धामी सरकार के इस प्रेरणादायक कार्य ने आज उत्तराखंड के पहाड़ी ग्रामीण इलाकों में महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण की एक नई मिसाल कायम की है। राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे आत्मनिर्भर उत्तराखंड अभियान के तहत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा रही है। इसी सोच को धरातल पर उतारने का काम नैनीताल जिले के रामगढ़ ब्लॉक स्थित घ्वेती गांव में हुआ है। यहाँ की निवासी भारती जीना ने अपने पारंपरिक हुनर और दूरदर्शी सोच के बल पर न केवल अपनी आजीविका संवारी है, बल्कि अपने गांव की 40 से 45 महिलाओं को भी रोजगार से जोड़कर उनके जीवन में आर्थिक स्वावलंबन का नया सवेरा लाया है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जंगलों में चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में पीरूल कहा जाता है, आमतौर पर वनाग्नि यानी जंगलों की आग का सबसे बड़ा कारण बनती हैं। हालांकि, सही दिशा और रचनात्मक सोच के साथ इसी पीरूल को अब कमाई के एक बेहतरीन जरिये के रूप में विकसित कर लिया गया है। भारती जीना ने इस प्राकृतिक सामग्री को बेकार समझने के बजाय इसे एक कीमती संसाधन में बदल दिया। उनके इस प्रयास से एक तरफ जहां ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड के कीमती जंगलों को भीषण आग के खतरे से बचाने में भी सीधी मदद मिल रही है।
दादाजी से सीखी कला बनी ग्रामीण महिलाओं के रोजगार का मजबूत आधार
घ्वेती गांव की भारती जीना को पीरूल से सुंदर हस्तशिल्प और टोकरियां बनाने की कला विरासत में मिली है। उन्होंने यह हुनर अपने दादाजी से सीखा था। बचपन में खेल-खेल और कौतुक के रूप में सीखी गई यह पारंपरिक कला आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा संबल बन जाएगी, इसका अंदाजा शायद पहले किसी को नहीं था। जब राज्य में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में स्थानीय संसाधनों के उपयोग और महिला स्वरोजगार को बढ़ावा देने की योजनाएं शुरू हुईं, तब भारती जीना ने अपने इस व्यक्तिगत हुनर को एक सामाजिक अभियान का रूप देने का फैसला किया।
उन्होंने अपने तक ही इस हुनर को सीमित रखने के बजाय अपने गांव और आसपास की महिलाओं को एक साथ संगठित करना शुरू किया। शुरुआती दौर में महिलाओं को इस काम से जोड़ना और उन्हें प्रशिक्षित करना एक चुनौती थी, लेकिन भारती जीना के धैर्य और लगन ने काम दिखाया। उन्होंने गांव की 40 से 45 महिलाओं को पीरूल से अलग-अलग प्रकार के सुंदर हस्तशिल्प उत्पाद बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। आज ये सभी महिलाएं पीरूल से टोकरियां, सजावटी सामान और दैनिक उपयोग की वस्तुएं बनाकर बाजार में बेच रही हैं और अपनी मेहनत के दम पर एक सम्मानजनक आजीविका कमा रही हैं।
पीरूल एकत्रीकरण से वनाग्नि के जोखिम में आई भारी कमी
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गर्मियों के मौसम में जंगलों में लगने वाली आग एक अत्यंत विकराल समस्या रही है। चीड़ के जंगलों से गिरने वाला पीरूल बेहद ज्वलनशील होता है और हल्की सी चिंगारी मिलते ही पूरे जंगल में आग फैला देता है। भारती जीना और उनके साथ जुड़ी महिलाओं की इस पहल ने पर्यावरण सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा व्यावहारिक समाधान पेश किया है।
इस काम से जुड़ी महिलाएं जंगलों के भीतर जाकर जमीन पर बिछी पीरूल की सूखी पत्तियों को सावधानीपूर्वक इकट्ठा करती हैं। इन पत्तियों को एकत्रित करके सुरक्षित स्थानों पर लाया जाता है, जिससे जंगलों के धरातल पर ज्वलनशील पदार्थ की मात्रा काफी कम हो जाती है। इसके बाद इन पत्तियों को प्रसंस्कृत करके उनसे हस्तशिल्प की वस्तुएं बनाई जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया से दोहरे लाभ मिल रहे हैं:
जंगलों की सुरक्षा: जंगलों में सूखी पत्तियों का ढेर कम होने से आग लगने की घटनाओं और उसकी तीव्रता में सीधी कमी आ रही है।
स्थानीय रोजगार: उसी सूखी सामग्री से सुंदर उत्पाद बनाकर स्थानीय स्तर पर नियमित आय का जरिया बन रहा है।
इस तरह, जो पीरूल कभी पर्यावरण और वन संपदा के लिए एक बड़ा खतरा माना जाता था, आज वही पीरूल ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक विकास और जंगल की सुरक्षा का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
कर्तव्य फाउंडेशन और प्रशासन का मिला मजबूत सहयोग
भारती जीना के इस निरंतर प्रयास और समर्पण को उस समय और अधिक बल मिला जब वे कर्तव्य फाउंडेशन संस्था के साथ जुड़ीं। इस संस्था के सहयोग से उनके द्वारा बनाए जा रहे हस्तशिल्प उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार हुआ और उन्हें अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का एक नया मंच मिला। संस्था के माध्यम से महिलाओं को नए डिजाइन तैयार करने और बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद बनाने का मार्गदर्शन भी मिल रहा है।
भारती जीना की इस अभिनव सोच और जमीनी स्तर पर किए गए कार्य का संज्ञान जिला प्रशासन ने भी लिया है। नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने खुद भारती जीना और उनके साथ काम कर रही महिलाओं के प्रयासों की खुले दिल से सराहना की है। प्रशासनिक स्तर पर मिली इस पहचान और सराहना से गांव की महिलाओं का मनोबल काफी बढ़ा है। प्रशासनिक सहयोग से इन महिलाओं को अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने और स्थानीय मेलों व प्रदर्शनी आयोजनों में बिक्री के बेहतर अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
त्रिवेणी संगम का जीवंत उदाहरण: रोजगार, नारी सशक्तिकरण और पर्यावरण रक्षा
आत्मनिर्भर उत्तराखंड का जो सपना राज्य सरकार द्वारा देखा गया है, उसकी सबसे सटीक झलक रामगढ़ के इस घ्वेती गांव में साफ दिखाई देती है। भारती जीना की यह पहल मुख्य रूप से तीन बड़े उद्देश्यों को एक साथ पूरा करती है:
स्थानीय रोजगार का सृजन: बिना किसी बड़े पूंजी निवेश के, गांव में ही उपलब्ध प्राकृतिक पत्तियों का उपयोग करके नियमित आय का जरिया तैयार किया गया है।
महिला सशक्तिकरण: गांव की 45 महिलाएं अब आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर नहीं हैं। वे अपने परिवार की आर्थिक मदद कर पा रही हैं और फैसले लेने में सक्षम हो रही हैं।
पर्यावरण और वन संरक्षण: जंगलों से पीरूल हटाकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली वनाग्नि की रोकथाम में प्रत्यक्ष योगदान दिया जा रहा है।
यह पहल इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि सही सोच, पारंपरिक ज्ञान और सरकारी योजनाओं का सही तालमेल हो, तो ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन की समस्या को रोकने के साथ-साथ आजीविका के स्थाई साधन विकसित किए जा सकते हैं।
भविष्य की राह और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संदेश
भारती जीना और उनके साथ जुड़ी 45 महिलाओं की यह सफलता की कहानी केवल एक गांव तक सीमित रहने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के लिए एक रोल मॉडल है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में जहां भी चीड़ के जंगल मौजूद हैं, वहां इस मॉडल को अपनाकर हजारों महिलाओं को रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।
स्थानीय संसाधनों के इस रचनात्मक उपयोग ने यह साबित कर दिया है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी अब पहाड़ के ही काम आ सकती है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि भारती जीना जैसी जागरूक महिलाओं को पहचान मिले और उन्हें आगे बढ़ने का उचित अवसर प्रदान किया जाए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का आत्मनिर्भर उत्तराखंड का संकल्प इसी प्रकार की जमीनी पहलों के माध्यम से दिन-प्रतिदिन मजबूत हो रहा है और राज्य की ग्रामीण महिलाएं विकास की नई इबारत लिख रही हैं।
मैं दिल से सैल्यूट करता हूं उत्तराखंड की इस बेटी – भारती जीना को जिसने अपने दादाजी से सीखी गई एक साधारण सी कला को सामाजिक और आर्थिक बदलाव का एक बड़ा जरिया बना दिया है। राज्य सरकार के प्रोत्साहन, प्रशासनिक सहयोग और कर्तव्य फाउंडेशन के साथ से आज घ्वेती गांव की महिलाएं न केवल आत्मनिर्भर बनकर स्वाभिमान का जीवन जी रही हैं, बल्कि अपनी देवभूमि के हरे-भरे जंगलों को आग से बचाने में भी एक प्रहरी की भांति अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं। यह प्रयास निसंदेह महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाता रहेगा।


