देश को नशे की भयावह गिरफ़्त में आने से बचाने और युवा पीढ़ी को एक सुरक्षित तथा स्वर्णिम भविष्य देने के उद्देश्य से केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाया जा रहा ‘नशामुक्त भारत अभियान’ अब एक अत्यंत निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। नशे के सौदागरों के बढ़ते जाल और युवाओं में बढ़ती लत की गंभीर चुनौती को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर इस अभियान को अधिक व्यापक और असरदार बनाने के लिए विशेष कदम उठाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में जनपद स्तर पर नशे के विरुद्ध जारी विशेष शपथ अभियान की समय-सीमा को बढ़ाकर अब 18 अक्टूबर तक कर दिया गया है।
इस निर्णय के पीछे मुख्य उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना नहीं है, बल्कि समाज के हर छोटे-बड़े वर्ग, हर नागरिक और हर संस्थान को इस राष्ट्रीय दायित्व से सीधे तौर पर जोड़ना है। जब तक नशे के खिलाफ जन-आंदोलन का माहौल नहीं बनेगा, तब तक इस सामाजिक बुराई का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। यही कारण है कि इस विस्तारित अवधि में प्राथमिक स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों, सरकारी दफ़्तरों, कारखानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और ग्राम पंचायतों तक में बड़े पैमाने पर नशामुक्ति की शपथ दिलाई जा रही है।
अभियान का विस्तार और जनभागीदारी का दायरा
जिला प्रशासन और समाज कल्याण विभाग के संयुक्त तत्त्वावधान में संचालित इस विशेष अभियान में समाज के हर तबके को शामिल करने का विस्तृत खाका तैयार किया गया है। जिलाधिकारी डॉ आशीष चौहान ने अभियान को गति देने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिसके तहत कक्षा 1 से 12 तक के सभी सरकारी व निजी विद्यालयों, डिग्री कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों तथा विभिन्न हॉस्टलों में रह रहे विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से इस शपथ से जोड़ा जाएगा। युवाओं को इस अभियान का केंद्र बिंदु इसलिए बनाया गया है क्योंकि नशे की लत का सबसे पहला शिकार अक्सर स्कूली और कॉलेज जाने वाले छात्र ही होते हैं। साथी दोस्तों के दबाव, तनाव, उत्सुकता या जागरूकता की कमी के कारण युवा इस दलदल में फंस जाते हैं। यदि उन्हें शुरुआती उम्र में ही इसके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक कर दिया जाए, तो वे न केवल स्वयं इससे दूर रहेंगे बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी जागरूक करने में एक मजबूत ढाल का काम करेंगे।
केवल शैक्षणिक संस्थान ही नहीं, बल्कि कार्यस्थलों पर भी इस अभियान को पूरी प्रमुखता से लागू किया जा रहा है। सभी सरकारी कार्यालयों के अधिकारियों व कर्मचारियों, औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत श्रमिकों, व्यापारिक संघों, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों, होटल व होम स्टे संचालकों तथा महिला स्वयं सहायता समूहों को भी इसमें सक्रिय रूप से भागीदार बनाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूह और स्थानीय पंचायतें इस अभियान की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभर सकती हैं, क्योंकि नशे के कारण सबसे अधिक प्रताड़ना और आर्थिक तंगी का सामना परिवारों में महिलाओं को ही करना पड़ता है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों का डिजिटल समन्वय
वर्तमान डिजिटल युग में अभियान की पहुँच को सुगम और पारदर्शी बनाने के लिए तकनीक का भरपूर उपयोग किया जा रहा है। शपथ कार्यक्रम को केवल भौतिक सभाओं तक सीमित न रखकर ऑनलाइन माध्यम से भी जोड़ा गया है। आम नागरिक, छात्र, नौकरीपेशा और विभिन्न संस्थानों के लोग जारी किए गए विशेष क्यूआर कोड अथवा आधिकारिक वेब पोर्टल के माध्यम से डिजिटल रूप से शपथ ले सकते हैं। इस डिजिटल पोर्टल के ज़रिए शपथ पूरी करने के बाद हर व्यक्ति को एक आधिकारिक डिजिटल प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है, जिसे डाउनलोड करना अनिवार्य रखा गया है।
यह तकनीक-संचालित व्यवस्था लोगों में एक प्रकार के गौरव और नैतिक दायित्व का अहसास कराती है। जब कोई व्यक्ति अपने नाम का नशामुक्ति प्रमाण-पत्र प्राप्त करता है, तो वह मानसिक रूप से इस बात के प्रति अधिक प्रतिबद्ध महसूस करता है। प्रशासन ने सभी विभागों और संस्थानों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों के फोटोग्राफ, भागीदारी के आंकड़े और प्रमाण-पत्रों का ब्योरा संकलित करके समाज कल्याण विभाग को समय पर उपलब्ध कराएं, ताकि अभियान की वास्तविक प्रगति का सही मूल्यांकन किया जा सके।
नशे का सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य पर पड़ता जानलेवा असर
अगर हम अपने समाज की वर्तमान स्थिति का गहराई से विश्लेषण करें, तो नशे की समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित कोई व्यक्तिगत मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है। जब घर का कोई एक सदस्य, विशेष रूप से परिवार का कमाऊ व्यक्ति या कोई युवा बच्चा नशे की चपेट में आता है, तो पूरा परिवार मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से तबाह हो जाता है। नशे की लत को पूरा करने के लिए व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी जमापूंजी, संपत्ति और घरेलू सामान तक बेचने को मजबूर हो जाता है, जिससे पूरा परिवार भुखमरी और कंगाली के कगार पर पहुँच जाता है।
स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखें तो नशीले पदार्थों का सेवन शरीर के महत्वपूर्ण अंगों जैसे यकृत, गुर्दे, हृदय और मस्तिष्क को धीरे-धीरे पूरी तरह नष्ट कर देता है। गंभीर मानसिक रोग, अवसाद, आक्रामकता और आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियों के पीछे भी अक्सर नशे का ही हाथ होता है। इसके साथ ही, अपराध जगत का नशे से सीधा और गहरा संबंध है। चोरी, डकैती, राहजनी, घरेलू हिंसा, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में एक बड़ा प्रतिशत सीधे तौर पर नशा करने वालों से जुड़ा होता है। जब कोई युवा नशे की सनक में होता है, तो उसे सही और गलत का भान नहीं रहता। इस प्रकार नशा न केवल एक जीवन को खत्म करता है, बल्कि पूरे समाज की शांति, सुरक्षा और प्रगति में बहुत बड़ी बाधा बनता है।
प्रशासनिक निगरानी और संस्थागत जवाबदेही
किसी भी सरकारी या सामाजिक अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे धरातल पर कितनी सख्ती और निरन्तरता के साथ लागू किया जाता है। केवल शपथ दिला देने से नशा पूरी तरह खत्म नहीं हो जाएगा, लेकिन यह एक सही दिशा में उठाया गया पहला और आवश्यक कदम है। जिलाधिकारी द्वारा दिए गए निर्देशों से स्पष्ट है कि प्रशासन इस मामले में किसी भी प्रकार की शिथिलता बरतने के पक्ष में नहीं है। जिला प्रशासन ने पुलिस प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग और समाज कल्याण विभाग को एक साथ मिलकर काम करने के निर्देश दिए हैं।
शैक्षणिक संस्थानों के आसपास अवैध रूप से बिकने वाली सिगरेट, तंबाकू, शराब या अन्य नशीले पदार्थों की दुकानों पर नकेल कसना इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कानून के अनुसार किसी भी स्कूल या कॉलेज के 100 मीटर के दायरे में नशीली वस्तुओं की बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। शपथ अभियान के साथ-साथ यदि इन नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए और औचक निरीक्षण किए जाएं, तो असामाजिक तत्त्वों में डर पैदा होगा। इसके अलावा, हॉस्टलों और कोचिंग सेंटरों में जहाँ दूर-दराज से आए छात्र अकेले रहते हैं, विशेष निगरानी की आवश्यकता है।
जन-आंदोलन से ही संभव है नशामुक्त समाज का सपना
नशे के खिलाफ लड़ाई को केवल कानून, पुलिस या प्रशासनिक आदेशों के भरोसे नहीं जीता जा सकता। इतिहास गवाह है कि जब तक किसी भी बुराई के खिलाफ समाज खुद खड़ा नहीं होता, तब तक स्थायी बदलाव संभव नहीं है। नशामुक्त भारत अभियान को एक औपचारिकता या सरकारी कार्यक्रम मानने के बजाय हमें इसे एक राष्ट्रीय और व्यक्तिगत कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना होगा।
माता-पिता और अभिभावकों को अपने बच्चों के बदलते व्यवहार, संगति और दिनचर्या पर बारीक नजर रखनी होगी। अक्सर संवाद की कमी के कारण बच्चे अपनी समस्याएं या तनाव किसी से साझा नहीं कर पाते और गलत राह चुन लेते हैं। परिवारों में दोस्ताना और पारदर्शी माहौल का होना बहुत जरूरी है। इसी तरह, शिक्षकों को भी कक्षाओं में पढ़ाई के साथ-साथ जीवन मूल्यों और नशे के खतरों पर खुलकर बात करनी चाहिए।
स्थानीय निवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं के समूहों को अपने क्षेत्रों में जागरूक प्रहरी की भूमिका निभानी होगी। यदि कहीं अवैध रूप से नशीले पदार्थों की खरीद-बिक्री हो रही हो, तो बिना डरे उसकी सूचना तुरंत पुलिस या संबंधित अधिकारियों को देनी चाहिए। जो लोग गलती से इस दलदल में फंस चुके हैं, उनसे नफरत करने के बजाय उन्हें सहानुभूति, परामर्श और नशामुक्ति केंद्रों की मदद से मुख्यधारा में वापस लाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
18 अक्टूबर तक चलने वाला यह विशेष शपथ अभियान एक सुअवसर है कि हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम न तो खुद किसी प्रकार के नशे का सेवन करेंगे और न ही अपने आसपास किसी को ऐसा करने देंगे। आइए, इस राष्ट्रीय अभियान में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं और अपने शहर, राज्य और देश को नशामुक्त, स्वस्थ और समृद्ध बनाने का दृढ़ संकल्प लें।


