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कर्नाटक सूखा अपील पर मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का प्रधानमंत्री को पत्र: राज्य में तीस प्रतिशत कम बारिश से गहराया संकट, तुरंत केंद्रीय टीम भेजने की मांग

कर्नाटक सूखा अपील के तहत राज्य में मानसून की भारी कमी और कृषि संकट को देखते हुए केंद्र सरकार से आपातकालीन हस्तक्षेप की मांग की गई है। दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में चालू मानसून सीजन के दौरान मानसून की बेरुखी के कारण सूखे के गंभीर हालात उत्पन्न हो गए हैं। इस उभरते हुए प्राकृतिक संकट से निपटने और संकटग्रस्त किसान समुदाय को समय पर आर्थिक व प्रशासनिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधिकारिक पत्र लिखा है। इस विशेष पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप करने और राज्य में सूखे के कारण उत्पन्न हुई जमीनी परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए एक उच्च स्तरीय केंद्रीय अध्ययन दल को तुरंत कर्नाटक भेजने का आग्रह किया है। मुख्यमंत्री का मानना है कि केंद्र सरकार की ओर से समय पर मिलने वाली सहायता से राज्य सरकार के सूखा शमन प्रयासों को काफी बल मिलेगा और किसानों का संबल बढ़ेगा।

मुख्यमंत्री द्वारा प्रधानमंत्री को भेजी गई इस आपातकालीन रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि मानसून में हो रही इस लगातार गिरावट को रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य में कृषि क्षेत्र, पेयजल की उपलब्धता, सिंचाई व्यवस्था और जलविद्युत उत्पादन पर इसका बेहद विनाशकारी और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। राज्य सरकार के अनुसार, प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो प्रभाव के कारण भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने पहले ही चालू दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान सामान्य से कम वर्षा होने का अनुमान व्यक्त किया था, जो अब धरातल पर सच साबित होता दिखाई दे रहा है।

राज्य में सामान्य से तीस प्रतिशत कम दर्ज की गई वर्षा
मौसम विभाग के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने अवगत कराया है कि मध्य जुलाई तक राज्य में बारिश की स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है। निर्धारित समयावधि तक कर्नाटक में सामान्य तौर पर जहां 292 मिलीमीटर वर्षा होनी चाहिए थी, वहीं वास्तविक रूप में केवल 203 मिलीमीटर बारिश ही रिकॉर्ड की गई है। यह आंकड़ा सीधे तौर पर राज्य में 30 प्रतिशत की भारी वर्षा कमी को दर्शाता है।

हालांकि दक्षिण-पश्चिम मानसून ने जून के प्रथम सप्ताह में ही राज्य की सीमाओं में प्रवेश कर लिया था, लेकिन उसके तुरंत बाद मानसून के कमजोर पड़ जाने और एक लंबा अंतराल आ जाने के कारण इसे पूरे राज्य में फैलने में सत्रह दिनों से भी अधिक का लंबा समय लग गया। मानसून की इस धीमी रफ्तार और अनिश्चित वितरण के कारण राज्य के अधिकांश जिलों में जल संकट गहरा गया है और खेती की गतिविधियां पूरी तरह से ठप होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

इकतीस जिलों में से अठारह जिलों में भयंकर सूखे के आसार
कर्नाटक के भौगोलिक और प्रशासनिक क्षेत्रों की बात करें तो यह मानसूनी संकट बेहद व्यापक रूप ले चुका है। मुख्यमंत्री ने पत्र में रेखांकित किया है कि राज्य के कुल 31 जिलों में से 18 जिले इस समय बारिश की अत्यधिक कमी और सूखे जैसी गंभीर परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। यदि तालुका स्तर पर इस स्थिति का विश्लेषण किया जाए, तो राज्य के कुल 240 तालुकाओं में से 141 तालुकाओं में वर्षा का स्तर सामान्य से बेहद नीचे या अत्यंत कम पाया गया है, जो यह साबित करता है कि यह संकट किसी एक हिस्से तक सीमित न होकर पूरे राज्य में फैल चुका है।

सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति राज्य के मलनाड क्षेत्र में बनी हुई है, जो कि कावेरी, तुंगा और भद्रा जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों का मुख्य जलग्रहण क्षेत्र माना जाता है। इस महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र में ही अकेले 34 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। इसके बाद तटीय कर्नाटक में 30 प्रतिशत, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक में 24 प्रतिशत और दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में 18 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे राज्य का पूरा जल चक्र पूरी तरह प्रभावित हो गया है।

मुख्य जलाशयों में बचा है केवल चौंतीस प्रतिशत पानी
कम बारिश होने का सीधा और प्रतिकूल प्रभाव राज्य के जल संसाधनों और बड़े बांधों पर पड़ा है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को सूचित किया है कि राज्य के 14 प्रमुख और बड़े जलाशयों में पानी का भंडारण स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर चुका है। मध्य जुलाई की स्थिति के अनुसार, इन सभी 14 जलाशयों में कुल मिलाकर केवल 303 टीएमसी पानी ही उपलब्ध है, जो कि इनकी कुल सकल भंडारण क्षमता 895.65 टीएमसी का मात्र 34 प्रतिशत ही है।

जलाशयों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में पानी की आवक न होने के कारण आने वाले महीनों में नहरों में सिंचाई के लिए पानी छोड़ना लगभग असंभव हो जाएगा। इसके साथ ही शहरों और ग्रामीण इलाकों में पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करना और राज्य के पनबिजली संयंत्रों से बिजली का उत्पादन जारी रखना भी राज्य सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनने जा रहा है।

मुख्य जलाशयों में बचा है केवल चौंतीस प्रतिशत पानी
कम बारिश होने का सीधा और प्रतिकूल प्रभाव राज्य के जल संसाधनों और बड़े बांधों पर पड़ा है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को सूचित किया है कि राज्य के 14 प्रमुख और बड़े जलाशयों में पानी का भंडारण स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर चुका है। मध्य जुलाई की स्थिति के अनुसार, इन सभी 14 जलाशयों में कुल मिलाकर केवल 303 टीएमसी पानी ही उपलब्ध है, जो कि इनकी कुल सकल भंडारण क्षमता 895.65 टीएमसी का मात्र 34 प्रतिशत ही है।

जलाशयों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में पानी की आवक न होने के कारण आने वाले महीनों में नहरों में सिंचाई के लिए पानी छोड़ना लगभग असंभव हो जाएगा। इसके साथ ही शहरों और ग्रामीण इलाकों में पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करना और राज्य के पनबिजली संयंत्रों से बिजली का उत्पादन जारी रखना भी राज्य सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनने जा रहा है।

खरीफ फसलों की बुआई लक्ष्य के मुकाबले मात्र एक तिहाई हुई
कृषि क्षेत्र की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए पत्र में बताया गया है कि मिट्टी में पर्याप्त नमी न होने और आगे आने वाले दिनों में बारिश की अनिश्चितता के कारण राज्य के किसान नई फसलों की बुआई करने से पूरी तरह कतरा रहे हैं और अत्यधिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। जुलाई के पहले सप्ताह तक के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, राज्य में खरीफ फसलों की बुआई का जो मौसमी लक्ष्य 84.10 लाख हेक्टेयर निर्धारित किया गया था, उसके मुकाबले केवल 28.36 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर ही बुआई का कार्य पूरा किया जा सका है। यह कुल निर्धारित लक्ष्य का केवल 34 प्रतिशत है।

बुआई में आ रही इस भारी गिरावट के चलते फसलों के कुल उत्पादन में भारी कमी आने की पूरी आशंका है। चूंकि कर्नाटक अपने विशेष कृषि-जलवायु क्षेत्रों के कारण देश में दालों, विशेष रूप से अरहर यानी तुअर दाल का एक बहुत बड़ा उत्पादक राज्य है, इसलिए मुख्यमंत्री ने आगाह किया है कि राज्य में कृषि उत्पादन घटने का असर केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर दालों की कुल उपलब्धता और उनके बाजार मूल्यों पर पड़ेगा, जिससे देश भर में खाद्य मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ सकता है।

राज्य सरकार ने शुरू किए जिला स्तरीय राहत उपाय
हालाँकि कर्नाटक सरकार ने अपने स्तर पर कृषि विशेषज्ञों के साथ गहन विचार-विमर्श करके जिला-वार आपातकालीन योजनाएं और वैकल्पिक फसल परामर्श जारी कर दिए हैं, लेकिन संकट की भयावहता को देखते हुए राज्य के संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने स्पष्ट किया है कि भारत सरकार की एक आधिकारिक टीम द्वारा किए जाने वाले इस प्रारंभिक मूल्यांकन से न केवल वास्तविक नुकसान का सटीक पता लग सकेगा, बल्कि इससे देश के अन्नदाताओं को यह भरोसा भी मिलेगा कि संकट की इस घड़ी में पूरी केंद्र सरकार उनके साथ खड़ी है।
राज्य सरकार ने उम्मीद जताई है कि प्रधानमंत्री इस गंभीर आपदा को देखते हुए कर्नाटक की इस सूखा अपील पर त्वरित निर्णय लेंगे और राज्य के सूखा शमन अभियानों को गति देने के लिए हर संभव वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करेंगे ताकि इस उभरते संकट को एक बड़ी मानवीय आपदा में बदलने से रोका जा सके।

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