राजस्व न्यायालयों में मुकदमों का सालों-साल लंबित रहना केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह आम जनता के भरोसे, समय और गाढ़ी कमाई पर एक बहुत बड़ा बोझ है। जमीन-जायदाद के छोटे-छोटे विवादों, नामांतरण और बंटवारे के मामलों में जब न्याय की गति सुस्त पड़ती है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। देहरादून कलेक्ट्रेट के ऋषिपर्णा सभागार में हुई हालिया समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी डॉ0 आशीष चौहान ने इस गंभीर मुद्दे पर एक बेहद कड़ा और सुधारात्मक रुख अपनाया है। जिले में लंबित 15,540 मुकदमों के आंकड़े पर गहरी नाराजगी जताते हुए प्रशासन ने अब सिर्फ आदेश जारी करने तक सीमित न रहकर एक डिजिटल क्रांति की नींव रखी है। मुकदमों के त्वरित और पारदर्शी निस्तारण के लिए अब एक सॉफ्टवेयर आधारित स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जा रहा है। यह पहल केवल मुकदमों का निपटारा करने की एक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही तय करने और राजस्व अदालतों के प्रति जनता में फिर से विश्वास जगाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
देहरादून में 15 हजार से ज्यादा मुकदमे लंबित, जिलाधिकारी की सख्त चेतावनी
कलेक्ट्रेट सभागार में हुई मासिक समीक्षा बैठक के आंकड़े किसी का भी ध्यान खींचने के लिए काफी हैं। जिले की राजस्व अदालतों में कुल 15,540 मुकदमे निस्तारण के इंतजार में पड़े हुए हैं। इतने बड़े पैमाने पर मुकदमों का पेंडिंग होना इस बात का प्रमाण है कि पुरानी कार्यप्रणाली में कई व्यावहारिक कमियां थीं। उप जिलाधिकारी और तहसीलदार न्यायालयों में धारा 166 और 167 के तहत ऐसे 82 मामले पाए गए जो 3 से 5 साल पुराने हैं और अभी तक लटके हुए हैं।
जिलाधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के बावजूद कोई मामला बिना किसी वाजिब वजह के लंबे समय से दबा पड़ा है, तो इसके लिए संबंधित अधिकारियों की सीधी जिम्मेदारी तय की जाएगी। अब बिना किसी ठोस कारण के तारीख पर तारीख देने का दौर बंद करना होगा, क्योंकि एक-एक लंबित मुकदमा किसी परिवार के आर्थिक और मानसिक तनाव की वजह बन रहा है।
जमीन विवाद से जुड़ी प्रमुख धाराओं में देरी का सच
राजस्व न्यायालयों की सुस्त चाल को गहराई से समझने के लिए कुछ मुख्य धाराओं के तहत दर्ज मामलों के आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है।
धारा 229बी के तहत घोषणात्मक वाद के 841 मुकदमे लंबित हैं, जो 2 से 5 वर्ष तक पुराने हैं। इनमें भू-स्वामित्व के अधिकार से जुड़े मामलों में नियमित पैरवी और स्पष्ट रिपोर्ट का न होना सबसे बड़ी वजह है।
धारा 176 के तहत खाता विभाजन और बंटवारे के 1,157 मुकदमे लंबित हैं, जिनमें 3 से 5 वर्ष पुराने 179 वाद शामिल हैं। इनमें पारिवारिक बंटवारे में कागजी पेचीदगियां और मौके पर जाकर जांच करने में ढिलाई मुख्य कारण बनकर सामने आते हैं।
इसके अलावा धारा 166 और 167 के तहत भूमि संबंधी 82 मुकदमे 3 से 5 वर्ष से लंबित हैं, जो विभागीय समन और समयबद्ध सुनवाई प्रक्रिया की कमी को दर्शाते हैं। अगस्त महीने के आंकड़ों को देखें तो धारा 176 में सिर्फ 13 मुकदमों का निपटारा हो सका, जबकि पेंडिंग मुकदमों की संख्या 1,157 बनी हुई है। यह अंतर बताता है कि मुकदमों के आने की गति की तुलना में निस्तारण की रफ्तार बहुत धीमी है। इस खाई को पाटने के लिए अब विशेष रणनीति बनाई जा रही है।
स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम: कैसे बदलेगी राजस्व न्याय की पूरी तस्वीर?
पारंपरिक फाइलों के दौर से निकलकर अब राजस्व अदालतों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने की तैयारी है। जिलाधिकारी ने जिस सॉफ्टवेयर आधारित स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम को बनाने के निर्देश दिए हैं, वह एक संगठित और प्रबंधकीय व्यवस्था के रूप में काम करेगा।
इस सॉफ्टवेयर के लागू होने से निम्नलिखित सुधार होंगे:
एक ही डैशबोर्ड पर पूरी जानकारी: हर मुकदमे की वर्तमान स्थिति, उसकी अगली तारीख और फाइल किस टेबल पर रुकी है, इसकी सटीक जानकारी एक जगह मिलेगी।
देरी का कारण दर्ज करना अनिवार्य: अगर कोई फाइल अपनी तय समयसीमा से ज्यादा दिन तक लटकी रहती है, तो सॉफ्टवेयर में इसका स्पष्ट कारण दर्ज करना होगा।
समयबद्ध कार्रवाई और अलर्ट: अधिकारियों को मुकदमों की समयसीमा समाप्त होने से पहले ही सिस्टम से चेतावनी और अलर्ट मिलेंगे।
उच्च अधिकारियों की सीधी नजर: मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और शासन स्तर से आए संदर्भों तथा अदालती आदेशों के अनुपालन की स्थिति को वरिष्ठ अधिकारी सीधे मॉनिटर कर सकेंगे।
यह स्मार्ट तकनीक केवल मुकदमों को गिनने का काम नहीं करेगी, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र में अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का एक डिजिटल जरिया बनेगी।
निर्विवाद विरासतन मामलों को युद्धस्तर पर सुलझाने की जरूरत
जमीन-जायदाद से जुड़े मामलों में एक बड़ा हिस्सा विरासतन यानी उत्तराधिकार के मुकदमों का होता है। इनमें से कई मामले ऐसे होते हैं जिनमें परिवार के सदस्यों के बीच कोई आपसी विवाद या आपत्ति नहीं होती, फिर भी फाइलें महीनों तक पटवारी से लेकर तहसीलदार के दफ्तर तक घूमती रहती हैं।
जिलाधिकारी ने अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं कि निर्विवाद विरासतन मुकदमों को युद्धस्तर पर अभियान चलाकर निपटाया जाए। जब किसी मामले में कोई विवाद ही नहीं है, तो आम नागरिक को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पर मजबूर करना सरासर अन्याय है। इस प्रकार के छोटे और सीधे मामलों के जल्द निपटारे से अदालतों पर से करीब 30 से 50 फीसदी मुकदमों का बोझ अपने आप कम हो सकता है।
जमीनी स्तर पर क्यों लटकते हैं राजस्व के मुकदमे?
राजस्व न्यायालयों की सुस्त कार्यप्रणाली का जब हम गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो इसके पीछे कई प्रशासनिक और सामाजिक कारण सामने आते हैं:
समन और नोटिस की तामीली में देरी: मुकदमों में शामिल पक्षों तक कोर्ट के नोटिस समय पर नहीं पहुंच पाते, जिससे शुरुआती सुनवाई ही महीनों टल जाती है।
राजस्व कर्मियों पर काम का अतिरिक्त बोझ: उप जिलाधिकारी और तहसीलदार अदालती काम के अलावा कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, चुनाव और वीआईपी ड्यूटी में व्यस्त रहते हैं, जिससे अदालती कामकाज प्रभावित होता है।
मौका मुआयना और लेखपाल रिपोर्ट: जमीन के सीमांकन या बंटवारे के मामलों में मौके पर जाकर जांच रिपोर्ट लगाने में महीनों का समय लगा दिया जाता है।
डिजिटल रिकॉर्ड का अभाव: पुरानी फाइलों को खंगालने और पुराने दस्तावेजों को जुटाने में ही अदालतों का काफी समय बर्बाद होता है।
स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम इन्हीं जमीनी कमियों को दूर करने के लिए बनाया जा रहा है ताकि हर स्तर पर काम की रफ्तार ट्रैक की जा सके।
उच्चाधिकारियों की मौजूदगी से प्रशासनिक गंभीरता का संकेत
इस समीक्षा बैठक में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) के.के. मिश्रा, अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) स्मृता परमार, संयुक्त मजिस्ट्रेट राहुल आनंद, नगर मजिस्ट्रेट राकेश तिवारी, उप जिलाधिकारी रविन्द्र ज्वांठा, उप जिलाधिकारी सदर अपूर्वा सिंह, उप जिलाधिकारी डोईवाला अपर्णा ढौंडियाल, उप जिलाधिकारी ऋषिकेश कुमकुम जोशी, संयुक्त निदेशक विधि गिरीश चन्द्र पंचौली और जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) गुरू प्रसाद रतूड़ी सहित तमाम महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। इतने वरिष्ठ अधिकारियों की एक साथ उपस्थिति यह दर्शाती है कि जिला प्रशासन अब मुकदमों के बोझ को हलके में लेने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
आम जनता और राज्य की अर्थव्यवस्था पर इसका दूरगामी असर
राजस्व अदालतों में सुधार का असर सीधे तौर पर राज्य के विकास और आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। जब जमीन से जुड़े विवाद अदालतों में उलझे रहते हैं, तो उस जमीन पर कोई नया निर्माण, उद्योग या कृषि निवेश नहीं हो पाता। पूंजी फंसी रह जाती है और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में परिवारों की जमापूंजी खत्म होती है।
यदि स्मार्ट मॉनिटरिंग के जरिए मुकदमों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित होता है, तो इससे न केवल अदालतों का चक्कर काट रहे हजारों लोगों को राहत मिलेगी, बल्कि जमीन की खरीद-बिक्री, दाखिल-खारिज और औद्योगिक निवेश की राह भी आसान होगी। यह कदम गुड गवर्नेंस और ई-गवर्नेंस की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।


