बिजली कटौती की सूचना में पारदर्शिता लाने के लिए कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के शीर्ष अधिकारियों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अमूमन देखा जाता है कि जब भी बिजली विभाग द्वारा समाचार पत्रों में शटडाउन या मेंटेनेंस से जुड़ी जानकारियां प्रकाशित कराई जाती हैं, तो उनमें केवल फीडर के तकनीकी नामों का जिक्र होता है। इस वजह से आम नागरिकों को यह समझ ही नहीं आता कि उनके अपने इलाके में बिजली आपूर्ति बंद रहेगी या चालू। इसी जनसमस्या को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन ने साफ किया है कि अब से किसी भी फीडर की बंदी की जानकारी देते समय उससे जुड़े हर एक इलाके और मोहल्ले के नाम को अखबार के इश्तहार में स्पष्ट रूप से शामिल करना होगा, ताकि लोग समय रहते अपनी दैनिक तैयारियों को पूरा कर सकें।
बिजली कटौती की सूचना से उपभोक्ताओं को होने वाली परेशानियां और प्रशासनिक दखल
उत्तराखंड के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में बिजली विभाग द्वारा समय-समय पर रखरखाव, लाइनों की मरम्मत और पेड़ों की कटाई-छंटाई के काम के लिए शटडाउन लिया जाता है। नियम के मुताबिक, विभाग को इसकी पूर्व जानकारी स्थानीय दैनिक समाचार पत्रों के माध्यम से सार्वजनिक करनी होती है। हालांकि, लंबे समय से यह देखने में आ रहा था कि बिजली विभाग इन सार्वजनिक विज्ञापनों में बेहद औपचारिकता निभाता है। विज्ञापनों में केवल यह लिख दिया जाता था कि अमुक फीडर से जुड़े इलाकों में फलां समय तक आपूर्ति ठप रहेगी।
तकनीकी रूप से फीडर का नाम लिख देने से केवल विभाग के कर्मचारियों को ही समझ आता था कि काम कहां चल रहा है। आम जनता, जो बिजली विभाग के तकनीकी ढांचे से परिचित नहीं होती, वह यह तय ही नहीं कर पाती थी कि उनका घर, दुकान या संस्थान उस फीडर के दायरे में आता है या नहीं। नतीजा यह होता था कि लोग सुबह-सुबह बिना किसी पूर्व तैयारी के अचानक बिजली गुल होने से परेशान हो जाते थे।
इसी जनसमस्या पर संज्ञान लेते हुए कुमाऊं मंडल के आयुक्त और राज्य के शीर्ष प्रशासनिक तंत्र ने कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने विद्युत निगम के उच्च प्रबंधन को स्पष्ट कर दिया है कि ऐसी अधूरी जानकारियों से आम जनता को राहत मिलने के बजाय परेशानी और असमंजस का सामना करना पड़ता है। इसलिए व्यवस्था में तत्काल प्रभाव से बड़े बदलाव की आवश्यकता है।
तकनीकी शब्दावली के बजाय धरातली जानकारियों की आवश्यकता
बिजली वितरण व्यवस्था में फीडर एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीकी हिस्सा होता है। एक फीडर से कई अलग-अलग मोहल्ले, कॉलोनियां, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, ग्रामीण इलाके और छोटे-बड़े संस्थान जुड़े होते हैं। जब कोई फीडर बंद किया जाता है, तो उससे जुड़े पूरे इलाके की बिजली एक साथ बंद हो जाती है।
समस्या यह थी कि बिजली विभाग जब अखबारों में सूचना जारी करता था, तो उसमें सिर्फ फीडर का कोड या नाम लिख दिया जाता था। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी शहर के किसी खास फीडर का नाम सार्वजनिक किया गया, तो उस क्षेत्र में रहने वाले आम नागरिक को यह पता ही नहीं चल पाता था कि उनका मोहल्ला उस घेरे में आता है या नहीं।
इस अव्यवस्था के कारण कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा होती थीं:
पेयजल संकट: घरों में सुबह के समय पानी के पंप नहीं चल पाते थे, जिससे लोगों को पीने और दैनिक कामों के लिए पानी नहीं मिल पाता था।
दैनिक कामकाज प्रभावित: गृहिणियों से लेकर दफ्तर जाने वाले लोगों के काम समय पर पूरे नहीं हो पाते थे।
व्यावसायिक नुकसान: छोटे दुकानदारों, वर्कशॉप संचालकों और ऑनलाइन काम करने वाले व्यवसायियों को अचानक काम ठप होने से आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता था।
अस्पताल और क्लीनिक: छोटे स्वास्थ्य केंद्रों और क्लीनिकों में भी मरीजों को अचानक बिजली जाने से दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।
प्रशासन का स्पष्ट मानना है कि सूचना देने का मूल उद्देश्य जनता को सतर्क करना है, न कि केवल विभागीय कागजी कार्रवाई पूरी करना। यदि कोई सूचना पढ़कर नागरिक यह न समझ सके कि उसका क्षेत्र प्रभावित हो रहा है या नहीं, तो ऐसी सूचना का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
कुमाऊं आयुक्त के कड़े निर्देश और UPCL की जवाबदेही
जनहित से जुड़ी इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए कुमाऊं मंडल के आयुक्त और मुख्यमंत्री सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारी दीपक रावत ने उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के मुख्य अभियंता को कड़ा निर्देश जारी किया है। हल्द्वानी और रुद्रपुर क्षेत्र के विद्युत प्रबंधन को स्पष्ट रूप से निर्देशित किया गया है कि भविष्य में किसी भी प्रकार की मेंटेनेंस या कटौती की स्थिति में पुरानी परिपाटी को पूरी तरह बंद किया जाए।
आयुक्त द्वारा जारी आदेश में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें रेखांकित की गई हैं:
क्षेत्रवार नाम अनिवार्य: अब से जब भी समाचार पत्रों में प्रेस नोट या विज्ञापन जारी किया जाएगा, तो फीडर के नाम के साथ-साथ उससे जुड़े उन सभी प्रमुख मोहल्लों, कॉलोनियों, गांवों और बाजारों के नाम स्पष्ट और बड़े अक्षरों में दर्ज करने होंगे, जहां बिजली आपूर्ति ठप रहेगी।
पूर्व सूचना की समय सीमा: कटौती की जानकारी कम से कम एक या दो दिन पहले प्रमुख स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित होनी चाहिए, ताकि सूचना हर नागरिक तक आसानी से पहुंच सके।
सटीक समय का उल्लेख: किस क्षेत्र में बिजली कितने बजे से कितने बजे तक बंद रहेगी, इसका बिल्कुल सटीक और स्पष्ट ब्योरा देना होगा।
अधिकारियों की जवाबदेही: यदि किसी क्षेत्र का नाम दिए बिना बिजली काटी जाती है या अधूरी सूचना के कारण जनता को परेशानी होती है, तो संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों और अभियंताओं से जवाब तलब किया जाएगा।
इस आदेश के बाद अब पावर कॉर्पोरेशन के अधिकारियों को अपने संबंधित क्षेत्रों का एक पूरा खाका तैयार करना होगा। हर फीडर के अंतर्गत आने वाले सभी छोटे-बड़े इलाकों की एक सूची बनानी होगी, ताकि जब भी उस फीडर पर काम लगे, तो उन सभी इलाकों के नाम तुरंत प्रेस विज्ञप्ति में शामिल किए जा सकें।
उपभोक्ताओं के अधिकारों और सहूलियत पर केंद्रित कदम
राज्य सरकार और मंडल प्रशासन का यह कदम सीधे तौर पर आम नागरिकों और बिजली उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता है। जब किसी परिवार को यह पहले से पता होगा कि उनके इलाके में कल सुबह नौ बजे से दोपहर दो बजे तक बिजली नहीं रहेगी, तो वे उसी हिसाब से अपनी दिनचर्या की योजना बना सकते हैं।
पूर्व सूचना सही और स्पष्ट होने से उपभोक्ताओं को कई सहूलियतें मिलेंगी:
पानी का भंडारण: लोग बिजली कटने से पहले ही पानी की टंकियां भर सकेंगे और दैनिक कार्यों के लिए जल जुटा सकेंगे।
इन्वर्टर और उपकरणों की सुरक्षा: लोग अपने घरों के बैकअप सिस्टम को चार्ज रख सकेंगे और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रूप से बंद कर सकेंगे।
समय का प्रबंधन: व्यापारी अपने कामकाज के घंटों को पुनर्गठित कर सकेंगे और गृहिणियां खाना पकाने व कपड़े धोने जैसे बिजली से जुड़े काम समय से पहले या बाद में निपटा सकेंगी।
अनावश्यक आक्रोश से बचाव: जब जनता को पहले से सही जानकारी होगी, तो वे बिजली जाने पर परेशान होकर सब-स्टेशन या विभाग के दफ्तरों में फोन करके कर्मचारियों से उलझेंगे नहीं, जिससे शांति व्यवस्था बनी रहेगी।
भविष्य की व्यवस्था और बदलाव की उम्मीद
उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के हल्द्वानी और रुद्रपुर मंडलों में इस आदेश के लागू होने के बाद पूरे कुमाऊं क्षेत्र में बिजली वितरण से जुड़ी सूचना प्रणाली में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। प्रशासन के इस रुख से विभागीय कार्यशैली में अधिक पारदर्शिता और संवेदनशीलता आने की उम्मीद है।
अक्सर सरकारी महकमों में जनसूचनाओं को केवल एक कानूनी औपचारिकता माना जाता है। लेकिन इस कड़े फैसले ने यह साबित किया है कि शासन और प्रशासन की प्राथमिकता में आम उपभोक्ता का अनुभव और उसकी सुविधा सबसे ऊपर है। यदि सूचना प्रणाली को उपभोक्ता-अनुकूल बना दिया जाए, तो आधे से अधिक जनसमस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विद्युत निगम के मैदानी अधिकारी इस आदेश का कितनी तत्परता और ईमानदारी से पालन करते हैं। उम्मीद यही जताई जा रही है कि अगले शटडाउन से समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाली खबरें केवल तकनीकी पहेली बनकर नहीं रहेंगी, बल्कि वे हर नागरिक के लिए बेहद उपयोगी और स्पष्ट माध्यम साबित होंगी।


