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‘यात्रा दुःख से आनन्द की ओर’ के विमोचन पर बोले राज्यपाल गुरमीत सिंह, आत्मबोध और सही सोच से ही मिलता है सच्चा सुख

‘यात्रा दुःख से आनन्द की ओर’ नामक प्रेरणादायी पुस्तक का हाल ही में लोक भवन के गरिमामय प्रांगण में एक विशेष कार्यक्रम के दौरान औपचारिक रूप से लोकार्पण संपन्न हुआ। उत्तराखंड के माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट और ख्यातिप्राप्त लेखक डॉ. कृष्ण अवतार द्वारा रचित इस कृति का विमोचन करते हुए उन्हें इस अत्यंत अर्थपूर्ण, मानव-कल्याणकारी और विचारोत्तेजक साहित्यिक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई एवं ढेरों शुभकामनाएं प्रेषित कीं। इस विशेष अवसर पर आयोजित समारोह में समाज, चिकित्सा, अध्यात्म और मीडिया जगत से जुड़ी कई गणमान्य हस्तियां प्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहीं और उन्होंने पुस्तक के मुख्य संदेश तथा उसके मानवीय पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।

मानव जीवन में सोच और आंतरिक संवाद का गहरा प्रभाव
समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने जीवन दर्शन के विभिन्न गूढ़ पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य का संपूर्ण जीवन उसकी व्यक्तिगत सोच, आंतरिक विचारों और बनाई गई धारणाओं से गहराई से संचालित होता है। हम अपने दैनिक जीवन में आने वाली किसी भी कठिन या सरल परिस्थिति को किस दृष्टिकोण से देखते हैं, वही दृष्टिकोण हमारे प्रत्यक्ष अनुभवों और मानसिक स्थिति को तय करता है। राज्यपाल ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वास्तविक खुशी या सुख कभी भी बाहरी भौतिक परिस्थितियों या साधनों पर पूरी तरह निर्भर नहीं होता, बल्कि यह अपने स्वयं के आंतरिक स्वरूप को गहराई से समझने और स्वीकार करने में निहित होता है।

उन्होंने आगे चिंतन व्यक्त करते हुए कहा कि संपूर्ण ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप प्रत्येक मनुष्य के भीतर ही समाहित है। जब कोई व्यक्ति अपनी आंखें मूंदकर शांत चित्त से अपने अंदर झांकता है, तो उसकी आत्मा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा उससे एक अत्यंत सूक्ष्म संवाद स्थापित करती है। हालांकि, सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या हमने भागदौड़ भरी जिंदगी में उस आंतरिक संवाद को सुनना, महसूस करना और सही ढंग से समझना सीखा है। यदि मनुष्य अपने अंदर उठने वाली आवाजों को सुनने की कला सीख ले, तो उसकी आधी से अधिक मानसिक समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो जाएगा।

दुःख केवल कष्ट नहीं, बल्कि स्वयं को जानने का एक अनुपम अवसर
माननीय राज्यपाल ने पुस्तक की मूल अवधारणा की प्रशंसा करते हुए स्पष्ट किया कि डॉ. कृष्ण अवतार की यह रचना दुःख को मात्र एक कष्ट, बाधा या विपत्ति के रूप में नहीं प्रस्तुत करती। इसके विपरीत, यह पुस्तक दुःख को स्वयं के वास्तविक अस्तित्व को पहचानने, अपनी छिपी हुई आंतरिक शक्तियों को जागृत करने और आत्म-निरीक्षण करने के एक बेहतरीन अवसर के रूप में देखने की अनूठी प्रेरणा देती है। जब मनुष्य जीवन में दुखों या विपरीत परिस्थितियों का सामना करता है, तो वही समय उसके दृढ़ संकल्प और वास्तविक क्षमता की परीक्षा लेता है।

लेखक की पृष्ठभूमि की सराहना करते हुए राज्यपाल ने बताया कि डॉ. कृष्ण अवतार ने विगत तीन दशकों से भी अधिक समय तक एक कुशल चिकित्सक और न्यूरोलॉजिस्ट के रूप में अनगिनत मरीजों की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को बहुत करीब से देखा, महसूस किया और उसका उपचार किया है। अब एक संवेदनशील लेखक के रूप में उन्होंने अपने इतने लंबे डॉक्टरी अनुभव, गूढ़ आध्यात्मिक चिंतन और जीवन के गहन व्यावहारिक अनुभवों को एक सूत्र में पिरोने का स्तुत्य काम किया है। उनका यह प्रयास हर उस व्यक्ति के लिए एक मार्गदर्शक का काम करेगा जो जीवन में किसी भी प्रकार के तनाव या संताप से गुजर रहा है।

मानसिक संशय, आत्मबोध और स्वयं की महत्ता की पहचान
कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने मानव मन की जटिलताओं और उसमें पनपने वाली विभिन्न भ्रांतियों पर भी खुलकर चर्चा की। उन्होंने बेहद व्यावहारिक बात कहते हुए कहा कि जीवन में किसी के प्रति शक करना, गलतफहमियां पालना और अनावश्यक संदेह बनाए रखना ऐसी जटिल मानसिक समस्याएं हैं, जिनकी कोई भी निश्चित दवा दुनिया के किसी भी योग्य डॉक्टर या चिकित्सा प्रणाली के पास उपलब्ध नहीं है। इन आंतरिक विकारों और संशयों का स्थाई समाधान हर व्यक्ति को स्वयं अपने विवेक और चिंतन के माध्यम से ही खोजना पड़ता है।

इसके लिए जीवन में विचारों की स्पष्टता, मानसिक शुद्धता और सच्चा आत्मबोध होना परम आवश्यक है। उन्होंने रेखांकित किया कि जीवन का सबसे बड़ा और कठिन संघर्ष किसी दूसरे से मुकाबला करना नहीं, बल्कि स्वयं को गहराई से समझना है। जब तक कोई व्यक्ति अपनी खुद की महत्ता, आत्म-सम्मान और अपनी आंतरिक क्षमता को सही मायने में नहीं पहचान पाता, तब तक वह सच्चे सुख और शांति की अनुभूति नहीं कर सकता। स्वयं की कीमत को जानना ही आनन्द के मार्ग पर आगे बढ़ने का पहला महत्वपूर्ण कदम है।

आशा, विश्वास और जीवन को नई दिशा देने वाला अनुपम प्रयास
अपने संबोधन के समापन चरण में राज्यपाल ने लेखक के दोहरे योगदान की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि एक समर्पित चिकित्सक के रूप में डॉ. कृष्ण अवतार ने पिछले कई दशकों से अनगिनत लोगों का सफल इलाज करके उनके जीवन की रक्षा की है। वहीं अब एक प्रबुद्ध लेखक के रूप में वे लोगों को जीवन का वास्तविक अर्थ समझाने, उन्हें मानसिक संबल देने और उनके जीवन को एक नई सकारात्मक दिशा प्रदान करने का महान कार्य कर रहे हैं। चिकित्सा और साहित्य का यह संगम समाज के लिए अत्यंत कल्याणकारी है।

राज्यपाल ने अपनी यह हार्दिक इच्छा और आशा व्यक्त की कि यह महत्वपूर्ण पुस्तक केवल पुस्तकालयों की अलमारियों या सजावटी रैक तक ही सीमित न रहे। बल्कि इसका व्यापक प्रचार-प्रसार हो ताकि यह पुस्तक गंभीर बीमारी, असफलता, अकेलेपन, अवसाद और गहरे मानसिक दुःख से जूझ रहे प्रत्येक व्यक्ति तक आसानी से पहुंच सके। उन्होंने विश्वास जताया कि दुखों के अंधकार में भटक रहे लोगों के लिए यह रचना आशा की एक नई किरण साबित होगी और उनके भीतर खोए हुए आत्मविश्वास को पुनः जगाने में पूरी तरह समर्थ होगी।

कार्यक्रम में उपस्थित सम्मानित और गणमान्य महानुभाव
लोक भवन में आयोजित इस गरिमामय और भव्य लोकार्पण समारोह में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी अनेक प्रमुख हस्तियों ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। समारोह में उत्तराखंड की प्रथम महिला श्रीमती गुरमीत कौर विशेष रूप से उपस्थित रहीं। इसके अलावा प्रशासनिक और शासकीय सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जैसे प्रमुख सचिव श्री रमेश कुमार सुधांशु तथा डॉ. आर मीनाक्षी सुन्दरम भी कार्यक्रम का हिस्सा बने।

आध्यात्मिक जगत से देहरादून स्थित प्रसिद्ध टपकेश्वर महादेव मंदिर के पूज्य श्री महंत कृष्णा गिरी महाराज ने अपनी पावन उपस्थिति से कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान की। पत्रकारिता जगत से दैनिक जागरण देहरादून के वरिष्ठ संपादक श्री मनोज कुमार झा, श्रीकांत शर्मा तथा श्री कमल कांत गर्ग सहित शहर के कई अन्य गणमान्य नागरिक, बुद्धिजीवी और प्रबुद्धजन इस संपूर्ण कार्यक्रम के साक्षी बने। सभी उपस्थित अतिथियों ने पुस्तक की सराहना की और इसे वर्तमान दौर में मानसिक शांति प्राप्त करने का एक अत्यंत उपयोगी माध्यम बताया।

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