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गौरव सेनानी मिलन: “सैनिक कभी भूतपूर्व नहीं होता”, हल्द्वानी कार्यक्रम में बोले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

आर्यन सिंह: गौरव सेनानी मिलन एवं पूर्व सैनिक सम्मान समारोह के पावन अवसर पर देवभूमि उत्तराखंड की वीरगाथा और सैनिकों के प्रति अटूट सम्मान का एक बेहद भावुक और गरिमामय दृश्य देखने को मिला। कुमाऊं मंडल की सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र हल्द्वानी में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में पूरे क्षेत्र से उमड़े पूर्व सैनिकों, वीरांगनाओं और उनके परिवारों की उपस्थिति ने माहौल को राष्ट्रभक्ति के रंगों से सराबोर कर दिया। मंच से बोलते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक ऐसी बात कही जो हर सैनिक के दिल को गहराई से छू गई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाला सैनिक कभी पूर्व या भूतपूर्व नहीं होता, बल्कि वह जीवन के अंतिम क्षण तक एक समर्पित सैनिक ही रहता है। वर्दी भले ही उतर जाए, लेकिन नस-नस में दौड़ने वाला अनुशासन, देशभक्ति का जज्बा और देश के लिए मर मिटने का संकल्प कभी सेवानिवृत्त नहीं होता।

मुख्यमंत्री ने पूर्व सैनिकों की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि जिन्हें समाज अक्सर भूतपूर्व कहकर संबोधित करता है, वे वास्तव में अभूतपूर्व हैं। उनके पास जीवन का वह अनुभव, कठोर प्रशिक्षण और राष्ट्र के प्रति निःस्वार्थ समर्पण होता है, जो किसी भी समाज और देश को एक नई और सही दिशा दिखाने में सक्षम है। जब एक सैनिक सीमा से लौटकर समाज के बीच आता है, तो वह केवल एक नागरिक के रूप में नहीं लौटता, बल्कि अपने साथ अनुशासन और राष्ट्रसेवा की वह मशाल लेकर आता है जिसकी रोशनी से पूरा देश आलोकित होता है। हल्द्वानी की इस विशाल जनसभा में पूर्व सैनिकों का जो जनसैलाब उमड़ा था, वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था कि उत्तराखंड की धरती पर सैनिकों का स्थान सबसे ऊंचा है और उनके त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

सैनिक परिवारों के प्रति संवेदनशीलता और देवभूमि का गौरवशाली सैन्य इतिहास
समारोह के दौरान मुख्यमंत्री ने अत्यंत भावुक होकर अपने व्यक्तिगत जीवन के संस्मरण भी साझा किए। उन्होंने बताया कि वे स्वयं एक सैनिक के परिवार से आते हैं और उन्होंने बचपन से ही एक सैनिक के जीवन के संघर्षों, उनके परिवारों की दैनिक चुनौतियों और उनके द्वारा दिए जाने वाले त्याग को बहुत करीब से देखा और महसूस किया है। एक सैनिक जब सीमा पर देश की रक्षा में तैनात होता है, तो उसका परिवार घर पर जिस धैर्य, साहस और संयम के साथ दिन बिताता है, वह भी किसी महान तपस्या से कम नहीं होता। यही कारण है कि वे सैनिक परिवारों के दुख-दर्द और उनकी आवश्यकताओं को किसी सरकारी दस्तावेज के नजरिए से नहीं, बल्कि एक सैनिक पुत्र की हैसियत से दिल से समझते हैं।

उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि यह वह पवित्र भूमि है जिसे दुनिया वीरभूमि के नाम से पूजती है। इस धरती की मिट्टी में शौर्य और बलिदान का इतिहास रचा-बसा है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अपने पराक्रम का लोहा मनवाकर विक्टोरिया क्रॉस हासिल करने वाले अमर शहीद दरबान सिंह नेगी और गबर सिंह नेगी की वीरता की गाथाएं आज भी पहाड़ियों की वादियों में गूंजती हैं। इसके साथ ही, स्वतंत्र भारत में देश की सेना को शीर्ष नेतृत्व देने वाले जनरलों की एक लंबी श्रृंखला इस माटी ने दी है। भारतीय सेना के थल सेनाध्यक्ष रहे जनरल बी. सी. जोशी से लेकर देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत तक, न जाने कितने ही महान सपूतों को इस राज्य ने जन्म दिया है। जब-जब देश की अखंडता और संप्रभुता पर कोई संकट आया है, तब-तब उत्तराखंड के वीरों ने अपने सीने पर गोली खाकर भारत माता के मस्तक को हमेशा ऊंचा रखा है।

राष्ट्र रक्षा में आत्मनिर्भरता और आधुनिक सैन्य सामर्थ्य का नया दौर
कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख राजनीतिक हस्तियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने देश की बदलती सैन्य व्यवस्था और सामर्थ्य पर विस्तार से चर्चा की। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले एक दशक में भारत की रक्षा नीति और सैन्य तैयारियों में एक बहुत बड़ा और दूरगामी बदलाव देखने को मिला है। आज का भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा के मामले में किसी अन्य देश पर निर्भर रहने के बजाय पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनने की राह पर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारतीय सेना को न केवल आधुनिकतम हथियारों से लैस किया गया है, बल्कि देश के भीतर ही स्वदेशी तकनीकों और रक्षा उपकरणों का निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हो चुका है।

आज भारत रक्षा क्षेत्र में केवल आयात करने वाला देश नहीं रह गया है, बल्कि वह दुनिया के कई देशों को अपने देश में बने अत्याधुनिक रक्षा उत्पाद और सैन्य हथियार निर्यात कर रहा है। यह नया भारत अपनी सीमाओं की रक्षा करने और अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने के लिए पूरी दृढ़ता, साहस और क्षमता के साथ कड़े निर्णय लेने में सक्षम है। सीमाओं पर तैनात जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए देश का शीर्ष नेतृत्व खुद त्योहारों के अवसर पर उनके बीच पहुंचता है, जिससे सीमा पर खड़े अंतिम जवान को भी यह अहसास होता है कि पूरा देश उसके साथ मुस्तैदी से खड़ा है। इसके अलावा, सीमावर्ती इलाकों के प्रति देश के दृष्टिकोण में भी एक बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है। जिन्हें कभी देश के दूरस्थ या अंतिम गांव मानकर उपेक्षित छोड़ दिया जाता था, आज उन्हें देश के प्रथम गांव का दर्जा देकर वहां बुनियादी ढांचे, सड़कों, संचार सुविधाओं और रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता के आधार पर विकसित किया जा रहा है।

पूर्व सैनिकों और शहीदों के आश्रितों के लिए राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं
उत्तराखंड सरकार ने राज्य के सेवारत सैनिकों, पूर्व सैनिकों, वीरांगनाओं और उनके परिवारों के जीवन को बेहतर और सुगम बनाने के लिए कई ऐतिहासी और अभूतपूर्व फैसले लिए हैं। सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी ने कार्यक्रम में बताया कि राज्य सरकार पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी समस्याओं के त्वरित और प्रभावी समाधान के लिए पूरी निष्ठा के साथ काम कर रही है। चाहे बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मामला हो, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने की बात हो या फिर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता हो, हर स्तर पर सैनिक कल्याण विभाग योजनाओं को धरातल पर उतारने में लगा हुआ है।

राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई प्रमुख कल्याणकारी पहलों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
आर्थिक सहायता में भारी वृद्धि: देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर बलिदानी सैनिकों के आश्रितों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि को पांच गुना बढ़ाकर 10 लाख रुपये से सीधे 50 लाख रुपये कर दिया गया है, ताकि संकट की घड़ी में उनके परिवार को मजबूत आर्थिक आधार मिल सके।
सर्वोच्च सैन्य सम्मान विजेताओं का प्रोत्साहन: देश का सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ प्राप्त करने वाले शूरवीर योद्धाओं को राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली एकमुश्त अनुदान राशि को 50 लाख रुपये से बढ़ाकर सीधे 2 करोड़ रुपये की एक विशाल सम्मान राशि में बदल दिया गया है।
सरकारी नौकरियों में राहत और समय-सीमा में छूट: शहीद सैनिकों के परिवार के किसी एक आश्रित सदस्य को उसकी योग्यता के अनुसार राज्य की सरकारी सेवा में समायोजित करने का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं, परिजनों की व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए आवेदन करने की समय-सीमा को 2 वर्ष से बढ़ाकर सीधे 5 वर्ष कर दिया गया है।
संपत्ति की खरीद पर स्टाम्प शुल्क में विशेष छूट: राज्य के सेवारत और पूर्व सैनिकों को अपना घर या जमीन खरीदने में आर्थिक राहत देने के उद्देश्य से 25 लाख रुपये तक की अचल संपत्ति की खरीद पर लगने वाले स्टाम्प शुल्क में 25 प्रतिशत की विशेष छूट दी जा रही है।
प्राथमिकता के आधार पर शिकायतों का निस्तारण: राज्य के सभी प्रशासनिक और पुलिस कार्यालयों में पूर्व सैनिकों और वीरांगनाओं की समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर सुनने और उनके त्वरित निस्तारण के लिए विशेष निर्देश जारी किए गए हैं।

देहरादून में भव्य ‘सैन्य धाम’ का निर्माण: आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणापुंज
उत्तराखंड के इस गौरवशाली सैन्य इतिहास को सहेजने और शहीदों की स्मृतियों को अमर बनाने के उद्देश्य से राजधानी देहरादून के गुनियाल गांव में एक विशाल और भव्य ‘सैन्य धाम’ का निर्माण किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने बताया कि इस ड्रीम प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और बहुत जल्द यह ऐतिहासिक स्मारक राष्ट्र को समर्पित कर दिया जाएगा। उत्तराखंड को अगर देवभूमि के साथ-साथ ‘पंचम धाम’ की संज्ञा दी जाती है, तो यह बन रहा सैन्य धाम राज्य के पांचवें धाम के रूप में स्थापित होगा, जहां देश और दुनिया भर से आने वाले लोग उत्तराखंड के वीर सपूतों की शहादत को नमन कर सकेंगे।

इस भव्य सैन्य धाम को बनाने के लिए राज्य के उन सभी आंगन से मिट्टी एकत्र की गई है, जिनके बेटों ने देश की रक्षा में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। यह पवित्र धाम न केवल अमर शहीदों के त्याग और शौर्य का एक जीवंत प्रतीक बनेगा, बल्कि यहां आने वाली हर नई पीढ़ी और युवाओं के दिलों में देशभक्ति, राष्ट्रसेवा और समर्पण की एक अमर ज्वाला जलाने का काम करेगा। यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को यह अहसास होगा कि जिस शांति और स्वतंत्रता का वे आनंद ले रहे हैं, उसके पीछे हमारे वीर जवानों का कितना बड़ा त्याग और तपस्या छिपी हुई है।

सम्मान समारोह में गणमान्य हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति
हल्द्वानी में आयोजित यह गौरव सेनानी मिलन केवल एक औपचारिक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह पूर्व सैनिकों और राज्य के शीर्ष नेतृत्व के बीच एक सीधे और आत्मीय संवाद का मंच बन गया। इस विशाल आयोजन में कुमाऊं मंडल के कोने-कोने से पहुंचे हजारों पूर्व सैनिकों और वीरांगनाओं ने अपने सुझाव और अनुभव साझा किए। राज्य सरकार के मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने व्यक्तिगत रूप से वीरांगनाओं से मुलाकात की और उनके साहस तथा धैर्य को नमन करते हुए उन्हें सम्मानित किया।

इस ऐतिहासिक अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट, क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद अजय भट्ट, कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा, भाजपा जिलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट, कार्यक्रम संयोजक सुरेश भट्ट, ध्रुव रौतेला, पूर्व मेयर जोगेंद्र रौतेला सहित कई अन्य वरिष्ठ जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक मौजूद रहे। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सैनिक परिवार समाज की रीढ़ हैं और उनका सम्मान करना पूरे देश का परम कर्तव्य है। राज्य सरकार ने यह दोहराया है कि सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए संसाधनों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी और उनके हितों की रक्षा के लिए सरकार हर कदम पर चट्टान की तरह उनके साथ खड़ी रहेगी।

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