्त भू-कानून: पर्वतीय क्षेत्रों की भू-संपदा और स्थानीय निवासियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक दूरदर्शी भू-कानून की रूपरेखा तैयार की गई है, ताकि राज्य के संसाधनों पर केवल और केवल जनहित का अधिकार रहे।
ये तमाम निर्णय इस बात को स्पष्ट करते हैं कि देवभूमि की सुरक्षा, कानून का शासन और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा किसी राजनीतिक लाभ-हानि से बहुत ऊपर है।
पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के भविष्य का निर्माण
किसी भी राज्य की प्रगति का असली आधार वहां का युवा होता है। अतीत में भर्ती परीक्षाओं में होने वाली धांधलियों और नकल माफिया के हावी रहने के कारण राज्य के मेधावी युवाओं का मनोबल टूट रहा था। इस गंभीर समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए देश का सबसे कड़ा ‘नकल विरोधी कानून’ लागू किया गया। इस कानून का सीधा असर भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और गति पर देखने को मिला है।
पारदर्शी और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के बल पर पिछले कुछ वर्षों में 35 हजार से अधिक युवाओं को विभिन्न सरकारी विभागों में नौकरियां प्रदान की गई हैं। बिना किसी पक्षपात, सिफारिश या धांधली के योग्य उम्मीदवारों को रोजगार मिलना राज्य प्रशासनिक व्यवस्था में जनविश्वास को पुनर्स्थापित करता है। युवाओं को अवसर प्रदान करने की यह नीति न केवल राज्य से पलायन को रोकने में मददगार साबित हो रही है, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों के आर्थिक विकास को भी गति दे रही है।
ऐतिहासिक चेतना, राज्य आंदोलन और राष्ट्रीय मर्यादा
उत्तराखंड राज्य का निर्माण किसी राजनीतिक सौगात के रूप में नहीं हुआ था, बल्कि यह संघर्ष, जनांदोलन और अनगिनत आंदोलनकारियों के बलिदान का प्रतिफल है। रामपुर तिराहा गोलीकांड जैसी दर्दनाक घटनाएं आज भी हर उत्तराखंडी के दिल में दर्द और गौरव की मिश्रित भावनाएं पैदा करती हैं। राज्य आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड बनाने की जिम्मेदारी वर्तमान पीढ़ी और शासन दोनों की है। इसलिए जब भी राज्य के सम्मान और ऐतिहासिक संदर्भों की बात आती है, तो संवेदनशीलता और परिपक्वता अनिवार्य हो जाती है।
इसी तरह, जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की सीमाओं की रक्षा में लगे महान व्यक्तित्वों की आती है, तो राजनीति की सीमाओं से परे जाकर सोचना आवश्यक है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल जैसी हस्तियां देश की संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा में अपना जीवन समर्पित कर चुकी हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के गौरव से जुड़े मुद्दों पर सतही या ओछी राजनीति करना न केवल राष्ट्रीय मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि यह देश सेवा में लगे सुरक्षा बलों और रणनीतिकारों के मनोबल को भी प्रभावित करता है। सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रीय मुद्दों पर जिम्मेदार संवाद और गरिमा बनाए रखना बेहद जरूरी है।
अंकिता भंडारी प्रकरण: संवेदनशील मामलों में न्याय प्रक्रिया और तथ्यात्मकता
सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाए रखने और कानून के प्रति जनता का विश्वास कायम रखने के लिए संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष न्याय की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण होती है। अंकिता भंडारी प्रकरण एक ऐसा ही दुखद और संवेदनशील मामला है, जिसने पूरे राज्य के जनमानस को झकझोर कर रख दिया था। किसी भी बेटी के साथ हुए अन्याय में अपराधियों को कठोरतम सजा दिलाना समाज और राज्य व्यवस्था का प्राथमिक कर्तव्य है।
न्यायिक प्रक्रिया में भावनाओं और राजनीतिक बयानों के स्थान पर केवल ठोस प्रमाणों, फॉरेंसिक साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच की भूमिका होती है। अदालतों द्वारा दोषियों को दी जाने वाली सजा और न्यायिक समीक्षा ही किसी पीड़ित परिवार को वास्तविक न्याय दिला सकती है। ऐसी दुखद घटनाओं को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप या चुनावी लाभ का जरिया बनाने के बजाय पूरी कानूनी प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए। न्याय की सर्वोपरिता इसी में निहित है कि जांच एजेंसियां और अदालतें बिना किसी दबाव के निष्पक्षता से कार्य करें ताकि हर पीड़ित को न्याय मिल सके।
अंतिम छोर तक विकास और भविष्य का दृष्टिकोण
उत्तराखंड के संदर्भ में विकास की परिभाषा तब तक अधूरी है जब तक कि इसका लाभ दुर्गम पर्वतीय गांवों, सीमांत क्षेत्रों और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक न पहुंचे। बुनियादी ढांचे का विकास, सड़कों का नेटवर्क, स्वास्थ्य सुविधाओं का सुदृढ़ीकरण और महिलाओं का सशक्तीकरण ही समावेशी विकास का असली पैमाना है।
पहाड़ की विषम परिस्थितियों में जीवन यापन करने वाली महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार, होमस्टे योजना, जैविक खेती और स्थानीय हस्तशिल्प से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। जब राज्य का अंतिम परिवार सामाजिक और आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करेगा, तभी एक समृद्ध और सशक्त उत्तराखंड की परिकल्पना साकार होगी। जनता के अटूट सहयोग, सांस्कृतिक गौरव और कड़े प्रशासनिक फैसलों के बल पर आज उत्तराखंड एक नए स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर है।


