
अजय सिंह
उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल (यूकेएमसी) में डिप्टी रजिस्ट्रार के पद पर हुई नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया है। सूचना के अधिकार (RTI) से निकले दस्तावेजों ने काउंसिल की निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे एक ही दिन के भीतर लिए गए दो अलग-अलग फैसलों में साफ विरोधाभास नजर आ रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता और पूर्व कृषि अधिकारी चंद्रशेखर जोशी द्वारा जुटाए गए आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर इस पूरे मामले का एक नया विश्लेषण और घटनाक्रम नीचे दिया गया है:
एक ही तारीख, दो विपरीत फैसले: क्या है पूरा मामला?
आरटीआई से मिले दस्तावेजों के मुताबिक, 29 मई 2026 को उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल के भीतर दो ऐसी प्रशासनिक गतिविधियां हुईं जो आपस में मेल नहीं खातीं:
शासन से गुहार: काउंसिल ने इसी दिन (29 मई) चिकित्सा स्वास्थ्य एवं शिक्षा विभाग के सचिव को एक आधिकारिक पत्र भेजा। इसमें कहा गया कि डिप्टी रजिस्ट्रार न होने से काउंसिल का काम ठप पड़ा है, इसलिए शासन इस पर जल्द से जल्द दिशा-निर्देश और अंतिम फैसला दे।
तत्काल नियुक्ति: हैरानी की बात यह है कि शासन के जवाब का इंतजार किए बिना, ठीक इसी दिन काउंसिल ने अपने स्तर पर एक और आदेश जारी कर दिया। इसके तहत डॉ. अजीत मोहन जोहरी को नियमित नियुक्ति होने तक कार्यवाहक डिप्टी रजिस्ट्रार की जिम्मेदारी सौंप दी गई।
दिसंबर में तय हुआ नाम, तो मई में कार्यवाहक क्यों?
विवाद सिर्फ एक दिन के फैसलों तक सीमित नहीं है। आरटीआई के दस्तावेज यह भी खुलासा करते हैं कि काउंसिल की जनरल बॉडी मीटिंग में इस पद को लेकर पहले ही सहमति बन चुकी थी।
24 दिसंबर 2025: काउंसिल की बैठक में आए सभी आवेदनों की स्क्रूटनी के बाद डॉ. संजय जैन को इस पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार माना गया था।
शासन को प्रस्ताव: बैठक में तय हुआ कि डॉ. जैन के नाम पर राज्य सरकार से अंतिम मुहर ली जाए।
इसके बावजूद, अगले पांच महीनों तक यह फाइल ठंडे बस्ते में रही। सवाल यह उठ रहा है कि जब दिसंबर में ही एक योग्य उम्मीदवार का नाम फाइनल कर शासन की मंजूरी के लिए भेजा जा चुका था, तो अचानक मई में उसी दिन शासन से निर्देश भी मांगे गए और उसी दिन दूसरे डॉक्टर को कार्यवाहक प्रभार भी दे दिया गया।
“अगर काउंसिल खुद मान रही थी कि अंतिम निर्णय का अधिकार शासन के पास है और उसने गाइडलाइंस के लिए चिट्ठी भी लिखी, तो फिर उसी दिन किस नियम के तहत कार्यवाहक डिप्टी रजिस्ट्रार की नियुक्ति कर दी गई? यह सीधे तौर पर पारदर्शिता का उल्लंघन है और इसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि जवाबदेही तय हो सके।” – चंद्रशेखर जोशी, आरटीआई कार्यकर्ता
इस पूरे घटनाक्रम ने यूकेएमसी की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग और शासन इस विरोधाभासी नियुक्ति प्रक्रिया पर क्या रुख अपनाते हैं।




