मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में आयोजित एक गरिमामय समारोह के दौरान उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी द्वारा संचालित चार ऐतिहासिक और सफल पर्वतारोहण अभियानों का विधिवत समापन करते हुए उनका ध्वज-वापसी समारोह आयोजित किया। इन अभियानों में दक्षिण अमेरिका की सबसे ऊंची चोटी और हिमालय की अति-चुनौतीपूर्ण नुन-कुन पर्वत श्रृंखला पर लहराया गया तिरंगा शामिल है। मुख्यमंत्री ने कठिन परिस्थितियों में भी अदम्य साहस, उच्च तकनीकी ज्ञान और टीम भावना का परिचय देने वाले सभी पर्वतारोहियों की सराहना की। यह ऐतिहासिक अवसर न केवल पर्वतारोहण के क्षेत्र में भारत के बढ़ते कदमों को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि उत्तराखण्ड देवभूमि होने के साथ-साथ विश्व स्तर पर साहसिक खेलों और युवा नेतृत्व का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से परे: अर्जेंटीना के माउंट एकांकागुआ पर भारत की संयुक्त विजय
इस आयोजन का सबसे प्रमुख आकर्षण नेहरू पर्वतारोहण संस्थान और जवाहर इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड विंटर स्पोर्ट्स पहलगाम का संयुक्त माउंट एकांकागुआ अभियान रहा। दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के अर्जेंटीना देश में स्थित माउंट एकांकागुआ की कुल ऊंचाई छः हजार नौ सौ इकसठ मीटर है। यह एशिया महाद्वीप के बाहर स्थित दुनिया की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है।
इस संयुक्त अभियान दल का नेतृत्व कर्नल हेम चंद्र सिंह ने किया था। छह सदस्यों वाले इस जांबाज दल ने दो हजार छब्बीस के बाइस फरवरी को अत्यधिक प्रतिकूल मौसम और कम ऑक्सीजन की चुनौतियों का सामना करते हुए इस दुर्गम शिखर पर भारत का राष्ट्रध्वज सफलतापूर्वक फहराया। इस राष्ट्रीय महत्व के अभियान को भारत के रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली स्थिति साउथ ब्लॉक से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। दो शीर्ष राष्ट्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के इस तालमेल ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय पर्वतारोही वैश्विक स्तर पर भी किसी भी दुर्गम चोटी को फतह करने की पूरी क्षमता रखते हैं।
नुन-कुन पर्वतारोहण अभियान: एक ही यात्रा में तीन प्रमुख शिखरों पर तिरंगा
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान द्वारा आयोजित नुन-कुन अभियान दो हजार छब्बीस ने पर्वतारोहण के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा है। संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल एस. एस. राजपुरोहित के कुशल और साहसी नेतृत्व में निकले इस अभियान दल ने एक ही यात्रा के दौरान तीन कठिन चोटियों को फतह करने का अप्रतिम रिकॉर्ड बनाया।
अभियान दल की पहली बड़ी सफलता पंद्रह अगस्त दो हजार छब्बीस को आई, जब स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर दल के सदस्यों ने सात हजार सतहत्तर मीटर ऊंचे माउंट कुन के शिखर पर सफलतापूर्वक कदम रखा। स्वतंत्रता दिवस पर मिली इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद दल का उत्साह और बढ़ गया। इसके बाद छब्बीस अगस्त को दल ने पांच हजार नौ सौ आठ मीटर ऊंची माउंट डेल्टा-इकतालीस चोटी को फतह किया और अंततः इकतीस अगस्त को सात हजार एक सौ पैंतीस मीटर ऊंचे विशाल माउंट नुन के शिखर पर विजय प्राप्त की। एक ही अभियान में तीन विशालकाय शिखरों को सफलतापूर्वक फतह करना पर्वतारोहियों के असाधारण शारीरिक और मानसिक अनुशासन को दर्शाता है।
युवा विकास, साहस और चरित्र निर्माण में संस्थान की अनुकरणीय भूमिका
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी केवल एक प्रशिक्षण केंद्र नहीं है, बल्कि यह देश के युवाओं में चरित्र निर्माण और राष्ट्र सेवा का जज्बा पैदा करने वाली एक प्रमुख संस्था है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में विशेष रूप से उल्लेख किया कि इस संस्थान ने उच्च हिमालयी प्रशिक्षण और साहसिक खेलों के क्षेत्र में देश-विदेश में अपनी एक विशिष्ट और विश्वसनीय पहचान बनाई है।
संस्थान द्वारा युवाओं को प्रदान किया जाने वाला उच्च स्तरीय प्रशिक्षण उन्हें जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों का मुस्कुराकर सामना करने की सीख देता है। पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं होते, बल्कि वे इंसान को धैर्य, अनुशासन, दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता सिखाते हैं। जब कोई युवा सात हजार मीटर की ऊंचाई पर बर्फीले तूफानों के बीच निर्णय लेता है, तो उसमें अदम्य आत्मविश्वास का संचार होता है। यही आत्मविश्वास आगे चलकर समाज और देश के निर्माण में काम आता है।
उत्तराखण्ड में साहसिक पर्यटन और आर्थिक विकास के नए द्वार
उत्तराखण्ड की भौगोलिक बनावट और प्राकृतिक सुंदरता इसे साहसिक पर्यटन के लिए दुनिया का सबसे उपयुक्त स्थान बनाती है। राज्य में विशाल नदियां, ऊंचे बर्फीले पहाड़, घने जंगल और दुर्गम ट्रैकिंग मार्ग मौजूद हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि पर्वतारोहियों की ऐसी वैश्विक सफलताएं राज्य की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करती हैं।
जब उत्तरकाशी जैसा क्षेत्र पर्वतारोहण अभियानों का केंद्र बनता है, तो इससे राज्य के भीतर होम-स्टे योजना, स्थानीय गाइड, ट्रैकिंग एजेंसियां, कुली, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों को रोजगार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवसर मिलते हैं। पर्वतारोहण अभियानों की सफलता से दुनिया भर के पर्यटकों और पर्वतारोहियों का ध्यान देवभूमि की ओर आकर्षित होता है। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिलती है और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकने में भी बड़ी मदद मिलती है।
उच्च हिमालयी अभियानों की चुनौतियां और तकनीकी दक्षता का महत्व
उच्च हिमालयी क्षेत्रों या फिर छः हजार मीटर से अधिक ऊंची चोटियों पर आरोहण करना कोई सामान्य बात नहीं होती। इन क्षेत्रों में पर्वतारोहियों को बेहद विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। शून्य से कई डिग्री नीचे का तापमान, बर्फीले तूफान, हिमस्खलन का खतरा, और हवा में ऑक्सीजन का लगातार घटता स्तर किसी भी इंसान की शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की अंतिम परीक्षा लेता है।
ऐसे खतरनाक माहौल में केवल शारीरिक मजबूती काम नहीं आती, बल्कि इसके लिए आधुनिक तकनीकी उपकरणों का ज्ञान, सटीक मौसम पूर्वानुमान का विश्लेषण और बेहतरीन टीम तालमेल की आवश्यकता होती है। कर्नल एस. एस. राजपुरोहित और कर्नल हेम चंद्र सिंह जैसे अनुभवी सैन्य अधिकारियों के नेतृत्व ने यह सुनिश्चित किया कि दल के सभी सदस्य सुरक्षित रहते हुए अपने लक्ष्यों को हासिल करें। यह तकनीकी निपुणता ही भारतीय संस्थानों को विश्व स्तरीय बनाती है।
समारोह में दिग्गजों की उपस्थिति और नई पीढ़ियों के लिए संदेश
कैंप कार्यालय में आयोजित इस सम्मान और ध्वज-वापसी कार्यक्रम में खेल एवं युवा कल्याण विभाग के विशेष प्रमुख सचिव श्री अमित कुमार सिन्हा, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल एस. एस. राजपुरोहित, पहलगाम संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल हेम चंद्र सिंह और कैप्टन जी. संतोष कुमार सहित अभियानों में शामिल सभी जांबाज सदस्य उपस्थित थे। सभी अधिकारियों और पर्वतारोहियों की उपस्थिति ने इस अवसर को बेहद प्रेरणादायक बना दिया। युवाओं के लिए संदेश बिल्कुल साफ है कि लगन, सही प्रशिक्षण और अटूट संकल्प के बल पर दुनिया की किसी भी कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है। उत्तराखण्ड की यह धरती अब केवल धार्मिक पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साहसिक खेलों, खेल संस्कृति और वैश्विक अभियानों का नया गंतव्य बन चुकी है।


