जनरल गुरमीत सिंह का कार्यकाल: सियासत के नक्शे पर राजभवन अक्सर ऐसी इमारतों के तौर पर दर्ज होते हैं, जहाँ से भारी-भरकम फाइलें, ठंडे कूटनीतिक फैसले और सत्ता की लंबी दीवारें संचालित होती हैं। लेकिन जब एक ऐसे इंसान ने उत्तराखंड की कमान संभाली, जिसने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा सरहदों की हिफाजत में खपाया हो, तो उस इमारत के मायने ही बदल गए। लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का उत्तराखंड के राजभवन में आना किसी प्रशासनिक नियुक्ति भर से ज्यादा, एक ऐसी आंधी की तरह था जिसने दफ्तरशाही की धूल झाड़कर उस महफिल को आम आदमी के आँगन में बदल दिया।
जब कंधे के फीते उतरकर सीधे दिलों पर उतर आए
सेना की वर्दी और जनरल के कंधों पर लगे सितारे सिर्फ ताकत की नुमाइश नहीं होते, वे अनुशासन, अटूट निष्ठा और उस खामोश बलिदान के प्रतीक होते हैं जो देश को सोने की नींद सुलाने के लिए खुद जागता है।
लेकिन जनरल गुरमीत सिंह जब राजभवन के सोफे पर बैठे, तो उनके भीतर का फौजी कमांडिंग ऑफिसर नहीं, बल्कि एक ‘अभिभावक’ जागा। पहाड़ों की उन दुर्गम घाटियों में, जहाँ ठंड में ठिठुरती रातों और भूस्खलन की आपदाओं के बीच आम आदमी की आवाज़ दिल्ली या देहरादून के दफ्तरों तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती थी, वहाँ राज्यपाल का पद किसी मसीहा की दस्तक जैसा बन गया। उन्होंने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे ऊपर से थोपे गए कोई संवैधानिक प्रतिनिधि हैं। उनके लिए उत्तराखंड महज़ एक राज्य का नक्शा नहीं, बल्कि एक ऐसा परिवार था जिसके हर कोने की फिक्र करना उनका नैतिक फर्ज था।
वह छांव जो सिख परंपरा के लंगर से निकलकर पहाड़ों तक पहुँची
सिख इतिहास के पन्नों को पलटिए, तो त्याग और सेवा की खुशबू दूर-दूर तक महसूस होती है। स्वर्ण मंदिर की उस विशाल देहरी पर न कोई राजा होता है और न कोई रंक, सब एक ही कतार में बैठकर जब लंगर छकते हैं, तो वह इंसानियत का सबसे बड़ा दस्तावेज बन जाता है।
जनरल गुरमीत सिंह का पूरा जीवन और उनका कार्य इसी सांस्कृतिक दर्शन की जीवंत प्रतिलिपि था। जब वे जनता के बीच जाते थे, तो उनके चेहरे पर कोई कृत्रिम औपचारिकता या राजसी गुरूर नहीं होता था। दूरदराज के पहाड़ी गाँवों के बुजुर्ग जब उनसे मिलते, तो उन्हें ऐसा लगता जैसे उनका अपना कोई बेटा या बड़ा भाई उनकी सुध लेने आया है। “आज पूरा परिवार इकट्ठा हुआ है”, उनके मुँह से निकले ये साधारण शब्द महज़ संबोधन नहीं थे, बल्कि यह उस आत्मीयता की गारंटी थे जो किसी भी हुक्मरान की सबसे बड़ी ताकत होती है।
फौजी अनुशासन के साथ तकनीक और एआई (AI) का अनोखा विजन
एक आम धारणा यह होती है कि फौजी पृष्ठभूमि के लोग केवल सुरक्षा और पुरानी कार्यशैली तक सीमित रहते हैं, लेकिन जनरल गुरमीत सिंह ने इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया। उन्होंने आधुनिक तकनीक, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल इनोवेशन को उत्तराखंड के विकास और युवाओं के भविष्य से मजबूती से जोड़ा।
उन्होंने राजभवन को केवल बैठकों का अड्डा नहीं बनने दिया, बल्कि विश्वविद्यालयों और तकनीकी मंचों पर बार-बार इस बात पर जोर दिया कि देवभूमि के युवाओं को आने वाले कल की तकनीक – यानी AI, डेटा साइंस और आधुनिक डिजिटल टूल्स में माहिर होना चाहिए। उनका मानना था कि पहाड़ों की भौगोलिक दूरियों को अगर कोई चीज पाट सकती है, तो वह आधुनिक तकनीक और एआई की ताकत ही है। उन्होंने शिक्षा और स्टार्टअप्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को बढ़ावा देकर यह साबित कर दिया कि एक सच्चा सिपाही सिर्फ सरहदों की हिफाजत नहीं करता, बल्कि देश की आने वाली पीढ़ियों को भविष्य के युद्धों और चुनौतियों के लिए भी तैयार करता है।
रणनीतिक पैनी नजर और युवाओं में धड़कता राष्ट्रभाव
उत्तराखंड सिर्फ देवभूमि भर नहीं है, यह देश की उत्तरी सीमाओं का एक ऐसा अभेद्य किला है जिसकी भौगोलिक और सामरिक संवेदनशीलता पर देश की सुरक्षा टिकी है। ऐसे संवेदनशील प्रदेश में एक ऐसे शख्स का होना जिसके पास सरहदों की रग-रग की जानकारी हो, एक बहुत बड़ा रणनीतिक वरदान था।
सुरक्षा और सूझबूझ: उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को केवल कागजी बैठकों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जमीनी स्तर पर उसकी नब्ज को पहचाना।
युवाओं के प्रेरणास्त्रोत: विश्वविद्यालयों या युवा सम्मेलनों में जब वे बोलते थे, तो उनके शब्द किसी किताब के पन्नों से नहीं, बल्कि खंदकों और मोर्चों पर बिताए अनुभवों के तवे से निकले लगते थे। उन्होंने नई पीढ़ी को सिर्फ डिग्रियां बटोरने वाली मशीन बनने के बजाय राष्ट्र के ताने-बाने को मजबूत करने वाला सिपाही बनने की प्रेरणा दी।
एक ऐसा खालीपन जिसे भरना आसान नहीं होगा
वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से चलता है, और बदलाव इस दुनिया का सबसे शाश्वत सच है। जब जनरल गुरमीत सिंह का कार्यकाल पूरा होने की खबर इन हवाओं में घुली, तो देवभूमि की फिजा में एक अनकही सी टीस महसूस हुई। इतिहास में बहुत कम राजनेता या संवैधानिक पद पर बैठे लोग ऐसे होते हैं जिनके जाने पर जनता की आँखें नम होती हैं। वे उन विरले इंसानों में से थे जिन्होंने अपनी कुर्सी के ‘अधिकारों’ से ज्यादा अपने ‘दायित्वों’ की लाठी को थामे रखा।
अब जबकि मध्य प्रदेश की माटी से ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर ढाल सिंह बिसेन ने देवभूमि के नए राज्यपाल की कमान संभाली है, तो उत्तराखंड की शांत और संस्कारित जनता की उम्मीदें फिर से परवान चढ़ने लगी हैं। नई ऊर्जा और नए विजन के साथ आए इस नेतृत्व के सामने पिछली बेंचमार्क को बनाए रखने की एक बड़ी चुनौती भी है और एक सुनहरा अवसर भी।
व्यक्तिगत दृष्टिकोण: फौजी की छांव और रूह की आवाज
एक फौजी के बेटे होने के नाते मैं फौज, फौजियों और उनकी उस मनभावना को बहुत करीब से और बेहद गहराई से समझता हूँ। मैंने बचपन से देखा है कि कैसे एक सैनिक का जीवन महज़ नौकरी नहीं, बल्कि देश के नाम एक मुकम्मल इबादत होता है। उनके सीने में धड़कने वाला दिल सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि इस तिरंगे के हर एक धागे के लिए जीता है।
यही वजह है कि जब जनरल गुरमीत सिंह ने राजभवन की चारदीवारी को लांघकर आम जनता को गले लगाया, तो मुझे उसमें किसी राजनेता की कूटनीति नहीं, बल्कि एक फौजी पिता का वह अक्श दिखाई दिया जो अपने बच्चों की हर तकलीफ पर खुद आहत होता है। कुर्सियां और तख्त तो इतिहास के हर दौर में बदलते आए हैं, लेकिन दिलों पर राज करने वाले वही गिने-चुने लोग होते हैं जिनके फैसलों में नीयत की सफेदी और बर्ताव में ममता की महक होती है। जनरल गुरमीत सिंह ने जिस सुशासन, तकनीक-प्रेमी सोच और जनसेवा की लकीर खींची है, वह आने वाले समय में भी हम सबके लिए एक मिसाल बनी रहेगी।


