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देवभूमि उत्तराखंड: नैनीताल लैंड फ्रॉड मामले में कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत का बड़ा एक्शन, बेनकाब होगी भू-माफियाओं की साठगांठ

देवभूमि उत्तराखंड के नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाले तहसील श्री कैंचीधाम क्षेत्र से एक ऐसा सनसनीखेज और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने राजस्व विभाग, प्रशासनिक व्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्र के नागरिकों की नींद उड़ा दी है। ग्राम सभा मल्ला निगलाट, पट्टी पाडली के सतर्क ग्रामीणों की मुस्तैदी से फर्जी आधार कार्ड और कूट रचित मृत्यु प्रमाण पत्र के सहारे करोड़ों रुपये मूल्य की कीमती जमीन का फर्जी वारिस बनकर नामान्तरण कराने के एक बड़े षड्यंत्र का पर्दाफाश हुआ है। इस प्रकरण की गंभीरता और भू-माफियाओं के बढ़ते दुस्साहस को देखते हुए कुमाऊं मण्डल के आयुक्त दीपक रावत ने त्वरित एवं सख्त रुख अपनाया है।

उन्होंने न केवल मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं, बल्कि धोखाधड़ी में शामिल संदिग्धों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने तथा संदिग्ध राजस्व कर्मियों के विरुद्ध कड़ी अनुशासनिक कार्यवाही करने के कड़े निर्देश जिलाधिकारी नैनीताल को जारी किए हैं। यह पूरा मामला सिर्फ एक जमीन के फर्जीवाड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी प्रत्यक्ष प्रमाण है कि किस तरह डिजिटल दुनिया में सतर्कता बरतकर किसी बड़े अपराध को उजागर किया जा सकता है।

कैंचीधाम तहसील का वह मामला जिससे मचा हड़कंप
यह पूरा प्रकरण ग्राम सभा मल्ला निगलाट, पट्टी पाडली, तहसील श्री कैंचीधाम, जिला नैनीताल का है। ग्राम सभा के जागरूक निवासियों ने दिनांक 29 सितंबर 2026 को आयुक्त कुमाऊं मण्डल दीपक रावत के समक्ष उपस्थित होकर एक लिखित शिकायत पत्र सौंपा। शिकायत में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि ओम प्रकाश नामक व्यक्ति ने स्वयं को स्वर्गीय केशवदत्त (पुत्र चंद्रमणी) का एकमात्र विधिक वारिस दर्शाते हुए राजस्व अभिलेखों यानी खतौनी में अपना नाम दर्ज करवा लिया।

ग्रामीणों ने आयुक्त को बताया कि ग्राम मल्ला निगलाट के खाता संख्या 08 में दर्ज भूमि पर न तो कभी ओम प्रकाश का कोई कब्जा रहा है और न ही वह इस गांव का मूल निवासी या काश्तकार है। वास्तव में, गांव में ओम प्रकाश नाम का कोई व्यक्ति रहता ही नहीं है। इतना ही नहीं, जिस केशवदत्त का वारिस बनकर यह जमीन अपने नाम कराई गई, उस नाम का भी कोई व्यक्ति वर्तमान में गांव में निवास नहीं करता। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना था कि यह पूरी प्रक्रिया एक सोची-समझी साजिश और फर्जीवाड़े के तहत रची गई है ताकि गांव की कीमती जमीन को अवैध रूप से हड़पा जा सके।

ऑनलाइन पोर्टल की सतर्कता से खुली फर्जीवाड़े की पोल
आज के डिजिटल युग में जहां कई बार साइबर अपराध और जालसाजी के मामले सामने आते हैं, वहीं सजगता से इन पर लगाम भी लगाई जा सकती है। इस पूरे घोटाले का भंडाफोड़ गांव के ही एक जागरूक नागरिक श्री मनिक मेहरा की सतर्कता के कारण संभव हो सका। मनिक मेहरा प्रतिदिन गांव की जमीनों की ऑनलाइन रजिस्ट्री और भू-अभिलेखों की डिजिटल जांच किया करते थे।

एक दिन जब उन्होंने अपनी नियमित जांच के दौरान खतौनी में हुए अचानक बदलाव को देखा, तो वे हैरान रह गए। खाता संख्या 08 में एक ऐसे व्यक्ति का नाम वारिस के रूप में दर्ज हो चुका था, जिसे पूरे गांव में कोई नहीं पहचानता था। उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी गांव के अन्य प्रबुद्ध नागरिकों और ग्राम सभा के लोगों को दी। इसके बाद जब ग्रामीणों ने मिलकर पड़ताल शुरू की, तो इस बड़े भू-घोटाले का ताना-बाना सामने आने लगा और अंततः पूरा मामला प्रशासनिक चौखट तक पहुंच गया।

कुमाऊं आयुक्त की त्वरित सुनवाई और चौंकाने वाले तथ्य
शिकायत की गंभीरता और ग्रामीणों के आक्रोश को देखते हुए आयुक्त कुमाऊं मण्डल दीपक रावत ने बिना किसी देरी के मामले का संज्ञान लिया। उन्होंने अगले ही दिन यानी 30 सितंबर 2026 को शिकायतकर्ता ग्रामीणों, कैंचीधाम के तहसीलदार, संबंधित राजस्व कार्मिकों और मामले से जुड़े अन्य सभी पक्षकारों को नैनीताल स्थित अपने कार्यालय में तलब किया।

सुनवाई के दौरान जब दस्तावेजों की परतें उधड़ने लगीं, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
33 वर्ष पूर्व मृत व्यक्ति का 2026 में फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र: ग्रामीणों ने सुनवाई में साक्ष्यों के साथ बताया कि मूल भू-स्वामी केशवदत्त की मृत्यु वर्ष 1983 में ही हो चुकी थी। हालांकि, भू-माफियाओं ने चार दशक बाद वर्ष 2026 में फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र और कूटरचित आधार कार्ड बनवाकर खुद को उनका वारिस घोषित करा लिया।
आधार कार्ड में उम्र का बड़ा झोल: रजिस्ट्री और नामान्तरण के दौरान लगाए गए आधार कार्ड की प्रथम दृष्टया जांच से पता चला कि वह आधार कार्ड उत्तर प्रदेश के किसी अज्ञात व्यक्ति का है, जिसकी वास्तविक आयु लगभग 40 से 50 वर्ष के बीच प्रतीत होती है। जबकि रजिस्ट्री के सरकारी दस्तावेजों में उक्त व्यक्ति की आयु 73 वर्ष दर्शाई गई थी।
समय सीमा का खेल और जल्दबाजी: मामले में सबसे संदेहास्पद कड़ी यह रही कि तहसील श्री कैंचीधाम के कानूनगो द्वारा 21 अगस्त 2026 को विरासतन नामान्तरण का आदेश पारित किया गया। नाम दर्ज होने के ठीक एक महीने बाद इस जमीन को एक अन्य खरीदार को बेच भी दिया गया। इतनी तेजी से हुए नामान्तरण और बिक्री ने राजस्व कर्मियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भू-माफिया, बिचौलियों और सांठगांठ का संगठित नेटवर्क
ग्रामीणों ने आयुक्त के समक्ष अपनी बात रखते हुए इस पूरे घटनाक्रम को एक संगठित भू-माफिया नेटवर्क की कारस्तानी बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस धोखाधड़ी में कई प्रभावशाली और स्थानीय लोग शामिल हैं। ग्रामीणों द्वारा दिए गए बयान के अनुसार इस खेल में नरेश पाण्डे, संध्या बोरा, कर्नल विवेक भट्ट (निवासी रामगढ़), संजय बोहरा, ग्राम डोब की प्रधान पुष्पा देवी और हिमांशु (निवासी गोलापार) की संलिप्तता की आशंका जताई गई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि बाहरी भू-माफियाओं ने स्थानीय रसूखदारों और निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ मिलकर पहले तो फर्जी दस्तावेज तैयार किए, फिर बंद पड़े या पुराने खातों को चिन्हित कर उन पर नामान्तरण करवाया और अंत में तुरंत जमीन बेचकर निकल जाने की योजना बनाई। यदि ग्रामीण समय पर इसकी सुध न लेते, तो यह जमीन कानूनी दांव-पेच में उलझकर हमेशा के लिए अपरिचित हाथों में चली जाती।

प्रशासनिक हड़कंप: प्राथमिकी और कड़े अनुशासनिक निर्देश
मामले की सुनवाई करते हुए आयुक्त दीपक रावत ने स्पष्ट किया कि कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर भू-अभिलेखों में हेरफेर करना एक अक्षम्य अपराध है। उन्होंने मौके पर ही जिलाधिकारी नैनीताल को कड़े और स्पष्ट निर्देश जारी किए:
लैंड फ्रॉड की विस्तृत जांच: इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए ताकि यह पता चल सके कि इस गिरोह ने कैंचीधाम या आसपास के क्षेत्रों में और कितनी जमीनों पर इस तरह के फर्जीवाड़े किए हैं।
प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर): कूट रचित आधार कार्ड, फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र और धोखाधड़ी से बनाए गए वारिसान दस्तावेजों की तकनीकी जांच की जाए। आरोप सही पाए जाने पर दोषी व्यक्तियों और सहयोगियों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई जाए।
दोषी कर्मचारियों पर अनुशासनिक कार्यवाही: नामान्तरण प्रक्रिया में लापरवाही बरतने, दस्तावेजों की बिना पुष्टि किए आदेश पारित करने वाले संबंधित राजस्व कर्मियों और कानूनगो की भूमिका की जांच की जाए तथा उनके खिलाफ सख्त अनुशासनिक कार्यवाही अमल में लाई जाए।

भू-अभिलेखों की सुरक्षा और डिजिटल दौर में ग्रामीण सतर्कता का महत्व
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों से जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। पर्यटन स्थलों जैसे नैनीताल, कैंचीधाम, रामगढ़ और भवाली के आसपास की जमीनों पर भू-माफियाओं की नजर बनी हुई है। ऐसे में यह घटना हर एक भूमि स्वामी और ग्रामीण के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
इस घटनाक्रम से दो सबसे प्रमुख सीख सामने आती हैं:
अभिलेखों की नियमित मॉनिटरिंग: अपनी पैतृक या व्यक्तिगत भूमि की खतौनी और रजिस्ट्री विवरण को समय-समय पर सरकारी पोर्टल पर चेक करते रहना अत्यंत आवश्यक है।

स्थानीय स्तर पर चौकसी: यदि गांव में कोई बाहरी व्यक्ति अचानक किसी भू-खंड पर अपना दावा पेश करे या नामान्तरण की प्रक्रिया शुरू हो, तो तुरंत तहसील या राजस्व विभाग से उसकी सत्यता की जांच कराएं।

सुनवाई के अंत में आयुक्त कुमाऊं मण्डल ने आम जनता से अपील की कि वे अपनी भूमि के अभिलेखों की सुरक्षा के प्रति सजग रहें। उन्होंने कहा कि नागरिक समय-समय पर अपनी खतौनी की प्रविष्टियों की जांच करते रहें और यदि किसी भी प्रकार की संदिग्ध या गलत प्रविष्टि नजर आए, तो उसकी सूचना बिना किसी डर के तुरंत तहसील या जिला प्रशासन को दें, ताकि समय रहते भू-माफियाओं के मंसूबों को नाकाम किया जा सके।

नैनीताल के कैंचीधाम तहसील का यह मामला यह साबित करता है कि जनता की जागरूकता और प्रशासनिक सख्ती मिलकर किसी भी बड़े से बड़े अपराध को उजागर कर सकती हैं। फर्जी आधार कार्ड और फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनाकर जमीन हड़पने का यह प्रयास न केवल एक गंभीर कानूनी अपराध है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था में मौजूद खामियों को भी उजागर करता है। आयुक्त दीपक रावत के सख्त रुख से उम्मीद जताई जा रही है कि इस मामले के सभी दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा और राजस्व विभाग में छिपे काली भेड़ों पर गाज गिरेगी। यह कार्रवाई उन सभी भू-माफियाओं के लिए एक कड़ा संदेश बनेगी जो धोखाधड़ी के बल पर दूसरों की संपत्ति पर कब्जा करने का सपना देखते हैं।

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